ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 36
श्लोक ३६ में कहा गया है कि संयत चित्त वाला ही योग प्राप्त कर सकता है।
संस्कृत श्लोक
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६॥
asaṃyatātmanā yogo duṣprāpa iti me matiḥ | vaśyātmanā tu yatatā śakyo 'vāptum upāyataḥ ||36||
पदच्छेद / शब्दार्थ
असंयतात्मना: असंयत (वश में न किए हुए) चित्त वाले द्वारा; योगः: योग; दुष्प्रापः: कठिनाई से प्राप्त होने वाला; इति: ऐसा; मे: मेरी; मतिः: मति (राय); वश्यात्मना: वश में किए हुए चित्त वाले द्वारा; तु: तो; यतता: प्रयत्न करते हुए; शक्यः: शक्य; अवाप्तुम्: प्राप्त करने के लिए; उपायतः: उपाय से।
हिंदी अनुवाद
असंयत चित्त वाले के लिए योग दुष्प्राप्य है, ऐसी मेरी सम्मति है; किन्तु वश में किए हुए चित्त वाला प्रयत्नशील पुरुष उचित साधन से उसे प्राप्त कर सकता है।
English Translation
In My opinion, yoga is hard to attain for one whose mind is unsubdued; but for one who has controlled the mind and strives by proper means, it is attainable.
टीका / Commentary
योग की प्राप्ति के लिए मन का संयत होना आवश्यक है। संयत चित्त वाला साधक उचित साधनों से योग प्राप्त कर सकता है।