श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 39

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 36 मिनट का पठन 119 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन | न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् || ३९||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
यत्
जो
च
और
अपि
भी
सर्व-भूतानाम्
सब प्राणियों का
बीजम्
बीज
तत्
वह
अहम्
मैं
अर्जुन
हे अर्जुन
न
नहीं
तत्
वह
अस्ति
है
विना
बिना
यत्
जो
स्यात्
हो
मया
मुझसे
भूतम्
प्राणी
चर-अचरम्
चर और अचर।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे अर्जुन! और सब प्राणियों का जो बीज है, वह भी मैं हूँ। मुझसे रहित कोई भी चर या अचर प्राणी नहीं है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक परिचय एवं ब्रह्मांडीय महत्ता

सनातन हिंदू धर्म और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान सर्वोच्च है। महाभारत के भीषण युद्ध के आरंभ में कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए, वे केवल दो सेनाओं के बीच का संवाद नहीं हैं, अपितु वे समस्त मानव जाति के लिए भवसागर से पार उतरने का अचूक मार्गदर्शक नक्शा हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय, जिसे 'विभूतियोग' कहा जाता है, में भगवान श्रीकृष्ण अपनी अनंत ऐश्वर्ययुक्त विभूतियों का विस्तार से वर्णन कर रहे हैं। इस अध्याय के अंत की ओर आते-आते, भगवान अपने परम स्वरूप को अत्यंत सरल किंतु ब्रह्मांडीय सत्य के रूप में अर्जुन के समक्ष प्रकट करते हैं।

प्रस्तुत श्लोक "यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन | न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् || ३९||" गीता के दार्शनिक शिखर को छूता है। इस एक श्लोक में भगवान ने पूरे ब्रह्मांड की उत्पत्ति, स्थिति और लय के रहस्य को खोलकर रख दिया है। यहाँ श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि इस संपूर्ण चराचर जगत में ऐसा कुछ भी नहीं है, चाहे वह चेतन हो या जड़, जो बिना उनकी ऊर्जा या उनके अस्तित्व के क्षण भर भी टिक सके। वे समस्त चराचर जगत के मूल बीज हैं। बीज वह सूक्ष्मतम इकाई है जिसमें पूरा वृक्ष अपनी संपूर्ण विशालता और संभावनाओं के साथ छिपा रहता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को अद्वैत दर्शन का अहसास कराता है। जब एक भक्त इस सत्य को आत्मसात कर लेता है कि कण-कण में उसी एक परमेश्वर का वास है, तब उसके मन से ईर्ष्या, द्वेष, भय और मोह स्वतः समाप्त हो जाते हैं। Bhaktilok.in के इस विशेष आलेख में हम इसी दिव्य श्लोक के मर्म, इसके शब्दार्थ, पौराणिक संदर्भ और जीवन में इसके व्यावहारिक उपयोग का अत्यंत सूक्ष्म और प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि हर जिज्ञासु पाठक और भक्त इस ज्ञान अमृत से अपने जीवन को धन्य कर सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥ ३९॥


(śrīmadbhagavadgītā - adhyāya 10, śloka 39)

श्लोक गायन एवं पाठ की विधि:

  • पवित्रता: इस दिव्य श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करने के पश्चात शुद्ध वस्त्र धारण करके करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
  • स्थान: पूजा गृह में आसन पर बैठकर या भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह के समक्ष दीप प्रज्वलित कर इसका मानसिक या उच्च स्वर में पाठ करना चाहिए।
  • भावना: पाठ करते समय मन में यह पूर्ण निष्ठा होनी चाहिए कि भगवान ही इस संपूर्ण सृष्टि के रचयिता और पालक हैं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदान्त का गागर में सागर समान ज्ञान भरा हुआ है। नीचे दी गई सारणी में इसके पदों का शब्दार्थ और आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यत् + च + अपि और जो कुछ भी सृष्टि में जो भी वस्तुएं, परिस्थितियां या घटनाएं घटित होती हैं, उन सबका संदर्भ।
सर्वभूतानाम् सम्पूर्ण प्राणियों के चराचर जगत में उत्पन्न होने वाले जितने भी जीव, सूक्ष्म जीवाणु से लेकर महाब्रह्मा तक, सबका बोध।
बीजम् कारण, उत्पत्ति स्थान या बीज जैसे बीज के बिना वृक्ष असंभव है, वैसे ही परमेश्वर के बिना इस संसार की कोई कल्पना नहीं की जा सकती।
तत् + अहम् वह मैं ही हूँ भगवान श्रीकृष्ण सीधे तौर पर अपनी सर्वव्यापकता और मूल कारण होने की घोषणा कर रहे हैं।
अर्जुन हे अर्जुन! (संबोधन) भगवान अपने प्रिय सखा और शिष्य अर्जुन को संबोधित करते हुए यह परम गोपनीय ज्ञान दे रहे हैं।
न तत् अस्ति ऐसी कोई वस्तु नहीं है ब्रह्मांड में एक इंच भी ऐसा स्थान या पदार्थ नहीं है जो ईश्वर से रहित हो।
विना यत् स्यात् जो बिना (उसके) हो सके स्वतंत्र अस्तित्व का अभाव; हर वस्तु परतंत्र या आश्रित है उस एक परम सत्ता पर।
मया मुझसे (मेरे बिना नहीं) भगवान की शक्ति, योगमाया और परमात्मा सत्ता के बिना कोई कार्य संभव नहीं।
भूतम् प्राणी या उत्पन्न हुआ पदार्थ जीवित या मृत, प्रकट या अप्रकट सभी प्रकार के पदार्थ।
चरम् + अचरम् चल (गतिशील) और अचर (अचल/जड़) समस्त जगत — प्राणी, पक्षी, मनुष्य (चर) और पर्वत, नदियां, पृथ्वी, भवन (अचर)।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के ठीक पहले की है जब कौरवों और पांडવો की सेनाएं कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने-सामने थीं। कौरव पक्ष के दुर्योधन के अहंकार और अधर्म के विरुद्ध युद्ध करने से पूर्व, अर्जुन मानसिक रूप से विचलित हो जाते हैं। अपने सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं और मित्रों को सामने देखकर अर्जुन के हाथ से गाण्डीव धनुष छूटने लगता है और वे मोहग्रस्त होकर रथ के पिछले हिस्से में बैठ जाते हैं। तब जगतगुरु भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जीवन का परम और अकाट्य ज्ञान प्रदान करते हैं, जिसे हम श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में जानते हैं।

दसवें अध्याय में अर्जुन भगवान से उनकी विभूतियों (divine opulences) के बारे में पूछते हैं ताकि वे अपने चित्त को भगवान के विभिन्न रूपों में एकाग्र कर सकें। अर्जुन के इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण अपनी अनगिनत शक्तियों, रूपों और गुणों का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि वे देवताओं में इंद्र हैं, नक्षत्रों में चंद्रमा हैं, वेदों में सामवेद हैं और ऋषियों में मरीचि हैं। इस प्रकार अपनी अनगिनत विभूतियों को गिनाने के पश्चात, श्लोक 39 में भगवान एक अंतिम, व्यापक और सारगर्भित वक्तव्य देते हैं। वे कहते हैं कि इन तमाम विशिष्ट रूपों को अलग-अलग गिनने की आवश्यकता ही क्या है, मूल बात तो यह है कि इस संपूर्ण चराचर जगत का मूल बीज केवल और केवल 'मैं' ही हूँ।

वैदिक वेदान्त और उपनिषदों जैसे कि 'छांदोग्य उपनिषद' और 'श्वेतश्वेतार उपनिषद' में भी इसी प्रकार के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है जहाँ ब्रह्म को 'एकमेवाद्वितीयम्' (यानी एक ही और दूसरा कोई नहीं) और संपूर्ण जगत का कारण बताया गया है। व्यास जी द्वारा रचित महाभारत के इस अंश का उद्देश्य मनुष्य को उसकी लघुता का बोध कराते हुए उस विराट सत्ता के चरणों में समर्पित होने की प्रेरणा देना है। पुराणों और संतों की व्याख्याओं के अनुसार, इस कथा का मुख्य मर्म यही है कि जब तक मनुष्य अहंकार में जीता है कि "मैं करने वाला हूँ", तब तक वह दुखी रहता है; किंतु जब वह यह जान लेता है कि सब कुछ उस परमपिता परमात्मा का ही विस्तार है, तब उसका जीवन आनंदमय और भयमुक्त हो जाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

भगवान श्रीकृष्ण के इस महान विभूति श्लोक का नियमित स्मरण, पाठ और इसके अर्थ पर मनन करने से साधक को अनेकानेक मानसिक, आध्यात्मिक और कार्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

