सभी अध्याय अध्याय 6 | 47 श्लोक

ध्यान योग (Dhyan Yoga)

छठे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ध्यान योग का वर्णन करते हैं। वह आत्म-संयम, मन को वश में करने और ध्यान की विधि बताते हैं। यह अध्याय योगी के जीवन और उसके परम लक्ष्य का विस्तार से वर्णन करता है।

परिचय / Introduction

अध्याय ५ में कृष्ण ने कर्म-संन्यास और कर्म-योग की तुलना करते हुए कहा था कि कर्मयोग श्रेष्ठ है। अब अध्याय ६ में, वह उस कर्मयोग की चरम परिणति "ध्यानयोग" के रूप में बताते हैं, जहाँ साधक मन और इंद्रियों को वश में करके परमात्मा में लीन हो जाता है।

मुख्य विषय / Key Themes

  • आत्म-संयम और योगारूढ़ता (Self-Control and Ascending to Yoga): कैसे एक व्यक्ति अनासक्त होकर कर्म करता हुआ योग की सिद्धि को प्राप्त करता है।
  • मन का महत्व (The Importance of Mind): मन ही मनुष्य का मित्र है और मन ही शत्रु है। बंधन और मुक्ति का मूल मन ही है।
  • ध्यान की विधि (The Method of Meditation): एकांत स्थान में आसन लगाकर, ब्रह्मचारी वृत्ति से, मन को एकाग्र करके भगवान का ध्यान कैसे करना चाहिए।
  • योगी की परिभाषा (The Definition of a Yogi): जो समदुःखसुखः (सुख-दुःख में समान) है, जो सबमें आत्मवत् देखता है, वह सबसे श्रेष्ठ योगी है।
  • असफल योगी की गति (The Fate of a Failed Yogi): कृष्ण आश्वासन देते हैं कि योग से भ्रष्ट हुआ साधक भी नष्ट नहीं होता, बल्कि पुण्य लोकों में जाकर पुनः शुभ परिस्थितियों में जन्म लेता है और अपनी साधना को आगे बढ़ाता है।

यह अध्याय हमें सिखाता है कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि हमारे अपने मन की शांति और स्थिरता में निहित है। ध्यान का अभ्यास हमें इस आंतरिक आनंद से जोड़ने का सबसे सशक्त माध्यम है। This chapter emphasizes that true happiness lies within and meditation is the key to unlocking that inner peace.

अध्याय के सभी श्लोक

श्लोक 21

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सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१॥

“जिस परम सुख को वह बुद्धि से ग्रहण करने योग्य और इन्द्रियातीत समझता है, और जिसमें स्थित होकर वह तत्त्व से कभी विचलित नहीं होता।”

English: That supreme joy, which is perceived by the intellect and is beyond the senses, and in which being established one never departs from the truth.

श्लोक 22

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यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२॥

“जिसे पाकर वह अन्य किसी लाभ को उससे अधिक नहीं मानता, और जिसमें स्थित होने पर वह बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता।”

English: Having obtained which, one does not consider any other gain greater than that, and established in which, one is not shaken even by heavy sorrow.

श्लोक 23

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तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३॥

“दुःख के संयोग से वियोग (छुटकारा) जो है, वही योग के नाम से जाना जाता है। उस योग का अभ्यास निश्चय के साथ और अनिर्विण्ण चित्त से (बिना खीझे) करना चाहिए।”

English: That state of disconnection from the union with sorrow is known as yoga. This yoga should be practiced with determination and without any despondency of mind.

श्लोक 24

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सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४॥

“संकल्पों से उत्पन्न सब कामनाओं का पूर्णतः त्याग करके और सब ओर से इन्द्रिय-समूह को मन के द्वारा अच्छी तरह नियंत्रित करके।”

English: Completely renouncing all desires born of thoughts (saṅkalpa), and fully restraining the senses from all sides by the mind.

श्लोक 25

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शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ २५॥

“धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे उपरत हो जाए, मन को आत्मा में स्थिर करके किसी भी वस्तु का चिन्तन न करे।”

English: Gradually, step by step, one should become quiet, with the intellect firmly held by patience; having fixed the mind on the Self, one should think of nothing else.

श्लोक 26

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यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६॥

“यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भी (विषयों में) चला जाए, वहाँ-वहाँ से उसे नियंत्रित करके आत्मा के ही वश में कर लेना चाहिए।”

English: From wherever the restless and unsteady mind wanders away, one should withdraw it and bring it back under the control of the Self alone.

श्लोक 27

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प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७॥

“शान्त मन वाले, शान्त हुए रजोगुण वाले, ब्रह्मभूत और निष्पाप इस योगी को परम सुख प्राप्त होता है।”

English: Supreme bliss certainly comes to this yogi of tranquil mind, whose passions are calmed, who has become Brahman and is free from all impurities.

श्लोक 28

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युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८॥

“इस प्रकार सदा अपने को योग में लगाने वाला, पापरहित योगी सुखपूर्वक ब्रह्म के स्पर्श रूप परम सुख को भोगता है।”

English: Thus constantly engaging the self in yoga, the yogi, freed from all impurities, easily enjoys the infinite bliss of contact with Brahman.

