ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 41
श्लोक ४१ में योगभ्रष्ट के पुनर्जन्म का वर्णन है।
संस्कृत श्लोक
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१॥
prāpya puṇya-kṛtāṃ lokān uṣitvā śāśvatīḥ samāḥ | śucīnāṃ śrīmatāṃ gehe yoga-bhraṣṭo 'bhijāyate ||41||
पदच्छेद / शब्दार्थ
प्राप्य: प्राप्त करके; पुण्यकृताम्: पुण्य करने वालों के; लोकान्: लोकों को; उषित्वा: निवास करके; शाश्वतीः: बहुत (अनन्त) काल तक; समाः: वर्ष; शुचीनाम्: पवित्र; श्रीमताम्: सम्पन्न; गेहे: घर में; योगभ्रष्टः: योगभ्रष्ट; अभिजायते: उत्पन्न होता है।
हिंदी अनुवाद
बहुत वर्षों तक पुण्यात्माओं के लोकों में निवास करके, योगभ्रष्ट पुरुष शुद्ध और समृद्ध घर में जन्म लेता है।
English Translation
Having attained the worlds of the righteous and dwelt there for everlasting years, the one fallen from yoga is born again in a pure and prosperous family.
टीका / Commentary
योगभ्रष्ट पहले पुण्यलोकों में सुख भोगता है, फिर शुभ परिस्थितियों में जन्म लेता है, जहाँ वह अपनी साधना जारी रख सके।