रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन – श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
न्यस्यतां कलशस्तात दीयतां वल्कलं मम । इदमेवावगाहिष्ये तमसा तीर्थमुत्तमम् ॥
हिंदी अनुवाद
हे वत्स! कमण्डलु रख दो और मेरा वल्कल (वस्त्र) दो। मैं इसी उत्तम तमसा तीर्थ में अवगाहन करूँगा।
अर्थ / व्याख्या
वाल्मीकि शिष्य भरद्वाज से कमण्डलु रखने और वल्कल देने को कहते हैं, क्योंकि वे तमसा तीर्थ में स्नान करना चाहते हैं।
टिप्पणी
यह श्लोक गुरु-शिष्य के बीच के सेवा-भाव को दर्शाता है। शिष्य गुरु की आज्ञा का पालन करने के लिए तत्पर है। "अवगाहिष्ये" क्रिया से पता चलता है कि वाल्मीकि तीर्थ में डुबकी लगाने का इरादा रखते हैं, जो शारीरिक और मानसिक शुद्धि का प्रतीक है।
॥ श्री रामायण बालकाण्ड द्वितीय सर्ग – षष्ठ श्लोक ॥
इदमेवावगाहिष्ये तमसा तीर्थमुत्तमम् ॥
idamevāvagāhiṣye tamasā tīrthamuttamam ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : हे वत्स! कमण्डलु रख दो और मेरा वल्कल (वस्त्र) दो। मैं इसी उत्तम तमसा तीर्थ में अवगाहन करूँगा।
🔹 English Translation : O child! place the water-pot and give me my bark garment. I shall bathe in this excellent tirtha on Tamasa.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| न्यस्यताम् | कर्मणि प्रयोग, लोट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (नि + अस् धातु) | रख दो, स्थापित किया जाए |
| कलशः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | कमण्डलु, जलपात्र |
| तात | सम्बोधन, पुल्लिंग एकवचन | हे वत्स, हे पुत्र |
| दीयताम् | कर्मणि प्रयोग, लोट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (दा धातु) | दिया जाए, दो |
| वल्कलम् | नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन | वल्कल, वस्त्र (पेड़ की छाल से बना) |
| मम | सर्वनाम, षष्ठी एकवचन | मेरा |
| इदम् | सर्वनाम, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन | यह, इसी |
| एव | अव्यय | ही |
| अवगाहिष्ये | आत्मनेपद, लृट्लकार, उत्तमपुरुष एकवचन (अव + गाह् धातु) | अवगाहन करूँगा, स्नान करूँगा |
| तमसा | स्त्रीलिंग, तृतीया एकवचन | तमसा नदी के (यहाँ तीर्थ के साथ सम्बन्ध) |
| तीर्थम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | तीर्थ में |
| उत्तमम् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | उत्तम, श्रेष्ठ |
📖 व्याख्या एवं महत्व
इस श्लोक में वाल्मीकि ने स्नान की तैयारी की है। वे शिष्य भरद्वाज से कहते हैं कि कमण्डलु (जलपात्र) को एक ओर रख दो और मेरा वल्कल दो, क्योंकि मैं इस तमसा तीर्थ में स्नान करूँगा। "अवगाहिष्ये" का अर्थ है गहराई में उतरना, डुबकी लगाना। यह केवल बाह्य स्नान नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि का भी प्रतीक है।
तमसा तीर्थ को "उत्तमम्" कहकर वाल्मीकि ने उसकी श्रेष्ठता स्वीकार की है। यह स्थान आगे चलकर उनके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होगा, क्योंकि यहीं पर उन्हें क्रौंच पक्षी के वध का साक्षात्कार होता है, जो रामायण के रचना का कारण बनता है। इस प्रकार यह श्लोक रामायण के प्रणयन की पृष्ठभूमि तैयार करता है।