छठे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ध्यान योग का वर्णन करते हैं। वह आत्म-संयम, मन को वश में करने और ध्यान की विधि बताते हैं। यह अध्याय योगी के जीवन और उसके परम लक्ष्य का विस्तार से वर्णन करता है।
परिचय / Introduction
अध्याय ५ में कृष्ण ने कर्म-संन्यास और कर्म-योग की तुलना करते हुए कहा था कि कर्मयोग श्रेष्ठ है। अब अध्याय ६ में, वह उस कर्मयोग की चरम परिणति "ध्यानयोग" के रूप में बताते हैं, जहाँ साधक मन और इंद्रियों को वश में करके परमात्मा में लीन हो जाता है।
मुख्य विषय / Key Themes
आत्म-संयम और योगारूढ़ता (Self-Control and Ascending to Yoga): कैसे एक व्यक्ति अनासक्त होकर कर्म करता हुआ योग की सिद्धि को प्राप्त करता है।
मन का महत्व (The Importance of Mind): मन ही मनुष्य का मित्र है और मन ही शत्रु है। बंधन और मुक्ति का मूल मन ही है।
ध्यान की विधि (The Method of Meditation): एकांत स्थान में आसन लगाकर, ब्रह्मचारी वृत्ति से, मन को एकाग्र करके भगवान का ध्यान कैसे करना चाहिए।
योगी की परिभाषा (The Definition of a Yogi): जो समदुःखसुखः (सुख-दुःख में समान) है, जो सबमें आत्मवत् देखता है, वह सबसे श्रेष्ठ योगी है।
असफल योगी की गति (The Fate of a Failed Yogi): कृष्ण आश्वासन देते हैं कि योग से भ्रष्ट हुआ साधक भी नष्ट नहीं होता, बल्कि पुण्य लोकों में जाकर पुनः शुभ परिस्थितियों में जन्म लेता है और अपनी साधना को आगे बढ़ाता है।
यह अध्याय हमें सिखाता है कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि हमारे अपने मन की शांति और स्थिरता में निहित है। ध्यान का अभ्यास हमें इस आंतरिक आनंद से जोड़ने का सबसे सशक्त माध्यम है। This chapter emphasizes that true happiness lies within and meditation is the key to unlocking that inner peace.
“जिस परम सुख को वह बुद्धि से ग्रहण करने योग्य और इन्द्रियातीत समझता है, और जिसमें स्थित होकर वह तत्त्व से कभी विचलित नहीं होता।”
English: That supreme joy, which is perceived by the intellect and is beyond the senses, and in which being established one never departs from the truth.
“जिसे पाकर वह अन्य किसी लाभ को उससे अधिक नहीं मानता, और जिसमें स्थित होने पर वह बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता।”
English: Having obtained which, one does not consider any other gain greater than that, and established in which, one is not shaken even by heavy sorrow.
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३॥
“दुःख के संयोग से वियोग (छुटकारा) जो है, वही योग के नाम से जाना जाता है। उस योग का अभ्यास निश्चय के साथ और अनिर्विण्ण चित्त से (बिना खीझे) करना चाहिए।”
English: That state of disconnection from the union with sorrow is known as yoga. This yoga should be practiced with determination and without any despondency of mind.
“धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे उपरत हो जाए, मन को आत्मा में स्थिर करके किसी भी वस्तु का चिन्तन न करे।”
English: Gradually, step by step, one should become quiet, with the intellect firmly held by patience; having fixed the mind on the Self, one should think of nothing else.
“शान्त मन वाले, शान्त हुए रजोगुण वाले, ब्रह्मभूत और निष्पाप इस योगी को परम सुख प्राप्त होता है।”
English: Supreme bliss certainly comes to this yogi of tranquil mind, whose passions are calmed, who has become Brahman and is free from all impurities.
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२॥
“हे अर्जुन! जो पुरुष आत्मौपम्य (अपने सदृश) से सर्वत्र समान देखता है, चाहे सुख हो या दुःख, वह योगी परम (सर्वश्रेष्ठ) माना गया है।”
English: O Arjuna, one who sees equality everywhere, comparing everything with oneself, whether in pleasure or in pain, such a yogi is considered the highest.
“अर्जुन बोले: हे मधुसूदन! आपने समता रूप जिस योग का वर्णन किया है, उसकी स्थिर स्थिति मैं नहीं देख पाता, क्योंकि मन चंचल है।”
English: Arjuna said: O Madhusūdana, the yoga of equanimity which you have taught – I do not see its steady continuance, because of the restlessness of the mind.
श्री भगवानुवाच । असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५॥
“श्री भगवान् बोले: हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और दुर्निग्रह (कठिनाई से वश में होने वाला) है, हे कौन्तेय! परन्तु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा यह वश में किया जा सकता है।”
English: The Blessed Lord said: O mighty-armed, undoubtedly the mind is difficult to control and restless; but by practice, O son of Kuntī, and by dispassion, it can be controlled.
“असंयत चित्त वाले के लिए योग दुष्प्राप्य है, ऐसी मेरी सम्मति है; किन्तु वश में किए हुए चित्त वाला प्रयत्नशील पुरुष उचित साधन से उसे प्राप्त कर सकता है।”
English: In My opinion, yoga is hard to attain for one whose mind is unsubdued; but for one who has controlled the mind and strives by proper means, it is attainable.
“अर्जुन बोले: हे कृष्ण! जो श्रद्धायुक्त है, परन्तु यत्नहीन है (या जिसका प्रयत्न असफल रहा है), योग से चलित मन वाला है, और योग की सिद्धि को नहीं पाता, वह किस गति को प्राप्त होता है?”
English: Arjuna said: O Kṛṣṇa, what is the fate of one who has faith but is not steadfast, whose mind wanders away from yoga, and who fails to attain perfection in yoga?
श्री भगवानुवाच । पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४०॥
“श्री भगवान् बोले: हे पार्थ! उस (योगभ्रष्ट) का न तो इस लोक में विनाश होता है और न परलोक में। हे तात! कल्याण करने वाला कोई भी दुर्गति को नहीं प्राप्त होता।”
English: The Blessed Lord said: O Pārtha, there is no destruction for him in this world or in the next. For no one who does good, O dear one, ever comes to grief.