संस्कृत श्लोक

अकर्दममिदं तीर्थं भरद्वाज निशामय । रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्य मनो यथा ॥

हिंदी अनुवाद

हे भरद्वाज! इस तीर्थ को देखो, यह कीचड़ से रहित, प्रसन्न जल वाला और सन्मनुष्य के मन के समान रमणीय है।

अर्थ / व्याख्या

वाल्मीकि भरद्वाज से तमसा तीर्थ की प्रशंसा करते हुए उसे सन्मनुष्य के मन के समान स्वच्छ और रमणीय बताते हैं।

टिप्पणी

यह श्लोक एक सुंदर उपमा प्रस्तुत करता है – जैसे सज्जन व्यक्ति का मन निर्मल, प्रसन्न और आकर्षक होता है, वैसे ही यह तीर्थ भी है। यह वाल्मीकि की काव्य प्रतिभा का प्रथम संकेत है, जो आगे चलकर महाकाव्य में पूर्ण विकसित होती है।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड द्वितीय सर्ग – पञ्चम श्लोक ॥

अकर्दममिदं तीर्थं भरद्वाज निशामय ।
रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्य मनो यथा ॥
akardamamidaṃ tīrthaṃ bharadvāja niśāmaya |
ramaṇīyaṃ prasannāmbu sanmanuṣya mano yathā ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : हे भरद्वाज! इस तीर्थ को देखो, यह कीचड़ से रहित, प्रसन्न जल वाला और सन्मनुष्य के मन के समान रमणीय है।

🔹 English Translation : O Bharadvaja! behold this bathing place, free from mud, charming with clear water, and beautiful like the mind of a good person.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
अकर्दमम्विशेषण, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचनकीचड़ रहित
इदम्सर्वनाम, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचनयह
तीर्थम्नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचनतीर्थ
भरद्वाजसम्बोधन, पुल्लिंग एकवचनहे भरद्वाज
निशामयपरस्मैपद, लोट्लकार, मध्यमपुरुष एकवचन (नि + शम् धातु)देखो, अवलोकन करो
रमणीयम्विशेषण, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचनरमणीय, सुंदर
प्रसन्नाम्बुविशेषण, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन (प्रसन्न + अम्बु)प्रसन्न जल वाला, स्वच्छ जल
सन्मनुष्यपुल्लिंग, षष्ठी एकवचन (सत् + मनुष्य)सज्जन मनुष्य के
मनःनपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन (मनस्)मन के
यथाअव्ययजैसे, समान

📖 व्याख्या एवं महत्व

इस श्लोक में वाल्मीकि ने तमसा तीर्थ की तीन विशेषताएँ बताई हैं – अकर्दम (कीचड़ रहित), प्रसन्नाम्बु (स्वच्छ जल), और रमणीय (सुंदर)। फिर उन्होंने इसकी तुलना सन्मनुष्य के मन से की है। यह उपमा अत्यंत सार्थक है – जैसे सज्जन व्यक्ति का मन मलरहित (अकर्दम), शांत एवं प्रसन्न (प्रसन्न), और आकर्षक (रमणीय) होता है, वैसे ही यह तीर्थ है।

यहाँ वाल्मीकि की काव्य-प्रतिभा का प्रथम दर्शन होता है। वे प्रकृति के सौंदर्य को देखकर उसे मानवीय गुणों से जोड़कर देखते हैं। यही काव्य-दृष्टि आगे चलकर रामायण में विभिन्न रूपकों और उपमाओं के माध्यम से प्रकट होती है। साथ ही, यह श्लोक गुरु-शिष्य के बीच के स्नेहिल संबंध को भी दर्शाता है, जहाँ गुरु शिष्य को प्रकृति की सुंदरता का अनुभव कराते हैं।