ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 37
श्लोक ३७ में अर्जुन योगभ्रष्ट साधक की दशा के बारे में पूछते हैं।
संस्कृत श्लोक
अर्जुन उवाच । अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७॥
arjuna uvāca | ayatiḥ śraddhayopeto yogāc calita-mānasaḥ | aprāpya yoga-saṃsiddhiṃ kāṃ gatiṃ kṛṣṇa gacchati ||37||
पदच्छेद / शब्दार्थ
अर्जुन: अर्जुन; उवाच: बोले; अयतिः: अयति (बिना प्रयत्न के, या असफल प्रयत्न वाला); श्रद्धया: श्रद्धा से; उपेतः: युक्त; योगात्: योग से; चलितमानसः: चलित मन वाला (भ्रष्ट); अप्राप्य: न प्राप्त करके; योगसंसिद्धिम्: योग की सिद्धि; काम्: कौन सी; गतिम्: गति; कृष्ण: हे कृष्ण; गच्छति: जाता है।
हिंदी अनुवाद
अर्जुन बोले: हे कृष्ण! जो श्रद्धायुक्त है, परन्तु यत्नहीन है (या जिसका प्रयत्न असफल रहा है), योग से चलित मन वाला है, और योग की सिद्धि को नहीं पाता, वह किस गति को प्राप्त होता है?
English Translation
Arjuna said: O Kṛṣṇa, what is the fate of one who has faith but is not steadfast, whose mind wanders away from yoga, and who fails to attain perfection in yoga?
टीका / Commentary
अर्जुन की नई शंका: योग में असफल साधक की क्या गति होती है?