श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 38

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 38 मिनट का पठन 146 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् | मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् || ३८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
दण्ड
दण्ड
दमयताम्
दमन करने वालों में
अस्मि
हूँ
नीति
नीति
अस्मि
हूँ
जिगीषताम्
विजय की इच्छा वालों में
मौनम्
मौन
च
और
एव
ही
अस्मि
हूँ
गुह्यानाम्
रहस्यों में
ज्ञानम्
ज्ञान
ज्ञानवताम्
ज्ञानियों में
अहम्
मैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

दमन करने वालों में मैं दण्ड हूँ, विजय की इच्छा वालों में मैं नीति हूँ, रहस्यों में मैं मौन हूँ, और ज्ञानियों में मैं ज्ञान हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

मौनेन प्राप्यते राज्यं: श्रीमद्भागवतगीता के दशम अध्याय (विभूतियोग) का यह परम रहस्यमय श्लोक

सनातन संस्कृति, भारतीय आध्यात्मिकता और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भागवतगीता का स्थान सर्वोपरि है। महाभारत के युद्ध के मुहाने पर, कुरुक्षेत्र की पावन भूमि पर भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया यह दिव्य उपदेश संपूर्ण मानवता के लिए एक मार्गदर्शिका है। गीता के दशम अध्याय का नाम 'विभूतियोग' है। इस अध्याय में अर्जुन भगवान से उनकी शक्तियों, ऐश्वर्यों और विभूतियों के बारे में विस्तार से पूछते हैं, और जगत के पालनहार श्री कृष्ण अपनी अनंत और असीम विभूतियों का वर्णन करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि इस चराचर जगत में जो कुछ भी श्रेष्ठ, कांतिवान, तेजस्वी, बलवान या ज्ञानी है, वह सब उन्हीं के तेज का एक अंश मात्र है।

यह श्लोक—"दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् | मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् || ३८||"—मानव जीवन के चार अत्यंत महत्वपूर्ण आयामों को स्पर्श करता है: न्याय और अनुशासन (दण्ड), विजय प्राप्त करने की कूटनीति (नीति), आंतरिक साधना और गोपनियता (मौन), और जीवन की पराकाष्ठा यानी प्रज्ञा व ज्ञान (ज्ञान)। भगवान श्री कृष्ण यहाँ यह उद्घाटित करते हैं कि भौतिक संसार के बाह्य नियमन से लेकर आंतरिक चेतना की गहराइयों तक, हर जगह केवल उन्हीं का साम्राज्य है। दण्ड केवल भय का प्रतीक नहीं है, अपितु यह उस न्याय व्यवस्था का द्योतक है जो अराजकता को रोककर समाज में धर्म की स्थापना करती है। इसी प्रकार, विजय की आकांक्षा रखने वालों के लिए कूटनीति और नीतिपरायणता भगवान का ही स्वरूप है। जो रहस्य अकाट्य और गोपनीय हैं, उनमें मौन परम सत्य है, और बुद्धिजीवियों, ऋषियों तथा योगियों में जो परम ज्ञान है, वह स्वयं केशव ही हैं। इस प्रकार, यह श्लोक साधक को बाह्य विजय और आंतरिक शांति दोनों का अद्भुत संतुलन सिखाता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ॐ श्री परमात्मने नमः