श्लोक 29

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सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९॥

“योगयुक्त चित्त वाला योगी सब भूतों में स्थित अपने आत्मा को और सब भूतों को अपने आत्मा में देखता है, वह सर्वत्र समदर्शी होता है।”

English: With the mind harmonized by yoga, one sees the Self abiding in all beings, and all beings in the Self; he sees the same everywhere.

श्लोक 30

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यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३०॥

“जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता और वह मेरे लिए नष्ट नहीं होता।”

English: For one who sees Me everywhere and sees everything in Me, I am never lost to him, nor is he ever lost to Me.

श्लोक 31

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सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१॥

“जो योगी सब भूतों में स्थित मुझको एकत्व (अभेद) बुद्धि से भजता है, वह सब प्रकार से व्यवहार करता हुआ भी मुझमें ही रहता है।”

English: That yogi who worships Me, abiding in all beings, established in oneness, though engaged in all kinds of activities, lives in Me.

श्लोक 32

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आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२॥

“हे अर्जुन! जो पुरुष आत्मौपम्य (अपने सदृश) से सर्वत्र समान देखता है, चाहे सुख हो या दुःख, वह योगी परम (सर्वश्रेष्ठ) माना गया है।”

English: O Arjuna, one who sees equality everywhere, comparing everything with oneself, whether in pleasure or in pain, such a yogi is considered the highest.

श्लोक 33

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अर्जुन उवाच । योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३॥

“अर्जुन बोले: हे मधुसूदन! आपने समता रूप जिस योग का वर्णन किया है, उसकी स्थिर स्थिति मैं नहीं देख पाता, क्योंकि मन चंचल है।”

English: Arjuna said: O Madhusūdana, the yoga of equanimity which you have taught – I do not see its steady continuance, because of the restlessness of the mind.

श्लोक 34

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चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४॥

“क्योंकि मन चंचल, प्रमाथी (क्षोभकारी), बलवान् और दृढ़ है, हे कृष्ण! मैं इसे वायु के समान वश में करना अति कठिन समझता हूँ।”

English: For the mind is very restless, turbulent, strong and obstinate, O Kṛṣṇa. I consider it as difficult to control as the wind.

श्लोक 35

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श्री भगवानुवाच । असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५॥

“श्री भगवान् बोले: हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और दुर्निग्रह (कठिनाई से वश में होने वाला) है, हे कौन्तेय! परन्तु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा यह वश में किया जा सकता है।”

English: The Blessed Lord said: O mighty-armed, undoubtedly the mind is difficult to control and restless; but by practice, O son of Kuntī, and by dispassion, it can be controlled.

श्लोक 36

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असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६॥

“असंयत चित्त वाले के लिए योग दुष्प्राप्य है, ऐसी मेरी सम्मति है; किन्तु वश में किए हुए चित्त वाला प्रयत्नशील पुरुष उचित साधन से उसे प्राप्त कर सकता है।”

English: In My opinion, yoga is hard to attain for one whose mind is unsubdued; but for one who has controlled the mind and strives by proper means, it is attainable.

श्लोक 37

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अर्जुन उवाच । अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७॥

“अर्जुन बोले: हे कृष्ण! जो श्रद्धायुक्त है, परन्तु यत्नहीन है (या जिसका प्रयत्न असफल रहा है), योग से चलित मन वाला है, और योग की सिद्धि को नहीं पाता, वह किस गति को प्राप्त होता है?”

English: Arjuna said: O Kṛṣṇa, what is the fate of one who has faith but is not steadfast, whose mind wanders away from yoga, and who fails to attain perfection in yoga?

श्लोक 38

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कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८॥

“हे महाबाहो! क्या वह ब्रह्म के मार्ग में मोहित हुआ उभयभ्रष्ट (दोनों से भ्रष्ट), बिना आधार का होकर, छिन्न-भिन्न बादल की भाँति नष्ट नहीं हो जाता?”

English: O mighty-armed Kṛṣṇa, does he not, being deluded on the path to Brahman, fall from both, and perish like a torn cloud, without any support?

श्लोक 39

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एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९॥

“हे कृष्ण! आप इस मेरे संशय को पूर्णतः दूर करने के योग्य हैं। आपके अतिरिक्त इस संशय का छेदन करने वाला कोई और मिलना संभव नहीं है।”

English: O Kṛṣṇa, You are indeed worthy of completely dispelling this doubt of mine. For no one other than You can remove this doubt.

श्लोक 40

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श्री भगवानुवाच । पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४०॥

“श्री भगवान् बोले: हे पार्थ! उस (योगभ्रष्ट) का न तो इस लोक में विनाश होता है और न परलोक में। हे तात! कल्याण करने वाला कोई भी दुर्गति को नहीं प्राप्त होता।”

English: The Blessed Lord said: O Pārtha, there is no destruction for him in this world or in the next. For no one who does good, O dear one, ever comes to grief.