श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 31

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 45 मिनट का पठन 121 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
सर्वभूतस्थितम्
समस्त भूतों में स्थित
यः
जो
माम्
मुझको
भजति
भजता है
एकत्वम्
एकत्व (अभेद बुद्धि)
आस्थितः
स्थित हुआ
सर्वथा
सब प्रकार से
वर्तमानः
वर्तमान रहता हुआ
अपि
भी
सः
वह
योगी
योगी
मयि
मुझमें
वर्तते
रहता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो योगी सब भूतों में स्थित मुझको एकत्व (अभेद) बुद्धि से भजता है, वह सब प्रकार से व्यवहार करता हुआ भी मुझमें ही रहता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अध्यात्म का महाशिखर और अद्वैत चेतना का प्रकाश

सनातन धर्म की अमूल्य थाती श्रीमद्भगवद्गीता केवल युद्ध के मैदान में दिया गया उपदेश मात्र नहीं है, अपितु यह मानव मात्र के लिए परम मुक्ति, चेतना के उत्थान और आत्मसाक्षात्कार का जीवंत मार्गदर्शक है। गीता का प्रत्येक श्लोक अपने भीतर ब्रह्मांड के रहस्यों को समेटे हुए है। जब हम इसके छठे अध्याय, जिसे 'ध्यानयोग' या 'आत्मसंयमयोग' के नाम से जाना जाता है, की गहराइयों में उतरते हैं, तो हमें योग की पराकाष्ठा के दर्शन होते हैं। इसी क्रम में, भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को संबोधित किया गया اکतीसवां (31वां) श्लोक—"सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥"—वेदांत के उस चरम सत्य को उद्घाटित करता है, जहाँ जीव और शिव की, क्षेत्रज्ञ और क्षेत्र की, तथा सृष्टा और सृष्टि की भिन्नता समाप्त हो जाती है।

सांसारिक जीवन जीते हुए भी परमात्मा में पूर्णतः लीन रहना कैसे संभव है? यह प्रश्न हर उस साधक के मन में उठता है जो संन्यास और गृहस्थ के द्वंद्व से जूझ रहा है। श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से उस उच्च कोटि के योगी का चित्र खींचते हैं जिसकी चेतना में द्वैत का पूर्ण विलय हो चुका है। वह व्यक्ति जो समस्त चराचर जगत में, हर एक प्राणी, कीट-पतंग, वृक्ष और मनुष्य में एक ही चेतना, एक ही परमेश्वर का दर्शन करता है, वह बाहरी क्रिया-कलापों, कर्मों और दायित्वों के बीच रहते हुए भी योग के सर्वोच्च शिखर पर आसीन रहता है।

Bhaktilok.in के इस विशेष विद्वतापूर्ण आलेख में हम इसी अद्भुत श्लोक के मूल अर्थ, पद-दर-पद शब्दार्थ, दार्शनिक पृष्ठभूमि, मानसिक एवं आध्यात्मिक लाभ और प्रामाणिक संदर्भों की विस्तृत चर्चा करेंगे। यह मार्गदर्शिका उन सभी साधकों के लिए समर्पित है जो अपनी व्यस्त जीवनशैली के मध्य भी ईश्वरीय चेतना का निरंतर अनुभव करना चाहते हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

गीता के इस पवित्र श्लोक का उच्चारण पूर्ण श्रद्धा, शुद्ध उच्चारण और लयबद्धता के साथ करना चाहिए। यहाँ इसका मानक संस्कृत पाठ प्रस्तुत है:

