श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 35

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 38 मिनट का पठन 151 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्री भगवानुवाच । असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
श्री भगवान् उवाच
श्री भगवान् ने कहा
असंशयम्
निःसंदेह
महाबाहो
हे महाबाहो
मनः
मन
दुर्निग्रहम्
दुर्निग्रह (कठिनाई से निग्रह किए जाने योग्य)
चलम्
चंचल
अभ्यासेन
अभ्यास के द्वारा
तु
तो
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
वैराग्येण
वैराग्य के द्वारा
च
और
गृह्यते
वश में किया जाता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्री भगवान् बोले: हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और दुर्निग्रह (कठिनाई से वश में होने वाला) है, हे कौन्तेय! परन्तु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा यह वश में किया जा सकता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

प्रस्तावना: मन की चंचलता और सनातन मुक्ति का मार्ग

भारतीय सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में 'मन' को ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष दोनों का मूल कारण माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय, जिसे 'ध्यानयोग' या 'आत्मसंयमयोग' के नाम से जाना जाता है, उसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवजाति को मानसिक नियंत्रण का सबसे वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सूत्र प्रदान करते हैं। जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष यह गंभीर प्रश्न रखा कि वायु के समान वेगवान, बलवान और हठी मन को वश में करना उसी प्रकार असंभव है जैसे हवा को रोकना, तब भगवान श्रीकृष्ण ने करुणा और प्रेम से भरकर इस शाश्वत सत्य का उद्घोष किया। यह श्लोक केवल एक धार्मिक मंत्र नहीं है, बल्कि यह मानव मनोविज्ञान का वह सर्वोच्च शिखर है, जो आधुनिक युग की मानसिक अशांति, तनाव, अवसाद (Depression) और अनिद्रा जैसी समस्याओं का अचूक आध्यात्मिक समाधान प्रस्तुत करता है।

इस श्लोक का सांस्कृतिक और दार्शनिक महत्व इस बात में निहित है कि यह किसी भी मनुष्य को निराशा के गर्त से बाहर निकालकर आत्म-सामर्थ्य की ओर प्रेरित करता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'महाबाहो' (हे पराक्रमी बाहुओं वाले) और 'कौन्तेय' (कुंती पुत्र) जैसे संबोधन देकर यह स्मरण कराते हैं कि तुम उस कुल के हो जहाँ पुरुषार्थ और साहस रग-रग में प्रवाहित है। मन का स्वभाव चंचल होना स्वाभाविक है, और यह बात भगवान स्वयं स्वीकार करते हैं—'असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्' (हे महाबाहु! इसमें कोई संदेह नहीं कि मन चंचल और कठिनाई से वश में होने वाला है)। परंतु वे यहीं नहीं रुकते, बल्कि इसके समाधान के रूप में 'अभ्यास' (निरंतर पुनरावृत्ति और साधना) और 'वैराग्य' (मोह का त्याग और अनासक्ति) रूपी दो महान पंख प्रदान करते हैं, जिनके सहारे जीवात्मा इस संसार सागर को पार कर सकती है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्री भगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्。
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ ३५॥


(पदच्छेद: श्री भगवान् उवाच, असंशयम्, महाबाहो, मनः, दुर्निग्रहम्, चलम्, अभ्यासेन, तु, कौन्तेय, वैराग्येण, च, गृह्यते।)

