ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 34
श्लोक ३४ में अर्जुन मन को वायु के समान वश में करना कठिन बताते हैं।
संस्कृत श्लोक
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४॥
cañcalaṃ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavad dṛḍham | tasyāhaṃ nigrahaṃ manye vāyor iva su-duṣkaram ||34||
पदच्छेद / शब्दार्थ
चञ्चलम्: चंचल; हि: निश्चय ही; मनः: मन; कृष्ण: हे कृष्ण; प्रमाथि: प्रमाथी (क्षोभ उत्पन्न करने वाला); बलवत्: बलवान; दृढम्: दृढ़; तस्य: उसका; अहम्: मैं; निग्रहम्: निग्रह; मन्ये: मानता हूँ; वायोः: वायु के; इव: समान; सुदुष्करम्: अत्यन्त कठिन।
हिंदी अनुवाद
क्योंकि मन चंचल, प्रमाथी (क्षोभकारी), बलवान् और दृढ़ है, हे कृष्ण! मैं इसे वायु के समान वश में करना अति कठिन समझता हूँ।
English Translation
For the mind is very restless, turbulent, strong and obstinate, O Kṛṣṇa. I consider it as difficult to control as the wind.
टीका / Commentary
अर्जुन मन की प्रकृति का वर्णन करते हैं – चंचल, प्रमाथी, बलवान्, दृढ़, और वायु के समान दुर्निवार।