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।

सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥

श्लोक गायन एवं पाठ की शास्त्रीय विधि:
  • 1. शारीरिक शुद्धि: प्रातकाल ब्रह्म बेला में स्नान कर श्वेत या पीले वस्त्र धारण करें।
  • 2. आसन: कुशा या ऊन के पवित्र आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके सुखासन या पद्मासन में बैठें।
  • 3. मानसिक संकल्प: भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन का स्मरण करते हुए मन को शांत करें।
  • 4. आवृत्ति: इस श्लोक का न्यूनतम 108 बार (एक माला) मानसिक या उपांश जप करने से अद्भुत एकाग्रता प्राप्त होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के प्रत्येक शब्द की गहराई में जाने से इसके दार्शनिक आयाम स्पष्ट होते हैं। आइए, संस्कृत व्याकरण और अद्वैत वेदांत के दृष्टिकोण से इसका शब्द-दर-शब्द विश्लेषण करें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
सर्वभूतस्थितम् सब भूतों (प्राणियों) में स्थित यह स्वीकार करना कि चराचर जगत के हर एक जीव में एक ही चेतना निवास करती है।
यः जो (साधक/योगी) वह विशिष्ट साधक जो इस अद्वैत दृष्टि को अपने जीवन में उतार चुका है।
माम् मुझको (परमात्मा को) सर्वव्यापी, सच्चिदानंद स्वरूप वासुदेव श्री कृष्ण या परम ब्रह्म।
भजति भजता है / उपासना करता है केवल पूजा-पाठ नहीं, अपितु सर्वत्र ईश्वर को देखकर प्रेम और सेवा करना ही सच्चा भजन है।
एकत्वम् एकरूपता को / अद्वैत भाव को अपने और दूसरे में, तथा सब प्राणियों में कोई भेद न देखना (अद्वैत बोध)।
आस्थितः स्थित हुआ (आश्रित) इस महान सत्य में पूरी तरह प्रतिष्ठित और अडिग रहना।
सर्वथा सब प्रकार से / हर परिस्थिति में चाहे वह सोते, जागते, खाते, पीते या सांसारिक कार्य करते हुए क्यों न हो।
वर्तमानोऽपि विद्यमान रहते हुए भी / आचरण करते हुए भी सांसारिक दायित्वों, कर्तव्यों और क्रियाओं का निर्वाह करते हुए भी।
सः वह उपर्युक्त गुणों से युक्त श्रेष्ठ योगी।
योगी योगी (परमात्मा से जुड़ा हुआ) जिसका चित्त निरंतर योगयुक्त और शांत है।
मयि मुझमें (परमात्मा में) परम धाम और अनंत चैतन्य में।
वर्तते निवास करता है / स्थित रहता है वह सदा मुक्त और मुझमें ही स्थित है, उसे किसी कृत्रिम साधना की आवश्यकता नहीं रहती।
व्यापक भावार्थ:

"जो योगी संपूर्ण प्राणियों में समभाव से स्थित मुझ परमेश्वर को एकरूपता से भजता है (अर्थात सबमें एक ही आत्म-तत्त्व का अनुभव करता है), वह सब प्रकार से यानी हर परिस्थिति और कर्म में वर्तता हुआ भी मुझमें ही निवास करता है।" इसका अर्थ यह है कि अद्वैत दर्शन को आत्मसात करने वाला ज्ञानी पुरुष कभी परमात्मा से विलग नहीं होता, चाहे वह संसार के कितने ही जटिल कार्यों में क्यों न व्यस्त हो।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस छठे अध्याय की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के मैदान में रची गई थी, जब दोनों सेनाएं आमने-सामने थीं। विषाद से ग्रस्त अर्जुन अपने स्वजनों को देखकर युद्ध से विमुख होने का निर्णय लेते हैं और धनुष-बाण नीचे रख देते हैं। तब भगवान श्री कृष्ण उन्हें जीवन, कर्तव्य, कर्म और योग का जो विस्तृत ज्ञान देते हैं, वही गीता है। छठे अध्याय का नाम 'ध्यानयोग' या 'आत्मसंयमयोग' है, जिसमें मन की चंचलता को वश में करने और ध्यान की विधियों का वर्णन किया गया है।

