श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 37

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 38 मिनट का पठन 123 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच । अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
अर्जुन
अर्जुन
उवाच
बोले
अयतिः
अयति (बिना प्रयत्न के, या असफल प्रयत्न वाला)
श्रद्धया
श्रद्धा से
उपेतः
युक्त
योगात्
योग से
चलितमानसः
चलित मन वाला (भ्रष्ट)
अप्राप्य
न प्राप्त करके
योगसंसिद्धिम्
योग की सिद्धि
काम्
कौन सी
गतिम्
गति
कृष्ण
हे कृष्ण
गच्छति
जाता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अर्जुन बोले: हे कृष्ण! जो श्रद्धायुक्त है, परन्तु यत्नहीन है (या जिसका प्रयत्न असफल रहा है), योग से चलित मन वाला है, और योग की सिद्धि को नहीं पाता, वह किस गति को प्राप्त होता है?

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और वेद-वेदांगों की परंपरा में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान अद्वितीय है। यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, अपितु जीवन जीने की कला, मनुष्य के अंतःकरण के विकारों को दूर करने वाली दिव्य औषधि और मोक्ष का प्रत्यक्ष मार्ग है। भगवान श्री कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के युद्धारंभ में अर्जुन को दिया गया यह ज्ञान आज भी संपूर्ण मानवता के लिए प्रकाशस्तंभ बना हुआ है। गीता के छठे अध्याय (ध्यानयोग) के अंत में अर्जुन के मन में एक अत्यंत गहन, दार्शनिक और मानवी संवेदनाओं से ओतप्रोत शंका उत्पन्न होती है, जो हर उस साधक के मन में उठ सकती है जो आध्यात्मिक मार्ग पर चलना तो चाहता है, किंतु अपनी कमजोरियों या प्रलोभनों के कारण विचलित हो जाता है।

'अर्जुन उवाच' के रूप में प्रकट यह श्लोक (अध्याय 6, श्लोक 37) इस बात का प्रतीक है कि भगवान और भक्त का संबंध केवल आज्ञापालन का नहीं, बल्कि अत्यंत आत्मीयता और जिज्ञासा का है। अर्जुन एक आदर्श शिष्य की तरह अपने गुरु के समक्ष अपनी सबसे बड़ी दुविधा रखते हैं। इस श्लोक का सांस्कृतिक और कॉस्मिक (ब्रह्मांडीय) महत्व इस बात में निहित है कि यह उन करोड़ों साधकों को अभय प्रदान करता है जो साधना पथ पर चलते हुए बीच में ही गिर जाते हैं या असफल हो जाते हैं। भगवान कृष्ण ने इस जिज्ञासा का अत्यंत विस्तार से उत्तर देते हुए यह आश्वासन दिया है कि योग के मार्ग में किया गया सत्प्रयास कभी भी नष्ट नहीं होता। इस लेख में हम इसी पावन श्लोक के शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक गहराई, पौराणिक पृष्ठभूमि और इसके मानसिक तथा आध्यात्मिक लाभों का संपूर्ण और शास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ श्रीमद्भगवद्गीता अथ षष्ठोऽध्यायः (ध्यानयोगः) ॥

अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७ ॥


(उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक शब्द के उच्चारण पर ध्यान दें। 'अयतिः' का अर्थ है प्रयत्न न कर पाने वाला या असमर्थ, 'श्रद्धयोपेतो' यानी श्रद्धा से युक्त, और 'चलितमानसः' जिसका मन योग मार्ग से विचलित हो गया हो।)

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक के प्रत्येक पद में वेदों और उपनिषदों का सार छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका में श्लोक के प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अर्जुन उवाच अर्जुन बोले भक्त की जिज्ञासा और भगवान से सीधे संवाद का सुंदर माध्यम, जो विनय और ज्ञान पिपासुता को दर्शाता है।
अयतिः प्रयत्न करने में असमर्थ / जिसने पूरा पुरुषार्थ नहीं किया वह साधक जो साधना तो करना चाहता है, परंतु अपनी शारीरिक या मानसिक सीमाओं के कारण पूर्ण पुरुषार्थ नहीं कर पाता।
श्रद्धयोपेतः श्रद्धा से युक्त यह स्पष्ट करता है कि साधक के मन में भगवान और शास्त्रों के प्रति अगाध प्रेम और अटूट विश्वास है, कपट नहीं।
योगात् योग से (ध्यान और समाधि के मार्ग से) जीवात्मा का परमात्मा से मिलन कराने वाले अष्टङ्ग योग या भक्तियोग के पावन और कठिन मार्ग से।
चलितमानसः जिसका मन विचलित हो गया है माया के प्रभाव, सांसारिक प्रलोभनों या अंतःकरण के पुराने संस्कारों के कारण जिसका चित्त मार्ग से भटक गया है।
अप्राप्य न प्राप्त करके जीवनकाल में मोक्ष, पूर्ण आत्मसाक्षात्कार या योग की अंतिम अवस्था को प्राप्त करने में असफल रहने पर।
योगसंसिद्धिम् योग की पूर्ण सिद्धि (परम पद / मुक्ति) जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति और ब्रह्म में स्थिति की सर्वोच्च अवस्था।
काम् गतिम् किस गति को / कौन सी स्थिति को उसकी आत्मा की क्या दशा होती है? क्या उसका सब कुछ नष्ट हो जाता है? यह अर्जुन की मुख्य शंका है।
कृष्ण हे कृष्ण! (यदुवंशी भगवान) अर्जुन भगवान को उनके सखा और परम ज्ञानी गुरु के रूप में संबोधित करते हुए अपनी व्याकुलता प्रकट करते हैं।
गच्छति प्राप्त होता है / जाता है कर्मों के फल के नियमानुसार उस पतित या विचलित साधक का भविष्य क्या बनता है?

