रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन – श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
स तु तीरं समासाद्य तमसाया मुनिस्तदा । शिष्यमाह स्थितं पार्श्वे दृष्ट्वा तीर्थमकर्दमम् ॥
हिंदी अनुवाद
उस समय तमसा के तट पर जाकर उसने कीचड़ रहित तीर्थ को देखकर पास में खड़े हुए शिष्य से कहा।
अर्थ / व्याख्या
तमसा तट पर पहुँचकर वाल्मीकि ने स्वच्छ तीर्थ देखा और अपने पास खड़े शिष्य भरद्वाज से बात की।
टिप्पणी
यह श्लोक वाल्मीकि और उनके शिष्य भरद्वाज के बीच वार्तालाप का आरंभ है। "अकर्दमम्" (कीचड़ रहित) विशेषण तीर्थ की पवित्रता और स्वच्छता को दर्शाता है, जो ध्यान एवं स्नान के लिए उपयुक्त है।
॥ श्री रामायण बालकाण्ड द्वितीय सर्ग – चतुर्थ श्लोक ॥
शिष्यमाह स्थितं पार्श्वे दृष्ट्वा तीर्थमकर्दमम् ॥
śiṣyamāha sthitaṃ pārśve dṛṣṭvā tīrthamakardamam ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : उस समय तमसा के तट पर जाकर उसने कीचड़ रहित तीर्थ को देखकर पास में खड़े हुए शिष्य से कहा।
🔹 English Translation : Having reached the bank of Tamasa, that sage then, seeing the bathing place free from mud, spoke to his disciple who was standing by his side.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| सः | सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | वह (वाल्मीकि) |
| तु | अव्यय | तो |
| तीरम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | तट को |
| समासाद्य | ल्यप् प्रत्यय (सम् + आ + सद् धातु) | प्राप्त करके, पहुँचकर |
| तमसायाः | स्त्रीलिंग, षष्ठी एकवचन | तमसा नदी के |
| मुनिः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | मुनि |
| तदा | अव्यय | तब |
| शिष्यम् | पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | शिष्य को |
| आह | परस्मैपद, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (ब्रू धातु) | बोला, कहा |
| स्थितम् | पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन (स्था + क्त) | खड़े हुए |
| पार्श्वे | नपुंसकलिंग, सप्तमी एकवचन | पास में, निकट |
| दृष्ट्वा | क्त्वा प्रत्यय (दृश् धातु) | देखकर |
| तीर्थम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | तीर्थ को |
| अकर्दमम् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन (नञ् + कर्दम) | कीचड़ रहित, स्वच्छ |
📖 व्याख्या एवं महत्व
तमसा तट पर पहुँचकर वाल्मीकि ने सबसे पहले तीर्थ की स्वच्छता पर ध्यान दिया। "अकर्दमम्" विशेषण से पता चलता है कि वह स्थान स्नान और ध्यान के लिए अत्यंत उपयुक्त था। वे तुरंत अपने शिष्य भरद्वाज को संबोधित करते हैं, जो उनके समीप ही खड़ा था। यह गुरु-शिष्य के बीच सहज संवाद को दर्शाता है।
इस श्लोक से हमें वाल्मीकि की प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का पता चलता है। वे केवल तीर्थ को नहीं देखते, बल्कि उसकी विशेषताओं पर भी गौर करते हैं। यही संवेदनशीलता आगे चलकर उन्हें क्रौंच पक्षी के वध पर करुणा से भर देती है और रामायण की रचना का मार्ग प्रशस्त करती है।