ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 40

श्लोक ४० में कृष्ण आश्वासन देते हैं कि योगभ्रष्ट का विनाश नहीं होता।

संस्कृत श्लोक

श्री भगवानुवाच । पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४०॥

śrī-bhagavān uvāca | pārtha naiveha nāmutra vināśas tasya vidyate | na hi kalyāṇa-kṛt kaścid durgatiṃ tāta gacchati ||40||

पदच्छेद / शब्दार्थ

श्री भगवान् उवाच: श्री भगवान् ने कहा; पार्थ: हे पार्थ; न: नहीं; एव: ही; इह: इस लोक में; न: नहीं; अमुत्र: परलोक में; विनाशः: विनाश; तस्य: उसका; विद्यते: होता है; न: नहीं; हि: निश्चय ही; कल्याणकृत्: कल्याण करने वाला; कश्चित्: कोई भी; दुर्गतिम्: दुर्गति को; तात: हे तात; गच्छति: जाता है।

हिंदी अनुवाद

श्री भगवान् बोले: हे पार्थ! उस (योगभ्रष्ट) का न तो इस लोक में विनाश होता है और न परलोक में। हे तात! कल्याण करने वाला कोई भी दुर्गति को नहीं प्राप्त होता।

English Translation

The Blessed Lord said: O Pārtha, there is no destruction for him in this world or in the next. For no one who does good, O dear one, ever comes to grief.

टीका / Commentary

भगवान् आश्वासन देते हैं कि कल्याण के मार्ग पर चलने वाले का कभी अहित नहीं होता, चाहे वह सिद्धि न भी पाए।