संस्कृत श्लोक

यथावत् पूजितस्तेन देवर्षिः नारदस्तदा । आपृच्छैवाभ्यनुज्ञातः स जगाम विहायसम् ॥

हिंदी अनुवाद

उनके द्वारा यथावत् पूजित होकर तथा आज्ञा लेकर वे देवर्षि नारद आकाश मार्ग से चले गए।

अर्थ / व्याख्या

नारद जी वाल्मीकि की पूजा स्वीकार करके और उनसे आज्ञा लेकर आकाश मार्ग से चले गए। यह श्लोक आदर-सत्कार के बाद विदाई की प्रक्रिया दर्शाता है।

टिप्पणी

इस श्लोक में "यथावत्" शब्द महत्वपूर्ण है, जो बताता है कि वाल्मीकि ने विधिपूर्वक शास्त्रोक्त ढंग से पूजा की। नारद जी का आकाशगमन उनकी दिव्यता को दर्शाता है।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड द्वितीय सर्ग – द्वितीय श्लोक ॥

यथावत् पूजितस्तेन देवर्षिः नारदस्तदा ।
आपृच्छैवाभ्यनुज्ञातः स जगाम विहायसम् ॥
yathāvat pūjitastena devarṣiḥ nāradastadā |
āpṛcchaivābhyanujñātaḥ sa jagāma vihāyasam ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उनके द्वारा यथावत् पूजित होकर तथा आज्ञा लेकर वे देवर्षि नारद आकाश मार्ग से चले गए।

🔹 English Translation : Thus worshipped properly by him, and having taken leave and being permitted, that Devarishi Narada departed through the sky.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
यथावत्अव्यययथोचित, विधिपूर्वक
पूजितःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (पूज् + क्त)पूजित किया गया
तेनसर्वनाम, पुल्लिंग, तृतीया एकवचनउसके द्वारा (वाल्मीकि)
देवर्षिःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (देव + ऋषि)देवर्षि (नारद)
नारदःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचननारद
तदाअव्ययतब
आपृच्छअव्यय (आ + पृच्छ)पूछकर, आज्ञा लेकर
एवअव्ययही
अभ्यनुज्ञातःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (अभि + अनु + ज्ञा + क्त)अनुमति प्राप्त करके
सःसर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनवह
जगामपरस्मैपद, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (गम् धातु)गया
विहायसम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनआकाश में

📖 व्याख्या एवं महत्व

इस श्लोक में नारद जी के प्रस्थान का वर्णन है। "यथावत्" शब्द बताता है कि वाल्मीकि ने शास्त्रीय विधि से नारद जी की पूजा की। "आपृच्छैवाभ्यनुज्ञातः" से पता चलता है कि नारद जी ने वाल्मीकि से आज्ञा ली, जो शिष्टाचार का प्रतीक है। "विहायसम्" आकाशगमन की क्रिया दर्शाता है, जो नारद की दिव्यता को रेखांकित करता है। यह श्लोक मर्यादा और अनुशासन का पाठ सिखाता है – यहाँ तक कि देवर्षि भी बिना आज्ञा के नहीं जाते।

इस प्रकार, वाल्मीकि और नारद के बीच का यह संवाद और विदाई प्रकरण आगे की रामकथा के लिए मार्गदर्शन का कार्य करता है। नारद के जाने के बाद ही वाल्मीकि को क्रौंच वध का साक्षात्कार होता है, जो रामायण के प्रणयन का कारण बनता है।