अध्‍याय के आरंभ में भगवान कृष्ण ध्यान के लिए आसन, भोजन, आहार-विहार और मन को साधने के उपायों का वर्णन करते हैं। अर्जुन के मन में यह स्वाभाविक जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि क्या चंचल मन को वश में करना सचमुच संभव है? तब श्री कृष्ण अर्जुन को आश्वासन देते हैं कि अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में किया जा सकता है। इसके उपरांत, जब साधक योग में और आगे बढ़ता है, तो उसकी दृष्टि में परिवर्तन आता है। वह सांसारिक प्रपंचों से ऊपर उठकर हर वस्तु में परमात्मा के दर्शन करने लगता है।

इसी क्रम में श्लोक ३१ आता है, जो वेदों के महावाक्यों जैसे 'अहं ब्रह्मास्मि' और 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' के दर्शन का गीतात्मक रूप है। प्राचीन वेदों और उपनिषदों—विशेषकर ईशोपनिषद में कहा गया है—"यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥" (जो पुरुष संपूर्ण भूतों को अपने आत्मा में ही देखता है और सब भूतों में अपनी आत्मा को देखता है, वह इस सत्य के कारण किसी से घृणा नहीं करता)। भगवान कृष्ण इसी उपनिषदीय ज्ञान को इस श्लोक के माध्यम से और अधिक सरल और व्यावहारिक बनाते हैं।

महाभारत के अनुशासन पर्व और शांति पर्व में भीष्म पितामह और युधिष्ठिर के संवादों में भी इसी अद्वैत दृष्टि का समर्थन मिलता है। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक साधकों को द्वैत बुद्धि से ऊपर उठाकर 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और समग्र ब्रह्मांडीय प्रेम की भावना से ओतप्रोत करता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय के इस ३१वें श्लोक का निरंतर स्मरण, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से साधक को असीम आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

यह श्लोक मन के विकारों, चिंताओं और तनाव को दूर करता है। जब साधक यह समझ लेता है कि सब कुछ एक ही परमात्मा का विस्तार है, तो उसके भीतर का हड़बोंग और मानसिक अशांति समाप्त हो जाती है।

2. संकीर्णता और भेदभाव का अंत

इस श्लोक के नियमित चिंतन से मनुष्य जाति, धर्म, ऊंच-नीच और अमीर-गरीब के संकीर्ण भेदों से ऊपर उठ जाता है। उसकी दृष्टि में हर प्राणी के प्रति सम्मान और करुणा जागृत होती है।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

संस्कृत श्लोकों के कंपन (Vibrations) से शरीर के सूक्ष्म चक्र जागृत होते हैं, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है और आसपास का वातावरण पवित्र व ऊर्जावान बनता है।

4. कर्म बंधनों से मुक्ति (निष्काम कर्म)

जब व्यक्ति हर कार्य को भगवान की पूजा मानकर करता है और फल की आसक्ति छोड़ देता है, तब उसके द्वारा किए गए कर्म उसे बांधते नहीं हैं, बल्कि मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

5. भय और मृत्यु के प्रति निर्भयता

"जो सबमें मुझे और मुझमें सबको देखता है, उसे किसी का भय नहीं रहता।" अद्वैत चेतना के उदय से मृत्यु का भय और जीवन के कष्टों का संताप समाप्त हो जाता है।

6. ईश्वर के साथ अखंड योग (Constant Union)

साधक को यह अनुभव होने लगता है कि वह कभी भी भगवान से अलग नहीं है। उसकी नींद, जागना, चलना और बोलना—सब कुछ भगवान की आराधना बन जाता है।

7. क्षमाशीलता और करुणा की वृद्धि

सर्वत्र अपने ही इष्ट के दर्शन होने के कारण साधक के मन में किसी के प्रति भी बैर, द्वेष या बदला लेने की भावना उत्पन्न नहीं होती, जिससे उसका हृदय अत्यंत कोमल और विशाल हो जाता है।

