ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 35
श्लोक ३५ में कृष्ण मन को वश में करने के उपाय बताते हैं – अभ्यास और वैराग्य।
संस्कृत श्लोक
श्री भगवानुवाच । असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५॥
śrī-bhagavān uvāca | asaṃśayaṃ mahā-bāho mano durnigrahaṃ calam | abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate ||35||
पदच्छेद / शब्दार्थ
श्री भगवान् उवाच: श्री भगवान् ने कहा; असंशयम्: निःसंदेह; महाबाहो: हे महाबाहो; मनः: मन; दुर्निग्रहम्: दुर्निग्रह (कठिनाई से निग्रह किए जाने योग्य); चलम्: चंचल; अभ्यासेन: अभ्यास के द्वारा; तु: तो; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; वैराग्येण: वैराग्य के द्वारा; च: और; गृह्यते: वश में किया जाता है।
हिंदी अनुवाद
श्री भगवान् बोले: हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और दुर्निग्रह (कठिनाई से वश में होने वाला) है, हे कौन्तेय! परन्तु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा यह वश में किया जा सकता है।
English Translation
The Blessed Lord said: O mighty-armed, undoubtedly the mind is difficult to control and restless; but by practice, O son of Kuntī, and by dispassion, it can be controlled.
टीका / Commentary
कृष्ण अर्जुन की शंका का समाधान करते हैं: मन कठिन है, पर अभ्यास और वैराग्य से वश में हो सकता है।