ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 33

श्लोक ३३ में अर्जुन मन की चंचलता के कारण योग की स्थिरता पर संदेह व्यक्त करते हैं।

संस्कृत श्लोक

अर्जुन उवाच । योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३॥

arjuna uvāca | yo 'yaṃ yogas tvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana | etasyāhaṃ na paśyāmi cañcalatvāt sthitiṃ sthirām ||33||

पदच्छेद / शब्दार्थ

अर्जुन: अर्जुन; उवाच: बोले; यः: जो; अयम्: यह; योगः: योग; त्वया: तुम्हारे द्वारा; प्रोक्तः: कहा गया; साम्येन: समता के रूप में; मधुसूदन: हे मधुसूदन; एतस्य: इसका; अहम्: मैं; न: नहीं; पश्यामि: देखता हूँ; चञ्चलत्वात्: चंचलता के कारण; स्थितिम्: स्थिति; स्थिराम्: स्थिर।

हिंदी अनुवाद

अर्जुन बोले: हे मधुसूदन! आपने समता रूप जिस योग का वर्णन किया है, उसकी स्थिर स्थिति मैं नहीं देख पाता, क्योंकि मन चंचल है।

English Translation

Arjuna said: O Madhusūdana, the yoga of equanimity which you have taught – I do not see its steady continuance, because of the restlessness of the mind.

टीका / Commentary

अर्जुन को संदेह है कि चंचल मन को वश में करना असंभव-सा है।