श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 36

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 44 मिनट का पठन 114 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् | जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् || ३६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
द्यूतम्
जुआ
छलयताम्
धोखा देने वालों में
अस्मि
हूँ
तेज
तेज
तेजस्विनाम्
तेजस्वियों में
अहम्
मैं
जय
विजय
अस्मि
हूँ
व्यवसाय
उद्योग
अस्मि
हूँ
सत्त्व
सत्त्वगुण
सत्त्ववताम्
सत्त्वगुण सम्पन्नों में
अहम्
मैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

धोखा देने वालों में मैं जुआ हूँ, तेजस्वियों में मैं तेज हूँ, मैं विजय हूँ, मैं उद्योग हूँ, और सत्त्वगुण सम्पन्नों में मैं सत्त्व हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

Bhaktilok.in's Chief Devotional Scholar & Sanskrit Linguist Presentation

सनातन हिंदू धर्म और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण की वाणी और मोक्ष का मार्गदर्शक माना गया है। गीता के दसवें अध्याय, जिसे 'विभूतियोग' कहा जाता है, उसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी असीम और अनंत शक्तियों का परिचय देते हैं। इस अध्याय के श्लोक संख्या 36 (36th Verse) में भगवान ने ब्रह्मांड की विविध अभिव्यक्तियों का अत्यंत गहराई से वर्णन किया है। यह श्लोक इस बात का द्योतक है कि इस चराचर जगत में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, असाधारण है, उग्र है अथवा पावन है—वह सब मूलतः परमात्मा का ही एक अंश है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अद्वैत वेदांत के उस परम सत्य को उजागर करता है जिसके अनुसार 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (यह संपूर्ण जगत ही ब्रह्म है)। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ केवल अच्छे और पवित्र गुणों के ही नहीं, बल्कि उन प्रवृत्तियों के भी स्रोत के रूप में स्वयं को स्वीकार करते हैं जिन्हें सामान्य मनुष्य नकारात्मक मान बैठता है। 'द्यूतं छलयतामस्मि' के माध्यम से वे यह स्पष्ट करते हैं कि छल-कपट और द्यूत (जुए) जैसी प्रवृत्तियों में जो सूक्ष्म जोखिम, अनिश्चितता और पराकाष्ठा की ऊर्जा कार्य करती है, वह भी उन्हीं की शक्ति का एक विकृत या विशिष्ट आयाम है। इसी प्रकार, तेजस्वियों का तेज, विजेताओं की विजय, दृढ़निश्चयी व्यक्तियों का संकल्प और सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव—सब कुछ भगवान की ही विभूति है।

इस लेख में हम इसी पावन श्लोक का व्याकरणिक, दार्शनिक, पौराणिक और व्यावहारिक विश्लेषण करेंगे। भक्ितलोक (Bhaktilok.in) के इस मंच पर हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदों, उपनिषदों और पुराणों के शाश्वत ज्ञान से जोड़ना है, ताकि वे अपने दैनिक जीवन में मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और कर्मयोग की सही समझ को आत्मसात कर सकें। आइए, इस दिव्य श्लोक के अंतरंग रहस्यों में प्रवेश करें और अपने अंतःकरण को भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप से जोड़ें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ श्रीमद्भगवद्गीता अथ दशमोध्यायः (विभूतियोगः) ॥

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् l
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥ ३६ ॥


श्लोक का सरल संस्कृत पाठ:

द्यूतम् छलयताम् अस्मि तेजः तेजस्विनाम् अहम् ।
जयः अस्मि व्यवसायः अस्मि सत्त्वम् सत्त्ववताम् अहम् ॥

पाठ विधि एवं नियम:

