ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 25

श्लोक २५ में धीरे-धीरे मन को आत्मा में स्थिर करने का उपदेश है।

संस्कृत श्लोक

शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ २५॥

śanaiḥ śanair uparamed buddhyā dhṛti-gṛhītayā | ātma-saṃsthaṃ manaḥ kṛtvā na kiñcid api cintayet ||25||

पदच्छेद / शब्दार्थ

शनैः शनैः: धीरे-धीरे; उपरमेत्: उपरत हो जाए; बुद्ध्या: बुद्धि द्वारा; धृतिगृहीतया: धैर्य से ग्रहण की हुई (युक्त); आत्मसंस्थम्: आत्मा में स्थित; मनः: मन को; कृत्वा: करके; न: नहीं; किञ्चित्: कुछ भी; अपि: भी; चिन्तयेत्: चिन्तन करे।

हिंदी अनुवाद

धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे उपरत हो जाए, मन को आत्मा में स्थिर करके किसी भी वस्तु का चिन्तन न करे।

English Translation

Gradually, step by step, one should become quiet, with the intellect firmly held by patience; having fixed the mind on the Self, one should think of nothing else.

टीका / Commentary

अभ्यास की विधि: धैर्यपूर्वक क्रमशः मन को आत्मा में स्थिर करते हुए, किसी अन्य विचार को न आने दें।