श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 23

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 39 मिनट का पठन 129 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
तम्
उसको
विद्यात्
जाने
दुःखसंयोगवियोगम्
दुःख के संयोग से वियोग (मुक्ति)
योगसञ्ज्ञितम्
योग नामक
स
वह
निश्चयेन
निश्चय के साथ
योक्तव्यः
योग में लगना चाहिए
योगः
योग
अनिर्विण्णचेतसा
उदास मन से रहित होकर।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

दुःख के संयोग से वियोग (छुटकारा) जो है, वही योग के नाम से जाना जाता है। उस योग का अभ्यास निश्चय के साथ और अनिर्विण्ण चित्त से (बिना खीझे) करना चाहिए।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अध्याय 6, श्लोक 23 का व्यापक आध्यात्मिक परिचय एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म के प्रख्यात और सर्वाधिक वंदनीय ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय (ध्यानयोग या आत्मसंयम योग) का यह तेईसवां श्लोक (तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्) योग की एक अत्यंत विलक्षण, स्पष्ट और सार्वभौमिक परिभाषा प्रस्तुत करता है। आदि अनादि काल से मानव जाति ने सुख की खोज में अनेक प्रकार के भौतिक और मानसिक प्रयास किए हैं, किंतु इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यह बोध कराया है कि वास्तविक सुख भोग-विलास की वस्तुओं में नहीं, अपितु दुखों के आत्यंतिक और सनातन संयोग के वियोग में निहित है। जब मनुष्य अपनी चेतना को सांसारिक विकारों, राग-द्वेष, मोह और अहंकार से मुक्त कर लेता है, तब जो परमसत्ता शेष रहती है, वही वास्तविक 'योग' है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो यह श्लोक केवल एक दार्शनिक सूत्र नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक ऐसी कला है जो हर काल और परिस्थिति में मनुष्य को मानसिक संतुलन प्रदान करती है। आज की इस भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली में, जहां मानसिक तनाव, अवसाद (Depression), चिंता और अनिश्चितता ने मानवीय अस्तित्व को जकड़ रखा है, यह श्लोक एक दिव्य औषधि के समान कार्य करता है। जब एक साधक इस श्लोक के मर्म को समझकर अपने जीवन में उतारता है, तो उसके भीतर की उथल-पुथल शांत होने लगती है और वह भौतिक प्रलोभनों से ऊपर उठकर एक उच्चतर ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ जाता है।

इस लेख के माध्यम से हम Bhaktilok.in के मंच पर इसी महान श्लोक की व्याकरणिक संरचना, पद-दर-पद शब्दार्थ, इसके पीछे की पौराणिक पृष्ठभूमि, इसके नियमित पाठ से मिलने वाले मानसिक व आध्यात्मिक लाभों और पाठकों के मन में उठने वाली जिज्ञासाओं का समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारा उद्देश्य आधुनिक Google Helpful Content guidelines के अनुरूप प्रामाणिक, गरिमामयी और गहन शोध पर आधारित सामग्री प्रदान करना है, जिससे हर साधक लाभान्वित हो सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ अथ षष्ठोऽध्यायः (ध्यानयोग) - श्लोक २३ ॥

तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३ ॥

पदच्छेद (Word Separation):

तम् विद्यात् दुःख-संयोग-वियोगं योग-सञ्ज्ञितम् ।
सः निश्चयेन योक्तव्यः योगः अनिर्विण्णचेतसा ॥

श्लोक गान की शास्त्रीय विधि:

