ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 30

श्लोक ३० में भगवान् और भक्त के अविनाशी संबंध का वर्णन है।

संस्कृत श्लोक

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३०॥

yo māṃ paśyati sarvatra sarvaṃ ca mayi paśyati | tasyāhaṃ na praṇaśyāmi sa ca me na praṇaśyati ||30||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यः: जो; माम्: मुझे; पश्यति: देखता है; सर्वत्र: सर्वत्र; सर्वम्: सब कुछ; च: और; मयि: मुझमें; पश्यति: देखता है; तस्य: उसके लिए; अहम्: मैं; न: नहीं; प्रणश्यामि: नष्ट होता; स: वह; च: और; मे: मुझसे; न: नहीं; प्रणश्यति: नष्ट होता।

हिंदी अनुवाद

जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता और वह मेरे लिए नष्ट नहीं होता।

English Translation

For one who sees Me everywhere and sees everything in Me, I am never lost to him, nor is he ever lost to Me.

टीका / Commentary

भगवान् कहते हैं कि जो सर्वत्र उन्हें देखता है और सब कुछ उनमें देखता है, उससे उनका अटूट संबंध स्थापित हो जाता है।