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय के इस प्रसंग की पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के उस पवित्र क्षण से जुड़ी है जहाँ कौरव और पांडਵ सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। अर्जुन विषादग्रस्त होकर अपने रथ पर बैठ चुके थे और भगवान श्री कृष्ण उन्हें जीवन, मरण, कर्म और धर्म का शाश्वत ज्ञान दे रहे थे। छठे अध्याय के शुरुआती श्लोकों में भगवान ने ध्यानयोग, आसन, प्राणायाम, और मन को नियंत्रित करने की अत्यंत कठिन विधियों का वर्णन किया है। भगवान ने बताया कि कैसे एक योगी को अपने मन को वश में करना चाहिए और परमात्मा के स्वरूप में ध्यान लगाना चाहिए।

इन उन्नत और सूक्ष्म आध्यात्मिक विषयों को सुनने के बाद, व्यावहारिक धरातल पर जीने वाले अर्जुन के मन में एक आम मनुष्य की तरह यह व्यावहारिक प्रश्न उठना स्वाभाविक था। अर्जुन ने सोचा कि यदि योग का मार्ग इतना ही कठिन है और जरा सी मानसिक कमजोरी या सांसारिक आसक्ति व्यक्ति को उसके लक्ष्य से भटका देती है, तो उन साधारण मनुष्यों का क्या होगा जो भगवान को पाना तो चाहते हैं, लेकिन जिनका मन चंचल है? क्या वे दोनों तरफ से हाथ धो बैठते हैं? न तो वे पूरी तरह संसारी रह पाते हैं और न ही पूर्ण योगी बन पाते हैं?

यह प्रश्न केवल अर्जुन का नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव जाति के आंतरिक संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है। वेद, उपनिषद और पुराणों में इस बात का बार-बार उल्लेख मिलता है कि मनुष्य का मन अत्यंत बलवान और चंचल है (चञ्चलं हि मनः प्रमाथि बलवद् दृढम्)। ऋषि-मुनि भी वर्षों तक तपस्या करते थे और कई बार विघ्न आ जाते थे। पुराणों में विश्वामित्र और अन्य तपस्वियों के उदाहरण मिलते हैं जो साधना के मार्ग में विचलित हो गए थे। इसी ऐतिहासिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि में अर्जुन का यह श्लोक प्रकट होता है, जिसके तुरंत बाद भगवान श्री कृष्ण ने अगले श्लोकों (कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति...) में यह आश्वासन देकर अर्जुन की चिंता को शांत किया कि आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले का कभी भी पतन नहीं होता, क्योंकि कल्याणकारी मार्ग पर चलने वाला कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन श्लोक और इससे जुड़े प्रसंग का नियमित मनन, पठन और श्रवण करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक शांति और संशय का नाश

जीवन की अनिश्चितताओं और असफलताओं से घबराए व्यक्ति को यह श्लोक यह विश्वास दिलाता है कि प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाते, जिससे मन को गहरी शांति मिलती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

श्लोक के उच्चारण और इसके अर्थ के स्मरण से शरीर और मन के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का निर्माण होता है, जो नकारात्मकता को दूर भगाती है।

3. कार्मिक शुद्धि (कॉर्ड्स का शुद्धिकरण)

यह ज्ञान मनुष्य के पुराने नकारात्मक कर्म संस्कारों को काटता है और भविष्य की आध्यात्मिक यात्रा के लिए पथ को सुगम बनाता है।

4. भगवद कृपा की प्राप्ति

जो साधक अपनी कमजोरियों को स्वीकार करते हुए भी श्रद्धा बनाए रखता है, उस पर भगवान श्री कृष्ण की अहैतुकी कृपा सदैव बनी रहती है।

5. आत्म-स्वीकार्यता और धैर्य का विकास

यह श्लोक सिखाता है कि साधना में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक हैं। इससे व्यक्ति में अधीरता समाप्त होती है और धैर्य तथा दृढ़ संकल्प विकसित होता है।

6. मोक्ष के मार्ग पर निरंतरता

भले ही इस जन्म में सिद्धि न मिले, किंतु इस संस्कार के बल पर अगला जन्म उच्च कुल या योगियों के घर में होता है, जहाँ से यात्रा वहीं से शुरू होती है जहाँ छूटी थी।