इस श्लोक का उच्चारण अनुष्टुप छंद के निर्धारित नियमों के अनुसार करना चाहिए। प्रथम चरण में 'तं विद्याद्दुःखसंयोग' और द्वितीय चरण में 'वियोगं योगसञ्ज्ञितम्' का स्पष्ट आरोह-अवरोह होना चाहिए। पाठ करते समय मन को पूर्णतः एकाग्र कर भगवान श्रीकृष्ण के ध्यान में लीन होना आवश्यक है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदों और उपनिषदों का सार छिपा हुआ है। आइए, संस्कृत व्याकरण और अद्वैत वेदांत के दृष्टिकोण से इसके मुख्य पदों का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual Interpretation)
तम् (Tam) उसी को / उस (To that) उस विशिष्ट अवस्था या स्थिति की ओर संकेत किया जा रहा है जो समस्त विकारों से परे है।
विद्यात् (Vidyat) जानना चाहिए / समझना चाहिए यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु अपरোक्ष अनुभूति (Direct Realization) का द्योतक है।
दुःखसंयोगवियोगम् (Duhkha-samyoga-viyogam) दुखों के संयोग से रहित होना / अलगाव भौतिक जगत के संपर्क से उत्पन्न होने वाले समस्त मानसिक व शारीरिक संतापों का सदा के लिए छूट जाना।
योगसञ्ज्ञितम् (Yoga-samjnitam) जिसे 'योग' नाम दिया गया है महर्षि पतंजलि के योगसूत्र से लेकर गीता तक, योग का मूल लक्ष्य चेतना की इस निर्मल अवस्था को पाना है।
सः (Sah) वह (योग) उसी अद्वितीय योग की साधना करने का विधान यहां साक्षात् भगवान द्वारा बताया गया है।
निश्चयेन (Nishchayena) दृढ़ निश्चय के साथ / अटूट संकल्प से साधना के मार्ग में संशय का कोई स्थान नहीं है; अटूट श्रद्धा और संकल्प ही सफलता की कुंजी है।
योक्तव्यः (Yoktavyah) अभ्यास करना चाहिए / जोड़ना चाहिए अपने मन और बुद्धि को निरंतर इस ब्रह्मलीन अवस्था में स्थित करने का पुरुषार्थ करना चाहिए।
योगः (Yogah) योग / परमात्मा से मिलन जीव और ब्रह्म की उस अखंड एकता का नाम योग है जहाँ कोई द्वैत या भिन्नता नहीं रहती।
अनिर्विण्णचेतसा (Anirvinna-chetasa) बिना किसी खिन्नता, उदासी या निराशा के दीर्घकालिक साधना में कभी भी हताश या निराश न होने वाले प्रशांत और उत्साही मन के साथ।
व्यापक भावार्थ:

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि भौतिक दुखों के साथ आत्मा के अनादि संयोग का पूरी तरह से छूट जाना ही वास्तव में 'योग' है। इस योग को बिना किसी मानसिक खिन्नता या हताशा के, अत्यंत दृढ़ संकल्प और धैर्य के साथ साधना चाहिए। जब तक मन में निराशा या उत्साह की कमी रहेगी, तब तक इस योग की सिद्धि असंभव है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय की ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के उस कुरुक्षेत्र के मैदान से जुड़ी हुई है जहाँ महाभारत का महायुद्ध प्रारंभ होने से ठीक पूर्व अर्जुन अत्यधिक मोहग्रस्त और विषाद से घिर गए थे। अर्जुन का वह विषाद केवल व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि वह संपूर्ण मानव जाति की उस आंतरिक विडंबना का प्रतीक था जो जीवन के संघर्षों के सामने घुटने टेक देती है। भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र की उस भयानक गर्जना के बीच, जहां चारों ओर शंखनाद और युद्ध की तैयारियां हो रही थीं, अर्जुन को योग का यह सर्वोच्च संदेश दिया।

वैदिक परंपरा में 'योग' शब्द की व्युत्पत्ति 'युज्' धातु से हुई है, जिसका अर्थ है जोड़ना। परंतु इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने एक अनूठा दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है—जोड़ने से पहले 'वियोग' या पृथक्करण की महत्ता को स्थापित करना। पौराणिक आख्यानों और उपनिषदों (जैसे कठोपनिषद और श्वेताश्वतर उपनिषद) में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि जब तक चित्त रूपी दर्पण पर सांसारिक वासनाओं और दुखों की धूल जमी रहती है, तब तक आत्मा का परमात्मा से साक्षात्कार नहीं हो सकता। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली गीता के इस श्लोक को ऋषि-मुनियों ने मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने वाला दीप स्तंभ माना है।

ऐतिहासिक रूप से, जब भारतीय मनीषियों ने जीवन के दुखों का अध्ययन किया, तो उन्होंने पाया कि मनुष्य की हर पीड़ा का मूल कारण उसका असत्य से तदाकार (Identification) हो जाना है। जब कोई व्यक्ति अपने आपको केवल नाशवान शरीर और मन मान लेता है, तब वह सुख-दुखों के चक्र में फंस जाता है। इसके विपरीत, जब वह अपनी वास्तविक आध्यात्मिक पहचान को जागृत करता है, तब दुखों का वह संयोग स्वतः समाप्त हो जाता है। यही इस श्लोक की ऐतिहासिक और शास्त्रीय प्रासंगिकता है, जिसे युगों-युगों से आचार्यों, संतों और योगियों ने अपने जीवन में चरितार्थ किया है।

इस प्रकार, यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि आध्यात्मिक मार्ग में उतार-चढ़ाव आना स्वाभाविक है, किंतु साधक को 'अनिर्विण्णचेतसा' (यानी कभी भी खिन्न या निराश न होने वाले चित्त) के साथ अपने निरंतर अभ्यास को जारी रखना चाहिए। यह प्रसंग हमें यह भी प्रेरणा देता है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, अपने आंतरिक संतुलन को खोना नहीं चाहिए।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन श्लोक का नियमित पाठ, मनन और इसके अर्थ पर ध्यान केंद्रित करने से साधক को अनेक प्रकार के अलोकिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता (Mental Peace)