अथ दशमोऽध्यायः — विभूतियोग

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।

मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥ ३८॥

गीता प्रेस गोरखपुर संस्करण के अनुसार श्लोक संख्या ३८, अध्याय १०

इस श्लोक का पठन और उच्चारण अत्यंत सावधानी के साथ करना चाहिए। वैदिक छंदों और संस्कृत व्याकरण के नियमों के अनुसार, इस श्लोक का पाठ करने से न केवल उच्चारण की शुद्धि होती है, बल्कि मन में एक विशेष प्रकार की एकाग्रता और ऊर्जा का संचार भी होता है। दैनिक संध्यावचन, गीता पाठ या भगवन्नाथ स्मरण के दौरान इस श्लोक का सस्वर पाठ साधक को मानसिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से सबल बनाता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदान्त का अगाध समुद्र समाहित है। आइए इसे तालिका के माध्यम से गहराई से समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
दण्डः (दण्डो) सजा, अनुशासन का प्रतीक, राजदण्ड अराजकता को नियंत्रित करने वाली और समाज में धर्म की रक्षा करने वाली न्याय प्रणाली भगवान की ही शक्ति है।
दमयताम् दमन करने वालों में, अनुशासन में लाने वालों में जो लोग अनियंत्रित प्रवृत्तियों या अपराधियों को वश में रखते हैं, उस नियंत्रण की शक्ति में भगवान उपस्थित हैं।
अस्मि हूँ भगवान स्वयं की उपस्थिति की घोषणा करते हैं कि ये समस्त शक्तियां अन्यत्र कहीं से नहीं, बल्कि मेरा ही प्रत्यक्ष स्वरूप हैं।
नीतिः (नीतिरस्मि) उचित आचरण, राज्यनीति, न्यायोचित कूटनीति विजय प्राप्त करने के लिए अपनाए जाने वाले धर्म सम्मत और न्यायपूर्ण उपाय भगवान का ही रूप हैं।
जिगीषताम् विजय की इच्छा रखने वालों में, विजेताओं में संसार में जो लोग धर्म की स्थापना के लिए विजय पाना चाहते हैं, उनकी सतनीति भगवान की प्रेरणा से ही चलती है।
मौनम् (मौनं) चुप रहना, वाक् संयम, आंतरिक शांति वाणी का संयम और भीतर का वह अवाक् ठहराव, जहाँ शब्दों की सीमा समाप्त होती है, सर्वोच्च रहस्य है।
च एव (चैवास्मि) और ही, निश्चित रूप से यह इस बात पर जोर देता है कि गोपनियता में मौन का स्थान सबसे विशिष्ट और सर्वोच्च है।
गुह्यानाम् (गुह्यानाम्) गोपनीय विषयों में, रहस्यों में जो बातें संसार की दृष्टि से छिपी हुई हैं या गूढ़ हैं, उनमें मौन सबसे बड़ा और पवित्र रहस्य है।
ज्ञानम् (ज्ञानं) परम विद्या, आत्मज्ञान, चेतना का विकास संसार और ब्रह्म का यथार्थ बोध कराने वाली बुद्धि और विद्या भगवान का जीवंत प्रकाश है।
ज्ञानवताम् अहम् (ज्ञानवतामहम्) ज्ञानवानों में—मैं (हूँ) समस्त विद्वानों, ऋषियों और ज्ञानियों के भीतर जो विवेकशील चेतना है, वह वस्तुतः वासुदेव कृष्ण ही हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भागवतगीता के दशम अध्याय की यह पृष्ठभूमि महाभारत के उस निर्णायक मोड़ से जुड़ी है जहाँ कौरवों और पांडवों की सेनाएं कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में आमने-सामने खड़ी थीं। अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने ही स्वजनों के विरुद्ध शस्त्र उठाने से इंकार कर देते हैं। तब उनके सारथी बने भगवान श्री कृष्ण उन्हें जीवन, कर्तव्य, कर्म और ब्रह्मांड के परम सत्य का बोध कराते हैं। अर्जुन के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि वे किस प्रकार अपने ध्यान में भगवान का स्मरण करें। वे पूछते हैं—"कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्। केषु केषु च भावेषु चिन्ज्योऽसि भगवन्मया॥" (हे योगेश्वर! मैं निरंतर आपका चिंतन कैसे करूँ और किन-किन भावों में आप मुझे स्मरणीय हैं?)

इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्री कृष्ण अपनी विभूतियों का अनंत विस्तार समझाते हैं। वे कहते हैं कि मेरी विभूतियों का कोई अंत नहीं है, क्योंकि मेरी व्यापकता संपूर्ण ब्रह्मांड में फैली हुई है। जब वे शासन और व्यवस्था की बात करते हैं, तो 'दण्ड' का उल्लेख करते हैं। प्राचीन काल में राजाओं के पास दंडशक्ति होती थी जिसका उपयोग वे प्रजा को धर्म के मार्ग पर चलाने के लिए करते थे। इसी प्रकार, 'नीति' राजनीतिज्ञों और राजाओं के लिए वह मार्गदर्शिका है जिसके बिना राज्य संचालन असंभव है। महाभारत काल में विदुर नीति, चाणक्य नीति (बाद के काल में), और श्री कृष्ण की अपनी कूटनीति इस बात की गवाही देती है कि धर्म की स्थापना के लिए नीति का कितना बड़ा महत्व है।

गुह्यानां मौनम्—अर्थात रहस्यों में मौन। भारतीय संस्कृति में मौन को केवल बातचीत बंद करना नहीं, बल्कि आंतरिक ऊर्जा का संचय (वाक् संयम और मनोसंयम) माना गया है। प्राचीन ऋषि-मुनि वनों में एकांत और मौन साधना के माध्यम से ही ब्रह्म का साक्षात्कार करते थे। मौन वह द्वार है जहाँ बाहरी कोलाहल शांत होता है और अंतरात्मा की सच्ची आवाज सुनाई देती है। इसी प्रकार, ज्ञानवानों में ज्ञान का होना—यह महर्षि व्यास, शुकदेव, नारद और सनत्कुमार जैसे महाज्ञानियों की उस परंपरा से जुड़ा है, जो भगवान की साक्षात कृपा का परिणाम है। इस प्रकार यह श्लोक हमें नीति, न्याय, संयम और ज्ञान के शिखर पुरुषों के माध्यम से सीधे परमपिता परमेश्वर से जोड़ता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भागवतगीता के इस दिव्य श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके मर्म को जीवन में उतारने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक, मानसिक और व्यावहारिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और एकाग्रता

श्लोक में 'मौनं चैवास्मि गुह्यानाम्' का पाठ करने से मन के भीतर चल रहे अंतर्द्वंद्व और अनावश्यक विचारों का कोलाहल शांत होता है, जिससे ध्यान (Meditation) में गहराई आती है।

2. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि

'नीतिरस्मि जिगीषताम्' के भाव को आत्मसात करने से जीवन और व्यवसाय के क्षेत्र में सही, न्यायोचित और दूरदर्शी निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता विकसित होती है।

3. कर्म और न्याय के प्रति निष्ठा

'दण्डो दमयतामस्मि' का स्मरण समाज और परिवार में अनुशासन, कर्तव्यपरायणता और न्याय के प्रति एक निष्पक्ष दृष्टिकोण पैदा करता है।

4. ज्ञान और बुद्धि का विस्तार

'ज्ञानं ज्ञानवतामहम्' के स्मरण से साधक की बुद्धि कुशाग्र होती है, विद्या के प्रति प्रेम बढ़ता है और अज्ञान का अंधकार धीरे-धीरे छंटने लगता है।

5. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का निर्माण

नियमित रूप से इस श्लोक का उच्चारण करने से शरीर के चारों ओर एक उच्च आध्यात्मिक ऊर्जा का आवरण (Positive Aura) बनता है जो नकारात्मक दृष्टियों से रक्षा करता है।

6. अहंकार का शमन और विनीत स्वभाव

यह बोध होने पर कि संसार का सारा ज्ञान और न्याय भगवान का ही स्वरूप है, व्यक्ति के भीतर से अहंकार समाप्त हो जाता है और वह विनम्र बन जाता है।

7. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

भगवान के इन रूपों का ध्यान करते हुए कर्म करने से पुराने नकारात्मक कर्मों के बंधन ढीले होते हैं और चित्त शुद्ध होने लगता है।

