पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
धोखा देने वालों में मैं जुआ हूँ, तेजस्वियों में मैं तेज हूँ, मैं विजय हूँ, मैं उद्योग हूँ, और सत्त्वगुण सम्पन्नों में मैं सत्त्व हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
Bhaktilok.in's Chief Devotional Scholar & Sanskrit Linguist Presentation
सनातन हिंदू धर्म और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण की वाणी और मोक्ष का मार्गदर्शक माना गया है। गीता के दसवें अध्याय, जिसे 'विभूतियोग' कहा जाता है, उसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी असीम और अनंत शक्तियों का परिचय देते हैं। इस अध्याय के श्लोक संख्या 36 (36th Verse) में भगवान ने ब्रह्मांड की विविध अभिव्यक्तियों का अत्यंत गहराई से वर्णन किया है। यह श्लोक इस बात का द्योतक है कि इस चराचर जगत में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, असाधारण है, उग्र है अथवा पावन है—वह सब मूलतः परमात्मा का ही एक अंश है।
सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अद्वैत वेदांत के उस परम सत्य को उजागर करता है जिसके अनुसार 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (यह संपूर्ण जगत ही ब्रह्म है)। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ केवल अच्छे और पवित्र गुणों के ही नहीं, बल्कि उन प्रवृत्तियों के भी स्रोत के रूप में स्वयं को स्वीकार करते हैं जिन्हें सामान्य मनुष्य नकारात्मक मान बैठता है। 'द्यूतं छलयतामस्मि' के माध्यम से वे यह स्पष्ट करते हैं कि छल-कपट और द्यूत (जुए) जैसी प्रवृत्तियों में जो सूक्ष्म जोखिम, अनिश्चितता और पराकाष्ठा की ऊर्जा कार्य करती है, वह भी उन्हीं की शक्ति का एक विकृत या विशिष्ट आयाम है। इसी प्रकार, तेजस्वियों का तेज, विजेताओं की विजय, दृढ़निश्चयी व्यक्तियों का संकल्प और सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव—सब कुछ भगवान की ही विभूति है।
इस लेख में हम इसी पावन श्लोक का व्याकरणिक, दार्शनिक, पौराणिक और व्यावहारिक विश्लेषण करेंगे। भक्ितलोक (Bhaktilok.in) के इस मंच पर हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदों, उपनिषदों और पुराणों के शाश्वत ज्ञान से जोड़ना है, ताकि वे अपने दैनिक जीवन में मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और कर्मयोग की सही समझ को आत्मसात कर सकें। आइए, इस दिव्य श्लोक के अंतरंग रहस्यों में प्रवेश करें और अपने अंतःकरण को भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप से जोड़ें।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
॥ श्रीमद्भगवद्गीता अथ दशमोध्यायः (विभूतियोगः) ॥
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् l
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥ ३६ ॥
श्लोक का सरल संस्कृत पाठ:
द्यूतम् छलयताम् अस्मि तेजः तेजस्विनाम् अहम् ।
जयः अस्मि व्यवसायः अस्मि सत्त्वम् सत्त्ववताम् अहम् ॥
पाठ विधि एवं नियम:
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
इस श्लोक में आए प्रत्येक शब्द का संस्कृत व्याकरण, लोक-व्यवहार और आध्यात्मिक दर्शन के दृष्टिकोण से अत्यंत गहरा अर्थ है। नीचे दी गई सारणी में इसका सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय 'विभूतियोग' की यह पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के ठीक पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में रची गई थी। अर्जुन कौरवों और पांडवों की विशाल सेनाओं के मध्य अपने प्रियजनों को देखकर किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। तब उनके सारथि बने भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जीवन, मरण, कर्म, और परम सत्य का उपदेश देते हैं। अर्जुन जब भगवान से यह पूछते हैं कि हे योगेश्वर! मैं आपको किन-किन रूपों में और कैसे-कैसे स्मरण करूँ? आपकी दिव्य विभूतियां क्या हैं? तब भगवान अपनी अनन्त शक्तियों का विस्तार से वर्णन करना शुरू करते हैं।
इस विशेष श्लोक (10.36) में भगवान श्रीकृष्ण का यह कथन कि 'द्यूतं छलयतामस्मि' (छल करने वालों में मैं द्यूत यानी जुआ हूँ) दार्शनिक हलचल पैदा कर सकता है। वेद व्यास रचित महाभारत में हम देखते हैं कि द्यूत क्रीड़ा (जुए का खेल) ही पांडवों के वनवास और अंततः महाभारत के विनाशकारी युद्ध का मुख्य कारण बनी थी। शकुनि द्वारा आयोजित वह कपटपूर्ण चौपड़ का खेल संपूर्ण हस्तिनापुर के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ था। ऐसे में भगवान का यह कहना कि 'जुए में मैं ही हूँ', यह सिखाता है कि इस ब्रह्मांड में कोई भी ऐसी वस्तु या घटना नहीं है जो परमात्मा की सत्ता से बाहर हो।