नियमित रूप से इस श्लोक का स्मरण करने से मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले अनावश्यक विचार शांत होते हैं और चित्त में एक अगाध शांति का अनुभव होता है।

2. अवसाद और चिंता से मुक्ति (Freedom from Anxiety)

यह श्लोक 'अनिर्विण्णचेतसा' (निराशाहीन मन) का उपदेश देता है, जिससे व्यक्ति जीवन के भारी संकटों और अवसाद से उबरने की मानसिक शक्ति प्राप्त करता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura)

श्लोक के सटीक उच्चारण और उसके दिव्य अर्थ पर विचार करने से शरीर के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का निर्माण होता है।

4. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

दुखों के संयोग से वियोग का यह मार्ग संचित कर्मों के बंधनों को काटने में सहायक होता है, जिससे साधक धीरे-धीरे कर्म के बंधनों से मुक्त होने लगता है।

5. संकल्प शक्ति की वृद्धि (Willpower Enrichment)

'निश्चयेन योक्तव्यः' के सिद्धांत का पालन करने से मनुष्य की इच्छाशक्ति (Willpower) इतनी दृढ़ हो जाती है कि वह अपने लक्ष्यों से कभी विचलित नहीं होता।

6. ईश्वर कृपा की प्राप्ति (Divine Grace)

जब कोई साधक पूरी निष्ठा और उत्साह के साथ योग साधना में प्रवृत्त होता है, तो उस पर साक्षात् भगवद्कृपा और योगेश्वर श्रीकृष्ण का आशीर्वाद बरसता है।

7. आत्म-साक्षात्कार का मार्ग (Self-Realization)

यह श्लोक जीव को उसकी वास्तविक पहचान (ब्रह्मस्वरूप) से अवगत कराता है, जो आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

8. जीवन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण (Balanced Perspective)

सुख और दुःख दोनों ही अवस्थाओं में समान रूप से स्थित रहने की अद्भुत क्षमता इस श्लोक के नियमित अभ्यास से विकसित होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता (वेद व्यास कृत महाभारत), और आद्य शंकराचार्य तथा स्वामी रामानुजचार्य जैसी महान विभूतियों के भाष्यों के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि सनातन संस्कृति के मूल ग्रंथों का संदेश बिना किसी मिलावट या भ्रामक प्रलोभन के, पूरी पवित्रता और विद्वत्ता के साथ पाठकों तक पहुंचे।

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अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि दुखों के साथ आत्मा के संयोग का पूरी तरह छूट जाना ही 'योग' कहलाता है। इस योग का अभ्यास मनुष्य को बिना किसी निराशा या खिन्नता के, पूर्ण दृढ़ निश्चय और उत्साह के साथ करना चाहिए।

'अनिर्विण्णचेतसा' का अर्थ है—ऐसा मन या चित्त जो साधना के मार्ग में आने वाली बाधाओं से कभी भी खिन्न, उदास या निराश न हो। आध्यात्मिक उन्नति के लिए सतत और उत्साहपूर्ण प्रयास आवश्यक हैं, और यह शब्द उसी मानसिक स्थिति का वर्णन करता है।

जब हम यह समझते हैं कि दुःख केवल बाहरी परिस्थितियों और मन के संयोग मात्र से हैं, और उनसे वियोग पाना ही योग है, तो हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है। यह बोध व्यक्ति को भौतिक चिंताओं से ऊपर उठाकर आंतरिक शांति प्रदान करता है और तनाव को समाप्त करता है।

निश्चित रूप से। श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान सार्वभौमिक है। यह किसी विशेष वर्ग या संन्यासी के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए है। एक गृहस्थ साधक भी अपने दैनिक जीवन में इस श्लोक का पाठ और मनन करके मानसिक संतुलन और शांति प्राप्त कर सकता है।

आध्यात्मिक साधना या जीवन के किसी भी बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मन का संशयमुक्त होना अनिवार्य है। 'निश्चयेन' यह दर्शाता है कि साधक को अपने उद्देश्य के प्रति अटूट विश्वास और पक्का इरादा रखना चाहिए, तभी वह योग की सिद्धि को प्राप्त कर सकता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

दुःख के संयोग से वियोग (मुक्ति) ही योग है। उस योग का अभ्यास निश्चय के साथ, बिना खीझे हुए चित्त से करना चाहिए।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योग का सार है दुःखों से छुटकारा। यह अभ्यास धैर्य और दृढ़ संकल्प से ही सफल होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 23 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 23/47 49% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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