संस्कृत श्लोक

तथा विधिं द्विजं दृष्ट्वा निषादेन निपातितम् । ऋषेर्धर्मात्मनस्तस्य कारुण्यं समपद्यत ॥

हिंदी अनुवाद

बहेलिये द्वारा उस प्रकार मारे गए उस पक्षी को देखकर धर्मात्मा ऋषि वाल्मीकि के हृदय में बड़ी करुणा उत्पन्न हुई।

अर्थ / व्याख्या

इस श्लोक में वाल्मीकि के हृदय में करुणा के उदय का वर्णन है। निषाद द्वारा पक्षी के वध का दृश्य देखकर उनके मन में स्वाभाविक रूप से करुणा उत्पन्न हुई। यही करुणा आगे चलकर श्लोक (महाकाव्य) का रूप लेती है।

टिप्पणी

यह श्लोक बताता है कि किस प्रकार एक संवेदनशील और धर्मात्मा ऋषि के हृदय में स्वतः ही करुणा जाग्रत हो जाती है। यहाँ 'तथा विधिम्' का अर्थ है 'उस प्रकार से' या 'विधि के अनुसार' – अर्थात जैसे वह पक्षी मारा गया था, उस हृदयविदारक दृश्य को देखकर। 'कारुण्यं समपद्यत' – करुणा उत्पन्न हुई। यह करुणा ही रामायण रचना का मूल कारण बनेगी।

॥ बालकाण्ड सर्ग २ श्लोक १३ – ऋषि में करुणोदय ॥

तथा विधिं द्विजं दृष्ट्वा निषादेन निपातितम् ।
ऋषेर्धर्मात्मनस्तस्य कारुण्यं समपद्यत ॥
tathā vidhiṃ dvijaṃ dṛṣṭvā niṣādena nipātitam |
ṛṣerdharmātmanastasya kāruṇyaṃ samapadyata ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : बहेलिये द्वारा उस प्रकार मारे गए उस पक्षी को देखकर धर्मात्मा ऋषि वाल्मीकि के हृदय में बड़ी करुणा उत्पन्न हुई।

🔹 English Translation : Seeing that twice-born bird struck down in such a way by the Nishada (hunter), great compassion arose in the heart of that righteous sage (Valmiki).

🔍 शब्दार्थ

संस्कृतहिन्दी अर्थ
तथाउस प्रकार
विधिम्विधि से, भाग्य से (यहाँ 'विधि' का अर्थ 'प्रकार' भी हो सकता है)
द्विजम्द्विज (पक्षी) को
दृष्ट्वादेखकर
निषादेननिषाद (शिकारी) द्वारा
निपातितम्मारा गया, गिराया गया
ऋषेःऋषि के
धर्मात्मनःधर्मात्मा (धर्म को आत्मा में धारण करने वाले)
तस्यउसके
कारुण्यम्करुणा
समपद्यतउत्पन्न हुई, प्राप्त हुई

📖 सन्दर्भ एवं व्याख्या

पिछले दो श्लोकों में मादा के विलाप और नर के गुणों का वर्णन था। अब यह श्लोक वाल्मीकि की मानसिक दशा का वर्णन करता है। वे धर्मात्मा ऋषि हैं – जिनका हृदय स्वभावतः कोमल और करुणापूर्ण है। ऐसी दयनीय स्थिति को देखकर उनके हृदय में 'कारुण्य' (करुणा) उत्पन्न होना स्वाभाविक है। यह करुणा ही आगे चलकर उन्हें शोकातुर बनाती है और फिर 'शोकः श्लोकत्वमागतः' – शोक ही श्लोक में परिणत होता है।

'समपद्यत' क्रिया आत्मनेपद में है, जो भाव के उत्पन्न होने की स्वाभाविकता को दर्शाती है। यह करुणा उनके अंदर बलपूर्वक नहीं डाली गई, बल्कि सहज ही प्रकट हो गई।

📌 व्याकरण: 'निपातितम्' – णिच् प्रत्ययान्त (निपातय) से कर्मणि भूतकालिक कृदन्त, जिसका अर्थ है 'गिराया गया' या 'मारा गया'। 'धर्मात्मनः' – धर्म + आत्मन्, षष्ठी एकवचन।

॥ जय श्री राम ॥