  • प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर पवित्र आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • भगवान श्रीकृष्ण के बालस्वरूप या गीता ग्रंथ का पूजन कर धूप-दीप प्रज्वलित करें।
  • इस श्लोक का न्यूनतम 108 बार (एक माला) जप करने से मानसिक एकाग्रता और सकारात्मक औरा का निर्माण होता है।
  • पाठ के अंत में भगवान को मिश्री या मक्खन का भोग लगाएं और समस्त संसार के कल्याण की प्रार्थना करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक में आए प्रत्येक शब्द का संस्कृत व्याकरण, लोक-व्यवहार और आध्यात्मिक दर्शन के दृष्टिकोण से अत्यंत गहरा अर्थ है। नीचे दी गई सारणी में इसका सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
द्यूतम् (Dyutam) जुए का खेल, द्यूतक्रीड़ा यह छल करने वालों में सबसे प्रबल जोखिम भरा कार्य है। भगवान यह दर्शाते हैं कि संसार के धोखे और जुए जैसी अनिश्चित प्रवृत्तियों में भी अंतिम नियंत्रण उन्हीं की शक्ति का है।
छलयताम् (Chalayatam) छल करने वाले, धोखेबाजों में जो लोग अपनी कुटिलता या चालाकी से दूसरों को भ्रमित करते हैं, उन छलिया मनुष्यों की बुद्धि और उनकी चालों के पीछे भी परमेश्वर की शक्ति ही कार्यशील है।
अस्मि (Asmi) हूँ उत्तम पुरुष एकवचन (अस् धातु)। यह भगवान की प्रत्यक्ष उपस्थिति की घोषणा है कि मैं ही वह परम सत्य हूँ जो इन रूपों में प्रकट होता हूँ।
तेजः (Tejah) तेज, प्रभाव, दीप्ति, ओज अग्नि, सूर्य और महापुरुषों के मुख मंडल पर जो अलौकिक कांति या चमक दिखाई देती है, वह सामान्य भौतिक ऊर्जा नहीं, अपितु भगवान का अपना तेज है।
तेजस्विनाम् (Tejasvinam) तेजस्वियों का, प्रभावशाली पुरुषों का जो लोग अपने ज्ञान, पराक्रम और चारित्रिक बल से समाज को प्रभावित करते हैं, उन सभी प्रभावशाली मनुष्यों में भगवान का ही अंश निवास करता है।
अहम् (Aham) मैं अहंकार का बोध नहीं, बल्कि शुद्ध 'अहम्ब्रह्मास्मि' (मैं ही ब्रह्म हूँ) के रूप में परमात्मा का संपूर्ण स्वतंत्र अस्तित्व और उसकी अहंता का परिचायक है।
जयः (Jayah) विजय, जीत युद्ध, वाद-विवाद, या जीवन के संघर्षों में जो सफलता या विजय प्राप्त होती है, उसका असली अधिष्ठाता और दाता भगवान स्वयं विजय रूप में उपस्थित रहते हैं।
व्यवसायः (Vyavasayah) दृढ़ निश्चय, उद्यम, संकल्प मनुष्य के भीतर जो अटूट संकल्प शक्ति होती है कि चाहे कितनी भी बाधाएं आएं, मैं अपने लक्ष्य को प्राप्त करके रहूँगा, वह परमात्मा का ही व्यवसाय रूप है।
सत्त्वम् (Sattvam) सत्त्व गुण, पवित्रता, अच्छाई प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से सर्वोच्च 'सत्त्व गुण'—जो शांति, ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक है—वह साक्षात् भगवान का स्वरूप है।
सत्त्ववताम् (Sattvavatam) सात्विक पुरुषों का, शूरवीर या बलवानों का जो मनुष्य सत्य, धर्म और पवित्रता के मार्ग पर अडिग रहते हैं, उन सत्त्ववान पुरुषों के भीतर भगवान अपनी संपूर्ण दिव्यता के साथ विराजमान रहते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय 'विभूतियोग' की यह पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के ठीक पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में रची गई थी। अर्जुन कौरवों और पांडवों की विशाल सेनाओं के मध्य अपने प्रियजनों को देखकर किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। तब उनके सारथि बने भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जीवन, मरण, कर्म, और परम सत्य का उपदेश देते हैं। अर्जुन जब भगवान से यह पूछते हैं कि हे योगेश्वर! मैं आपको किन-किन रूपों में और कैसे-कैसे स्मरण करूँ? आपकी दिव्य विभूतियां क्या हैं? तब भगवान अपनी अनन्त शक्तियों का विस्तार से वर्णन करना शुरू करते हैं।

