ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 38
श्लोक ३८ में अर्जुन योगभ्रष्ट के नाश की आशंका व्यक्त करते हैं।
संस्कृत श्लोक
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८॥
kaccin nobhaya-vibhraṣṭaś chinnābhram iva naśyati | apratiṣṭho mahā-bāho vimūḍho brahmaṇaḥ pathi ||38||
पदच्छेद / शब्दार्थ
कच्चित्: क्या?; न: नहीं; उभयविभ्रष्टः: दोनों से भ्रष्ट; छिन्नाभ्रम्: टूटे हुए बादल के समान; इव: जैसे; नश्यति: नष्ट होता है; अप्रतिष्ठः: बिना आधार का; महाबाहो: हे महाबाहो; विमूढः: मोहित; ब्रह्मणः: ब्रह्म के; पथि: मार्ग में।
हिंदी अनुवाद
हे महाबाहो! क्या वह ब्रह्म के मार्ग में मोहित हुआ उभयभ्रष्ट (दोनों से भ्रष्ट), बिना आधार का होकर, छिन्न-भिन्न बादल की भाँति नष्ट नहीं हो जाता?
English Translation
O mighty-armed Kṛṣṇa, does he not, being deluded on the path to Brahman, fall from both, and perish like a torn cloud, without any support?
टीका / Commentary
अर्जुन की आशंका: क्या योगभ्रष्ट व्यक्ति दोनों लोकों से भ्रष्ट होकर नष्ट हो जाता है?