पाठ करने की विधि एवं नियम:
  • प्रातः काल ब्रह्म बेला में स्नान कर पवित्र श्वेत या पीले वस्त्र धारण करें।
  • अपने आराध्य भगवान श्रीकृष्ण या विष्णु के चित्र के समक्ष शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • तुलसी की माला या रुद्राक्ष माला से इस श्लोक का न्यूनतम 108 बार (एक माला) मानसिक या उपांश जप करें।
  • जप के उपरांत शांत चित्त से भगवान का ध्यान करें और मन को अपने श्वासों पर केंद्रित करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदों और उपनिषदों का सार छिपा हुआ है। नीचे दी गई सारणी के माध्यम से इसके प्रत्येक पद के शाब्दिक और तात्त्विक अर्थ को समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
श्री भगवानुवाच श्री भगवान ने कहा परब्रह्म परमेश्वर श्रीकृष्ण जो कि संपूर्ण ज्ञान के सागर और जगत के नियंता हैं, वे स्वयं अर्जुन की जिज्ञासा का समाधान कर रहे हैं।
असंशयं बिना किसी संदेह के / निःसंदेह भगवान अर्जुन की इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि मन वास्तव में बहुत चंचल है। यहाँ कोई दोराय नहीं है, यह एक शाश्वत मनोवैज्ञानिक सत्य है।
महाबाहो हे महाबाहु (पराक्रमी भुजाओं वाले) अर्जुन को उनकी वीरता का स्मरण कराना ताकि वे यह न समझें कि वे कमजोर हैं। विकट से विकट मन को भी परास्त करने की क्षमता इस शरीर में विद्यमान है।
मनः मन (अंतःकरण का मुख्य हिस्सा) मन जो इंद्रियों का राजा है, जो एक पल में स्वर्ग और दूसरे पल में पाताल की सैर कर आता है, वही यहाँ विचार का केंद्र है।
दुर्निग्रहम् कठिनाई से वश में होने वाला जिसे आसानी से काबू में न किया जा सके। जैसे जंगली घोड़े को साधना कठिन होता है, वैसे ही मन को रोकना अत्यंत दुष्कर कार्य है।
चलम् चंचल, अस्थिर, हिलने वाला वायु के समान जिसका कोई एक ठिकाना न हो। जो हर क्षण विषय-विकारों और बाहरी वस्तुओं की ओर भागता रहता है।
अभ्यासेन निरंतर अभ्यास से / बार-बार के प्रयास से जिस प्रकार बूंद-बूंद से घड़ा भरता है और लगातार अभ्यास से कठिन से कठिन विद्या आ जाती है, उसी प्रकार ध्यान की पुनरावृत्ति से मन थमता है।
तु लेकिन / परंतु (निश्चय ही) यह पद एक सकारात्मक मोड़ देता है। जहाँ एक ओर मन की चंचलता स्वीकार की गई है, वहीं 'तु' कहकर समाधान का द्वार खोल दिया जाता है।
कौन्तेय हे कुंतीपुत्र अर्जुन कुंती के पुत्र होने के नाते अर्जुन के भीतर पराक्रम और धर्मनिष्ठा की जो विरासत है, उसे जगाने के लिए यह आत्मीय संबोधन है।
वैराग्येण च और वैराग्य के द्वारा (अनासक्ति से) संसार की असारता को समझते हुए भोगों के प्रति लालसा का त्याग करना वैराग्य है। जब तक भोगों की इच्छा रहेगी, मन स्थिर नहीं हो सकता।
गृह्यते वश में किया जाता है / पकड़ा जाता है नियंत्रित हो जाता है। जैसे कोई प्रशिक्षित महावत अपने नियंत्रण में हाथी को कर लेता है, वैसे ही साधक अपने मन को पूरी तरह साध लेता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय का यह संवाद कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में उस समय उत्पन्न हुआ जब दोनों सेनाएं आमने-सामने थीं। महाभारत के महान ग्रंथ में यह प्रसंग 'भीष्म पर्व' के अंतर्गत आता है। कौरव और पांडव सेनाओं के बीच गीता का यह अमृत संवाद महर्षि वेदव्यास के दिव्य स्मरण और संजय की दिव्य दृष्टि के माध्यम से हमें प्राप्त हुआ है। अर्जुन, जो कि उस समय विषाद और अवसाद से घिरे हुए थे, अपने जीवन के सबसे बड़े कर्तव्य और मानसिक धर्म संकट से जूझ रहे थे।

पाँचवें और छठे अध्याय के प्रारंभ में जब भगवान श्रीकृष्ण संन्यास और योग (कर्मयोग एवं ध्यानयोग) के मार्ग का वर्णन करते हैं, तब अर्जुन के मन में एक व्यावहारिक और तार्किक प्रश्न उठता है। अर्जुन कहते हैं—'चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥' (हे कृष्ण! यह मन अत्यंत चंचल, प्रमथनशील, बलवान और दृढ़ है। इसका वश में करना मैं वायु को रोकने के समान अत्यंत दुष्कर मानता हूँ)। अर्जुन का यह प्रश्न हर उस साधक का प्रश्न है जो आज के आधुनिक युग में अपने विचारों को नियंत्रित करने का प्रयास करता है।

इस ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंग में महर्षि वेदव्यास ने यह दर्शाया है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कभी यह झूठा आश्वासन नहीं दिया कि मन को साधना बहुत आसान है। उन्होंने यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए पहले मन की दुर्निग्रहता (कठिनाई) को स्वीकार किया और फिर 'अभ्यास' और 'वैराग्य' का अचूक अस्त्र प्रदान किया। पुराणों और उपनिषदों में भी—जैसे कठोपनिषद में रथ के रूप में शरीर और मन की उपमा दी गई है—यही शिक्षा दी गई है कि यदि विवेक रूपी सारथी मजबूत हो और अभ्यास रूपी लगाम कसी हुई हो, तो चंचल घोड़ों रूपी इंद्रियों और मन को रास्ते से भटकाने से रोका जा सकता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

मानसिक शांति और स्थिरता

इस श्लोक का नियमित मनन और पाठ करने से मस्तिष्क की तरंगे शांत होती हैं। आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि सकारात्मक मंत्रों और श्लोकों के उच्चारण से तनाव हार्मोन (Cortisol) कम होते हैं और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।

आत्म-अनुशासन और एकाग्रता में वृद्धि

'अभ्यास' का मार्ग अपनाने से छात्र, पेशेवर और गृहस्थ सभी अपने जीवन के लक्ष्यों के प्रति अधिक केंद्रित हो जाते हैं। यह श्लोक बिखरे हुए विचारों को एक बिंदु पर केंद्रित करने की अद्भुत शक्ति प्रदान करता है।