8. भगवद्कृपा और योगक्षेम की प्राप्ति

गीता के वचनों को अपने जीवन का आधार बनाने वाले भक्त पर भगवान श्री कृष्ण की विशेष कृपा बरसती है, जिससे जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस पावन मंच पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, पुराणों, उपनिषदों और श्रीमद्भागवतगीता के पारंपरिक टीकाग्रंथों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज, और स्वामी गीतानंद जी के भाष्यों) का गहन अध्ययन करके तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म के वास्तविक और शुद्ध दार्शनिक सत्यों को पहुँचाना है, ताकि आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच व्यक्ति अपने मूल आध्यात्मिक स्वरूप से जुड़ा रह सके। सभी श्लोक और उनके अर्थ गीता प्रेस, गोरखपुर के प्रमाणित ग्रंथों से उद्धृत किए गए हैं, जिससे इसकी विश्वसनीयता और प्रामाणिकता पूर्ण रूप से सुरक्षित रहती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

श्रीमद्भागवतगीता का दशम अध्याय 'विभूतियोग' के नाम से प्रसिद्ध है। इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के अनुरोध पर अपनी अनंत और असीम शक्तियों तथा विभूतियों का विस्तार से वर्णन किया है। यह अध्याय साधक को यह समझने में सहायता करता है कि इस संपूर्ण चराचर जगत में जो कुछ भी श्रेष्ठ, कांतिवान, न्यायप्रिय और ज्ञानी है, वह सब भगवान श्री कृष्ण का ही प्रत्यक्ष या परोक्ष स्वरूप है।

सनातन संस्कृति में 'दण्ड' का अर्थ केवल सजा देना नहीं है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था और अनुशासन का प्रतीक है। जिस प्रकार एक योग्य शासक दंड के माध्यम से समाज में अराजकता को रोकता है और धर्म की रक्षा करता है, उसी प्रकार यह न्याय शक्ति भगवान की ही व्यवस्था का एक अंग है। यह दण्ड दुर्भावनाओं को नियंत्रित कर सत्यों की स्थापना करता है।

मौन का अर्थ केवल शब्दों को रोकना नहीं है, बल्कि यह आंतरिक चेतना का वह स्तर है जहाँ सारे वैचारिक द्वंद्व शांत हो जाते हैं। संसार के जितने भी गहरे आध्यात्मिक रहस्य हैं, वे कोलाहल में नहीं बल्कि गहन मौन और ध्यान की अवस्था में ही अनुभव किए जाते हैं। इसलिए भगवान ने कहा है कि सभी रहस्यों में मौन परम श्रेष्ठ और उनका अपना रूप है।

इस श्लोक का दैनिक जीवन में यह उपयोग है कि यह हमें संकट के समय उचित नीति अपनाने, क्रोध या आवेश के क्षणों में मौन रहने, अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए न्यायप्रिय बनने तथा सतत ज्ञान अर्जन करने की प्रेरणा देता है। इसे जीवन में उतारने से व्यक्ति मानसिक रूप से संतुलित और सफल बनता है।

प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर शांत चित्त से आसन पर बैठकर श्रीमद्भागवतगीता के दशम अध्याय का या इस विशेष श्लोक का 11 या 21 बार सस्वर पाठ करना चाहिए। पाठ के पश्चात भगवान श्री कृष्ण का स्मरण कर उनके गुणों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेना चाहिए। इससे मानसिक शांति और आत्मिक बल की प्राप्ति होती है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं: "दमन करने वालों में मैं दण्ड हूँ, विजय की इच्छा वालों में मैं नीति हूँ, रहस्यों में मैं मौन हूँ, और ज्ञानियों में मैं ज्ञान हूँ।"

The Lord identifies with the principles behind various human endeavors — righteous authority, wise policy, profound silence, and pure knowledge.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 38 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 38/42 90% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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