ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 26

श्लोक २६ में बताया गया है कि भटके हुए मन को बार-बार आत्मा में लगाना चाहिए।

संस्कृत श्लोक

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६॥

yato yato niścarati manaś cañcalam asthiram | tatastato niyamyaitad ātmany eva vaśaṃ nayet ||26||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यतः यतः: जहाँ-जहाँ; निश्चरति: चला जाता है; मनः: मन; चञ्चलम्: चंचल; अस्थिरम्: अस्थिर; ततः ततः: वहाँ-वहाँ से; नियम्य: नियंत्रित करके; एतत्: इसको; आत्मनि: आत्मा में; एव: ही; वशम्: वश में; नयेत्: ले जाए।

हिंदी अनुवाद

यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भी (विषयों में) चला जाए, वहाँ-वहाँ से उसे नियंत्रित करके आत्मा के ही वश में कर लेना चाहिए।

English Translation

From wherever the restless and unsteady mind wanders away, one should withdraw it and bring it back under the control of the Self alone.

टीका / Commentary

मन को बार-बार विषयों से हटाकर आत्मा में लगाना चाहिए। यही अभ्यास का सार है।