इस विशेष श्लोक (10.36) में भगवान श्रीकृष्ण का यह कथन कि 'द्यूतं छलयतामस्मि' (छल करने वालों में मैं द्यूत यानी जुआ हूँ) दार्शनिक हलचल पैदा कर सकता है। वेद व्यास रचित महाभारत में हम देखते हैं कि द्यूत क्रीड़ा (जुए का खेल) ही पांडवों के वनवास और अंततः महाभारत के विनाशकारी युद्ध का मुख्य कारण बनी थी। शकुनि द्वारा आयोजित वह कपटपूर्ण चौपड़ का खेल संपूर्ण हस्तिनापुर के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ था। ऐसे में भगवान का यह कहना कि 'जुए में मैं ही हूँ', यह सिखाता है कि इस ब्रह्मांड में कोई भी ऐसी वस्तु या घटना नहीं है जो परमात्मा की सत्ता से बाहर हो।

यहाँ भगवान यह समझाना चाहते हैं कि मनुष्य जिसे 'बुरा' या 'छल' कहता है, वह भी ब्रह्मांडीय व्यवस्था (Cosmic Order) का एक हिस्सा है, जहाँ अनिश्चितता और जोखिम का अत्यधिक प्रभाव होता है। जुआ अनिश्चितता और भाग्य का चरम खेल है, और जीवन स्वयं भी एक अनिश्चित खेल है। इसके विपरीत, 'तेज', 'जय', 'व्यवसाय' (संकल्प) और 'सत्त्व' सकारात्मक उत्कृष्टता के प्रतीक हैं। भगवान ने सकारात्मक और नकारात्मक—दोनों प्रकार की चरम शक्तियों को अपना ही स्वरूप बताकर यह सिद्ध किया है कि द्वैत से परे केवल एक ही परम शक्ति संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है।

महत्वपूर्ण पौराणिक संदर्भ
  • ग्रन्थ: श्रीमद्भगवद्गीता (महाभारत के भीष्म पर्व का भाग)
  • वक्ता: भगवान श्रीकृष्ण (योगेश्वर)
  • श्रोता: अर्जुन (धनंजय)
  • अध्याय: दशम अध्याय - विभूतियोग
  • मुख्य संदेश: संपूर्ण जगत में अच्छाई और चरम ऊर्जा के रूप में भगवान का वास है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

विभूतियोग के इस विशिष्ट श्लोक का प्रतिदिन अध्ययन, मनन और जप करने से साधक को न केवल मानसिक शांति प्राप्त होती है, बल्कि उसके जीवन में एक सकारात्मक आध्यात्मिक क्रांति भी आती है। इसके प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक एकाग्रता एवं स्थिरता

श्लोक के नियमित जप से मन के भटकाव और चंचलता पर नियंत्रण होता है। अर्जुन की तरह साधक का चित्त भी स्थिर और एकाग्र होने लगता है।

2. सकारात्मक औरा (Aura) का निर्माण

'तेजस्तेजस्विनामहम्' के भाव को आत्मसात करने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में एक दिव्य तेज और आकर्षण उत्पन्न होता है, जो नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखता है।

3. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

यह श्लोक समझने में मदद करता है कि सभी कर्मों का संचालक ईश्वर है। इससे अहंकार का नाश होता है और पापकर्मों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

4. दृढ़ संकल्प शक्ति (Willpower)

'व्यवसायोऽस्मि' पद के स्मरण मात्र से व्यक्ति के भीतर कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हार न मानने वाला अटूट संकल्प और उद्यमशीलता जागृत होती है।

5. भय एवं अनिश्चितता से मुक्ति

जीवन के जुए जैसी अनिश्चितताओं और जोखिमों से डरने के बजाय, साधक उन्हें ईश्वर की एक लीला मानकर धैर्य और साहस के साथ उनका सामना करना सीख जाता है।

6. सात्विक गुणों का विकास

'सत्त्वं सत्त्ववतामहम्' के प्रभाव से साधक के अंतःकरण में सात्विक वृत्तियों—जैसे करुणा, प्रेम, सत्यनिष्ठा और परोपकार—का स्वतः विस्तार होने लगता है।

