ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 31

श्लोक ३१ में कहा गया है कि एकत्व भाव से भजने वाला योगी भगवान् में ही रहता है।

संस्कृत श्लोक

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१॥

sarva-bhūta-sthitaṃ yo māṃ bhajaty ekatvam āsthitaḥ | sarvathā vartamāno 'pi sa yogī mayi vartate ||31||

पदच्छेद / शब्दार्थ

सर्वभूतस्थितम्: समस्त भूतों में स्थित; यः: जो; माम्: मुझको; भजति: भजता है; एकत्वम्: एकत्व (अभेद बुद्धि); आस्थितः: स्थित हुआ; सर्वथा: सब प्रकार से; वर्तमानः: वर्तमान रहता हुआ; अपि: भी; सः: वह; योगी: योगी; मयि: मुझमें; वर्तते: रहता है।

हिंदी अनुवाद

जो योगी सब भूतों में स्थित मुझको एकत्व (अभेद) बुद्धि से भजता है, वह सब प्रकार से व्यवहार करता हुआ भी मुझमें ही रहता है।

English Translation

That yogi who worships Me, abiding in all beings, established in oneness, though engaged in all kinds of activities, lives in Me.

टीका / Commentary

जो योगी सब प्राणियों में स्थित भगवान् की एकरूपता से उपासना करता है, वह सब क्रियाओं में भी भगवान् में ही स्थित रहता है।