वैराग्य और मोह का शमन

संसार की नश्वरता और भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक लगाव को यह श्लोक संतुलित करता है। 'वैराग्य' का अर्थ पलायन नहीं, बल्कि चीजों को उनके वास्तविक रूप में देखना और अनासक्त भाव से कर्म करना है।

कर्मिक शुद्धि और दैवीय कृपा

जब मन वश में होता है, तब पापकर्मों की प्रवृत्ति स्वतः समाप्त हो जाती है। इस पवित्र मंत्र के जप से साधक की आंतरिक ऊर्जा शुद्ध होती है और उसे भगवान श्रीकृष्ण की अहैतुरी कृपा का अनुभव होता है।

भय, चिंता और अवसाद से मुक्ति

भविष्य की चिंता और भूतकाल के पछतावे से ग्रस्त मन को वर्तमान में लाने का सबसे उत्तम साधन गीता का यह ध्यानयोग श्लोक है, जो भयमुक्त जीवन की नींव रखता है।

इच्छाशक्ति (Willpower) का विकास

बार-बार गिरने पर भी पुनः उठने और अभ्यास जारी रखने का संकल्प ही इस श्लोक की सबसे बड़ी देन है, जिससे मनुष्य की आंतरिक इच्छाशक्ति अटूट हो जाती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस प्रतिष्ठित ज्ञानकोश खंड में प्रस्तुत सामग्री प्राचीन वैदिक साहित्यों, आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और श्रीमद भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (विशेषकर गीता प्रेस गोरखपुर और संत ज्ञानेश्वर महाराज के ज्ञानेश्वरी भावार्थ) के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारे विद्वान संस्कृत भाषाविदों और सनातन आचार्यों ने यह सुनिश्चित किया है कि पाठकों तक जो अर्थ और व्याख्या पहुँचे, वह पूरी तरह से शुद्ध, तार्किक, शास्त्रीय मानदंडों के अनुरूप और आधुनिक जीवनशैली में व्यावहारिक रूप से उपयोगी हो।

हम किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण या अप्रमाणिक दावों से दूर रहकर शुद्ध वेदान्त दर्शन और भक्ति मार्ग का प्रामाणिक बोध कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह मार्गदर्शक लेख पाठकों को मानसिक स्वास्थ्य, आत्म-संयम और आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करने के उद्देश्य से अत्यंत परिश्रम और निष्ठा के साथ तैयार किया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के छठे अध्याय के 35वें श्लोक में मन को वश में करने के दो अत्यंत शक्तिशाली उपाय बताए हैं—पहला 'अभ्यास' (यानी निरंतर और बार-बार साधना का प्रयास करना) और दूसरा 'वैराग्य' (यानी संसार के भौतिक विषयों और भोगों के प्रति अनासक्ति या मोह का त्याग)।

उत्तर: हाँ, बिल्कुल। आज के आधुनिक युग में डिजिटल विचलितियों (Digital Distractions), सोशल मीडिया और भागदौड़ भरी जिंदगी के कारण मन और अधिक चंचल हो गया है। ऐसे में ध्यान (Meditation), अपने कार्यों के प्रति सचेत रहना (Mindfulness) और भौतिक चीजों के प्रति अत्यधिक मोह न रखना ही आधुनिक संदर्भ में 'अभ्यास और वैराग्य' का व्यावहारिक रूप है, जो अत्यधिक प्रभावी सिद्ध होता है।

उत्तर: इस श्लोक का जाप करने के लिए प्रातः काल स्नान करके शुद्ध अवस्था में शांत चित्त से बैठना चाहिए। आप इसे प्रतिदिन कम से कम 108 बार (एक माला) जप सकते हैं। जप के साथ-साथ इसके अर्थ पर विचार करना और अपने दैनिक जीवन में अनुशासन अपनाना इसके प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है।

उत्तर: सनातन दर्शन में वैराग्य का अर्थ कभी भी घर-परिवार या जिम्मेदारियों से भागना नहीं है। वैराग्य का वास्तविक अर्थ है—अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन करना, परंतु मन में यह भाव रखना कि संसार की कोई भी वस्तु या व्यक्ति स्थायी नहीं है। भोगों में आसक्त न होकर केवल परमात्मा और अपने आंतरिक स्वरूप में स्थित रहना ही सच्चा वैराग्य है।

उत्तर: श्रीमद्भगवद्गीता का छठा अध्याय मुख्य रूप से 'ध्यानयोग' या 'आत्मसंयमयोग' के नाम से जाना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने आसन, प्राणायाम, ध्यान, आहार-विहार के नियम और मन को वश में करने की संपूर्ण योग प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया है।

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संकलन एवं संपादन: Bhaktilok Editorial Board | श्री कृष्णार्पणमस्तु

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

श्री भगवान् ने कहा: हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और वश में करना कठिन है, हे कुन्तीपुत्र! परन्तु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा यह वश में किया जा सकता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

मन की चंचलता स्वाभाविक है, लेकिन निरंतर अभ्यास और विषयों से वैराग्य के द्वारा इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 35 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 35/47 74% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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