7. विजय और सफलता की प्राप्ति

'जयोऽस्मि' का निरंतर स्मरण साधक के आत्मविश्वास को इस हद तक बढ़ा देता है कि वह जीवन के हर मोर्चे पर धर्म के साथ रहकर विजयश्री प्राप्त करता है।

8. दिव्य कृपा और आत्मसाक्षात्कार

समस्त चराचर जगत में भगवान के दर्शन करने की यह दृष्टि साधक को धीरे-धीरे अद्वैत बोध की ओर ले जाती है, जहाँ उसे हर जीव में परमात्मा दिखने लगते हैं।

9. मानसिक तनाव एवं चिंता का शमन

परिस्थितियों पर नियंत्रण खोने का भय समाप्त हो जाता है क्योंकि साधक यह जानता है कि खेल और खिलाड़ी दोनों ही वही परम शक्ति हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस प्रतिष्ठित मंच पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, श्रीमद्भगवद्गीता के भाष्य (जैसे शंकराचार्य भाष्य, ज्ञानेश्वरी, और श्रीमद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद के दृष्टिकोण) तथा पारंपरिक वेदान्त परंपरा के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारे मुख्य देवotional scholar और संस्कृत भाषाविदों ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रत्येक श्लोक का अर्थ व्याकरण की दृष्टि से पूर्णतः सटीक हो और इसके दार्शनिक आयाम आधुनिक पाठकों के लिए सुगम एवं प्रासंगिक बनें।

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अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

भगवान श्रीकृष्ण यह समझाना चाहते हैं कि इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी घटित होता है—चाहे वह मानवीय दृष्टि से अच्छा हो या बुरा, छल हो या सत्य—वह सब उनकी ही ऊर्जा और सत्ता के अंतर्गत है। जुआ अनिश्चितता, जोखिम और भाग्य का चरम खेल है। भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि अस्तित्व की किसी भी चरम स्थिति में उनकी उपस्थिति अनिवार्य रूप से विद्यमान रहती है, जिसका अर्थ यह नहीं कि वे अनैतिकता को बढ़ावा दे रहे हैं, बल्कि यह कि पूरी सृष्टि उन्ही का विस्तार है।

संस्कृत में 'व्यवसाय' शब्द का अर्थ दृढ़ निश्चय, अटूट संकल्प और उद्यमशीलता (Determination) होता है। भगवान का यह कहना कि "मैं दृढ़निश्चय हूँ" इसका अर्थ है कि मनुष्य के भीतर जो लक्ष्य प्राप्ति की जिजीविषा और अटूट संकल्प शक्ति होती है, वह साक्षात् भगवान का ही बल है। इसे समझकर व्यक्ति अपने जीवन के किसी भी कठिन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रेरित हो सकता है।

इस श्लोक के नियमित जप और मनन से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है और व्यक्ति में सात्विक गुणों का विकास होता है। यह साधक को जीवन की अनिश्चितताओं से भयभीत हुए बिना साहस और सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ने की मानसिक शक्ति प्रदान करता है।

विभूतियोग का मुख्य उद्देश्य साधक के मन में यह भाव जगाना है कि वह अपने चारों ओर दिखने वाली हर श्रेष्ठ, सुंदर, शक्तिशाली और विशिष्ट वस्तु या व्यक्ति में परमात्मा के दर्शन करे। यह योग मनुष्य को संकीर्णता से ऊपर उठाकर सर्वव्यापक ईश्वर की चेतना से जोड़ता है।

हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के किसी भी श्लोक का पाठ कोई भी व्यक्ति कर सकता है। इसके लिए किसी प्रकार के जाति, लिंग या उम्र के बंधन नहीं हैं। बस आवश्यकता है तो श्रद्धा, पवित्रता और अर्थ को समझकर मनन करने की। प्रातः स्नान करके शांत चित्त से इसका पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं: "धोखा देने वालों में मैं जुआ हूँ, तेजस्वियों में मैं तेज हूँ, मैं विजय हूँ, मैं उद्योग हूँ, और सत्त्वगुण सम्पन्नों में मैं सत्त्व हूँ।"

The Lord reveals that He is present in all aspects of existence — even in activities that involve risk and deception, He is the underlying principle. He is the essence of all positive qualities: splendor, victory, determination, and purity.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 36 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 36/42 86% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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