यहाँ भगवान यह समझाना चाहते हैं कि मनुष्य जिसे 'बुरा' या 'छल' कहता है, वह भी ब्रह्मांडीय व्यवस्था (Cosmic Order) का एक हिस्सा है, जहाँ अनिश्चितता और जोखिम का अत्यधिक प्रभाव होता है। जुआ अनिश्चितता और भाग्य का चरम खेल है, और जीवन स्वयं भी एक अनिश्चित खेल है। इसके विपरीत, 'तेज', 'जय', 'व्यवसाय' (संकल्प) और 'सत्त्व' सकारात्मक उत्कृष्टता के प्रतीक हैं। भगवान ने सकारात्मक और नकारात्मक—दोनों प्रकार की चरम शक्तियों को अपना ही स्वरूप बताकर यह सिद्ध किया है कि द्वैत से परे केवल एक ही परम शक्ति संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है।
महत्वपूर्ण पौराणिक संदर्भ
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)
विभूतियोग के इस विशिष्ट श्लोक का प्रतिदिन अध्ययन, मनन और जप करने से साधक को न केवल मानसिक शांति प्राप्त होती है, बल्कि उसके जीवन में एक सकारात्मक आध्यात्मिक क्रांति भी आती है। इसके प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:
1. मानसिक एकाग्रता एवं स्थिरता
श्लोक के नियमित जप से मन के भटकाव और चंचलता पर नियंत्रण होता है। अर्जुन की तरह साधक का चित्त भी स्थिर और एकाग्र होने लगता है।
2. सकारात्मक औरा (Aura) का निर्माण
'तेजस्तेजस्विनामहम्' के भाव को आत्मसात करने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में एक दिव्य तेज और आकर्षण उत्पन्न होता है, जो नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखता है।
3. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)
यह श्लोक समझने में मदद करता है कि सभी कर्मों का संचालक ईश्वर है। इससे अहंकार का नाश होता है और पापकर्मों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
4. दृढ़ संकल्प शक्ति (Willpower)
'व्यवसायोऽस्मि' पद के स्मरण मात्र से व्यक्ति के भीतर कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हार न मानने वाला अटूट संकल्प और उद्यमशीलता जागृत होती है।
5. भय एवं अनिश्चितता से मुक्ति
जीवन के जुए जैसी अनिश्चितताओं और जोखिमों से डरने के बजाय, साधक उन्हें ईश्वर की एक लीला मानकर धैर्य और साहस के साथ उनका सामना करना सीख जाता है।
6. सात्विक गुणों का विकास
'सत्त्वं सत्त्ववतामहम्' के प्रभाव से साधक के अंतःकरण में सात्विक वृत्तियों—जैसे करुणा, प्रेम, सत्यनिष्ठा और परोपकार—का स्वतः विस्तार होने लगता है।
7. विजय और सफलता की प्राप्ति
'जयोऽस्मि' का निरंतर स्मरण साधक के आत्मविश्वास को इस हद तक बढ़ा देता है कि वह जीवन के हर मोर्चे पर धर्म के साथ रहकर विजयश्री प्राप्त करता है।
8. दिव्य कृपा और आत्मसाक्षात्कार
समस्त चराचर जगत में भगवान के दर्शन करने की यह दृष्टि साधक को धीरे-धीरे अद्वैत बोध की ओर ले जाती है, जहाँ उसे हर जीव में परमात्मा दिखने लगते हैं।
9. मानसिक तनाव एवं चिंता का शमन
परिस्थितियों पर नियंत्रण खोने का भय समाप्त हो जाता है क्योंकि साधक यह जानता है कि खेल और खिलाड़ी दोनों ही वही परम शक्ति हैं।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस प्रतिष्ठित मंच पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, श्रीमद्भगवद्गीता के भाष्य (जैसे शंकराचार्य भाष्य, ज्ञानेश्वरी, और श्रीमद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद के दृष्टिकोण) तथा पारंपरिक वेदान्त परंपरा के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारे मुख्य देवotional scholar और संस्कृत भाषाविदों ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रत्येक श्लोक का अर्थ व्याकरण की दृष्टि से पूर्णतः सटीक हो और इसके दार्शनिक आयाम आधुनिक पाठकों के लिए सुगम एवं प्रासंगिक बनें।
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अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण कहते हैं: "धोखा देने वालों में मैं जुआ हूँ, तेजस्वियों में मैं तेज हूँ, मैं विजय हूँ, मैं उद्योग हूँ, और सत्त्वगुण सम्पन्नों में मैं सत्त्व हूँ।"
The Lord reveals that He is present in all aspects of existence — even in activities that involve risk and deception, He is the underlying principle. He is the essence of all positive qualities: splendor, victory, determination, and purity.