यह जानने के बाद कि सब कुछ भगवान की देखरेख और उनकी ही शक्ति से हो रहा है, व्यक्ति अनावश्यक चिंता और तनाव से मुक्त हो जाता है। मन में गहरी शांति और स्थिरता का अनुभव होता है।

2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

श्लोक के पवित्र संस्कृत वर्णों का उच्चारण शरीर और मन के चारों ओर एक उच्च कंपन वाली सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का निर्माण करता है, जिससे अवसाद दूर होता है।

3. कार्मिक शुद्धि (कर्मों का शोधन)

जब साधक हर जीव और वस्तु में ईश्वर के दर्शन करने लगता है, तो उसके द्वारा किसी भी प्राणी को आहत करने की संभावना समाप्त हो जाती है, जिससे उसके पिछले संचित कर्म शुद्ध होने लगते हैं।

4. अहंकार का शमन

"मैं सब कुछ करने वाला हूँ" इस मिथ्या अहंकार का नाश होता है। साधक में विनम्रता और समस्त प्राणियों के प्रति करुणा का भाव स्वतः ही जागृत होने लगता है।

5. दिव्य दृष्टि एवं समदर्शन

गीता के इस ज्ञान से साधक की दृष्टि बदल जाती है। वह राजा और रंक, पशु और मनुष्य, सभी में एक ही परमात्मा के दर्शन करने की क्षमता (समदर्शन) प्राप्त कर लेता है।

6. दैवीय कृपा की प्राप्ति

नियमित रूप से गीता के श्लोकों का पाठ करने वाले भक्त पर भगवान श्रीकृष्ण की अहेतुकी कृपा बनी रहती है, और उसे जीवन के संकटों से उबरने की आंतरिक शक्ति मिलती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रकाशित यह आलेख सनातन संस्कृति, वेद-पुराणों और विशेषकर श्रीमद्भगवद्गीता के पारंपरिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण) के गहन अध्ययन के पश्चात संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा उद्देश्य पाठकों को बिना किसी अतिशयोक्ति के, पूरी तरह से शुद्ध, तार्किक, शास्त्रीय और दार्शनिक रूप से प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराना है। इस लेख में प्रयुक्त संस्कृत श्लोक महर्षि वेद व्यास रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय (विभूतियोग) से साभार लिया गया है। यदि आप इस विषय पर या किसी अन्य श्लोक पर अधिक जानकारी चाहते हैं, तो हमारे पोर्टल पर अन्य लेखों का अवलोकन कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के दशवें अध्याय (विभूतियोग) का 39वां (39th) श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अनगिनत दिव्य विभूतियों का वर्णन किया है।

जिस प्रकार एक छोटे से बीज में पूरा विशाल वटवृक्ष छिपा रहता है और वह बीज ही उस वृक्ष की उत्पत्ति का मूल कारण होता है, ठीक उसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण इस संपूर्ण चराचर जगत (चर और अचर प्राणियों) के मूल कारण, उद्गम और आधार हैं। उनके बिना सृष्टि का एक कण भी अस्तित्व में नहीं रह सकता।

'चराचरम्' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है - 'चर' और 'अचर'। 'चर' का अर्थ है गतिशील या चलने-फिरने वाले प्राणी (जैसे मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट-पतंगे), और 'अचर' का अर्थ है अचल या जड़ वस्तुएं (जैसे पर्वत, नदियां, पृथ्वी, वृक्ष, मकान आदि)। इस प्रकार 'चराचर' का अर्थ संपूर्ण ब्रह्मांड या समस्त सृष्टि होता है।

इस श्लोक का नियमित पाठ करने से मन की व्याकुलता और चिंता समाप्त होती है, सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, और व्यक्ति के भीतर अहंकार की भावना कम होकर समस्त प्राणियों के प्रति प्रेम और समभाव (समदर्शन) उत्पन्न होता है।

हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक मानवता की साझी धरोहर है। इसे कोई भी व्यक्ति, किसी भी आयु या वर्ग का हो, पूरी श्रद्धा और स्पष्ट उच्चारण के साथ अपनी दैनिक पूजा, संध्या वंदन या गीता पाठ के दौरान सम्मिलित कर सकता है।

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सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं: "हे अर्जुन! और सब प्राणियों का जो बीज है, वह भी मैं हूँ। मुझसे रहित कोई भी चर या अचर प्राणी नहीं है।"

The Lord reveals His ontological primacy — He is the causal seed from which all existence springs. Everything, without exception, depends on Him for its being.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 39 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 39/42 93% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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