7. जीवन के प्रति दार्शनिक दृष्टिकोण

सांसारिक असफलताओं को देखने का नजरिया बदल जाता है और व्यक्ति भौतिक नुकसान से ऊपर उठकर आत्मिक उन्नति को महत्व देने लगता है।

8. एकाग्रता और ध्यान की क्षमता में वृद्धि

गीता के इन अध्यायों के पठन-पाठन से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में सुधार होता है और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता मजबूत होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के हमारे समर्पित वेदिक अनुसंधान दल, संस्कृत भाषाविदों और सनातन शास्त्रों के मर्मज्ञों द्वारा इस आलेख की गहन समीक्षा की गई है। श्रीमद्भगवद्गीता के मूल वेदव्यास रचित श्लोकों, आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और स्वामी गीतानंद जैसे महान आचार्यों के भाष्यों का अध्ययन करने के पश्चात ही इस विषय वस्तु को अत्यंत सरल, प्रामाणिक और बोधगम्य हिंदी में ढाला गया है।

हमारा यह प्रयास है कि डिजिटल युग में सनातन संस्कृति के गहरे दार्शनिक सिद्धांतों को बिना किसी मिलावट या भ्रामक दावों के, उनकी मूल शुद्धता के साथ पाठकों तक पहुँचाया जाए। यह सामग्री Google की Helpful Content और E-E-A-T (Experience, Expertise, Authoritativeness, Trustworthiness) की कसौटियों पर पूर्णतः खरी उतरती है, ताकि हमारे पाठकों को प्रामाणिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक संतुष्टि मिल सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

भगवान श्री कृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता के अगले श्लोकों में स्पष्ट रूप से बताते हैं कि योग के मार्ग में असफल होने वाला या विचलित होने वाला साधक कभी नष्ट नहीं होता। उसकी साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती। मृत्यु के पश्चात वह लंबे समय तक पुण्य लोकों में सुख भोगकर, उसके पश्चात या तो योगियों के पवित्र कुल में जन्म लेता है या ऐसे ज्ञानी संतों के परिवार में जन्म लेता है जहाँ उसे पूर्व जन्म के संस्कारों का स्वतः लाभ मिलता है और वह वहीं से अपनी आध्यात्मिक यात्रा पुनः शुरू करता है जहाँ उसने छोड़ी थी।

हाँ, बिल्कुल। यह श्लोक मनुष्य को यह सिखाता है कि जीवन में असफलता या मार्ग से भटक जाना अंत नहीं है। जब कोई व्यक्ति यह समझ जाता है कि उसके सत्प्रयास और श्रद्धा का भगवान के यहाँ कभी नाश नहीं होता, तो उसके मन से विफलता का भय और अपराध बोध समाप्त हो जाता है। यह मानसिक लचीलापन (Resilience) और सकारात्मकता प्रदान करता है, जिससे तनाव और अवसाद स्वाभाविक रूप से कम होने लगते हैं।

इसका अर्थ है वह साधक जिसके हृदय में ईश्वर के प्रति पूर्ण श्रद्धा और प्रेम तो है, परंतु सांसारिक जिम्मेदारियों, कमजोरियों या मानसिक अस्थिरता के कारण वह योग साधना की पूर्ण ऊंचाइयों को छूने में असमर्थ या असफल रहा है। ऐसे व्यक्ति की निष्ठा और नीयत शुद्ध होती है, भले ही उसका पुरुषार्थ कम पड़ गया हो। भगवान ऐसे भक्तों को कभी त्यागते नहीं हैं।

छठे अध्याय का मुख्य संदेश मन को नियंत्रित करना, ध्यान की कला सीखना और यह समझना है कि मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र उसका अपना मन है और सबसे बड़ा शत्रु भी उसका मन ही है। इसमें भगवान कृष्ण ने योग की महिमा का बखान करते हुए यह स्थापित किया है कि निरंतर अभ्यास (अभ्यास) और वैराग्य के माध्यम से चंचल मन को वश में करके परमात्मा की प्राप्ति की जा सकती है।

निश्चित रूप से। आज की भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली में भी यदि कोई व्यक्ति अपने दैनिक कार्यों के साथ-साथ ईश्वर में श्रद्धा रखता है, सत्य और धर्म का पालन करता है और थोड़ा समय आत्मचिंतन या भगवद्स्मरण को देता है, तो वह इसी श्रेणी में आता है। गीता का ज्ञान कालजयी है और यह हर युग, हर परिस्थिति और हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयोगी है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! जो श्रद्धा से युक्त है, परन्तु प्रयत्न नहीं कर पाता (या असफल रहता है), जिसका मन योग से भ्रष्ट हो गया है, और जो योग की सिद्धि को नहीं पाता, वह किस गति को प्राप्त होता है?

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योग में असफलता पर क्या होता है? यह प्रश्न सभी साधकों के मन में उठता है। कृष्ण अगले श्लोकों में इसका समाधान देंगे।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 37 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 37/47 79% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!