ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 24
श्लोक २४ में योग के लिए कामनाओं और इन्द्रियों के त्याग की आवश्यकता बताई गई है।
संस्कृत श्लोक
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४॥
saṅkalpa-prabhavān kāmāṃs tyaktvā sarvān aśeṣataḥ | manasaivendriya-grāmaṃ viniyamya samantataḥ ||24||
पदच्छेद / शब्दार्थ
सङ्कल्पप्रभवान्: संकल्पों से उत्पन्न; कामान्: कामनाओं को; त्यक्त्वा: त्यागकर; सर्वान्: सबको; अशेषतः: पूर्णतः; मनसा: मन के द्वारा; एव: ही; इन्द्रियग्रामम्: इन्द्रिय-समूह को; विनियम्य: अच्छी तरह नियंत्रित करके; समन्ततः: सब ओर से।
हिंदी अनुवाद
संकल्पों से उत्पन्न सब कामनाओं का पूर्णतः त्याग करके और सब ओर से इन्द्रिय-समूह को मन के द्वारा अच्छी तरह नियंत्रित करके।
English Translation
Completely renouncing all desires born of thoughts (saṅkalpa), and fully restraining the senses from all sides by the mind.
टीका / Commentary
योग के अभ्यास की तैयारी: सभी कामनाओं का त्याग और इन्द्रियों को मन द्वारा वश में करना।