8. उच्च कोटि की एकाग्रता और स्मरण शक्ति

गीता के इन गूढ़ श्लोकों को याद करने और उनके अर्थ पर मनन करने से मस्तिष्क की बौद्धिक क्षमता, स्मरण शक्ति और बौद्धिक तीक्ष्णता में अभूतपूर्व सुधार होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह आलेख Bhaktilok.in के मुख्य देवोशनल विद्वानों, संस्कृत भाषाविदों और गूगल हेल्पफुल कंटेंट विशेषज्ञों द्वारा वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न प्रामाणिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज के दृष्टिकोण) के गहन अध्ययन के पश्चात संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सनातन संस्कृति का शुद्ध, अकाट्य और जीवनोपयोगी ज्ञान वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से प्रदान करना है। सभी श्लोकों के अर्थ शास्त्रीय व्याकरण और परंपरा के अनुसार सत्यापित किए गए हैं ताकि किसी भी प्रकार की भ्रांति से बचा जा सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय (ध्यानयोग) का 31वां श्लोक है। इसका मुख्य संदेश यह है कि जो योगी समस्त प्राणियों में एक ही परमात्मा का दर्शन करता है और अद्वैत भाव से उनकी सेवा व भजन करता है, वह संसार के सभी कार्यों और परिस्थितियों में रहते हुए भी हमेशा परमात्मा में ही स्थित रहता है।

हाँ, बिल्कुल! इस श्लोक की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें भगवान कृष्ण ने कहा है—"सर्वथा वर्तमानोऽपि" (यानी सब प्रकार से कर्म करते हुए, संसार में रहते हुए भी)। योग के लिए केवल वेशभूषा बदलना आवश्यक नहीं है; यदि आपकी दृष्टि में समभाव और सर्वत्र ईश्वर की उपस्थिति का बोध है, तो आप गृहस्थ में रहते हुए भी श्रेष्ठ योगी हैं।

दैनिक जीवन में अभ्यास करने के लिए हमें किसी भी प्राणी के साथ द्वेष, छल या घृणा करने से बचना चाहिए। जब हम दफ्तर, घर या समाज में आचरण करें, तो यह भाव रखें कि हर व्यक्ति के भीतर वही चैतन्य ईश्वर विराजमान है। इसके साथ ही, प्रतिदिन सुबह इस श्लोक का पाठ करने से मन में यह संस्कार पक्के होते हैं।

इसका शाब्दिक अर्थ है—"एकरूपता में स्थित होकर भजता है।" दार्शनिक दृष्टि से इसका अर्थ है कि परमात्मा को अपने से अलग या केवल किसी मंदिर की मूर्ति तक सीमित न मानकर, कण-कण में एक ही अद्वैत तत्त्व का अनुभव करना और उसी भाव से प्रेम व समर्पण रखना ही वास्तविक भजन है।

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों के पाठ के लिए किसी कठोर या विशेष दीक्षा की अनिवार्यता नहीं है। इसे कोई भी श्रद्धावान व्यक्ति शुद्ध उच्चारण के साथ पढ़ सकता है। हालांकि, यदि आप इसे नियम बनाकर नित्य प्रति जपते हैं, तो स्वच्छता और पवित्रता का ध्यान रखना आध्यात्मिक लाभ को कई गुना बढ़ा देता है।

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संकलन एवं प्रस्तुति: मुख्य देवोशनल विद्वान और भाषाविद् टीम, Bhaktilok

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो योगी सब भूतों में स्थित मुझको एकत्व भाव से भजता है, वह सब प्रकार से व्यवहार करता हुआ भी मुझमें ही रहता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योगी की क्रियाएँ भले ही लौकिक हों, किन्तु उसकी दृष्टि में सब कुछ भगवान् है, अतः वह सदा भगवान् में स्थित रहता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 31 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 31/47 66% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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