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शुक्राना पौणाहारी दा लिरिक्स (Shukrana paunahari da Lyrics in Hindi) - Baba Balak Nath Bhajan

शुक्राना पौणाहारी दा भजन लिरिक्स पढ़ें। बाबा बालक नाथ जी का यह सुंदर भक्ति गीत अर्थ और संपूर्ण व्याख्या सहित | Bhaktilok पर उपलब्ध है।

"शुक्राना पौणाहारी दा" भजन सिद्ध बाबा बालक नाथ जी के प्रति पूर्ण समर्पण, कृतज्ञता और अनन्य भक्ति का एक अत्यंत मधुर और भावपूर्ण संकीर्तन है। बाबा बालक नाथ जी, जिन्हें श्रद्धालु प्यार से 'पौणाहारी' (केवल पवन का आहार करने वाले) भी कहते हैं, कलयुग के जाग्रत सिद्ध पुरुषों में से एक माने जाते हैं। इस भजन का मुख्य भाव 'शुक्राना' यानी ईश्वर और गुरु के प्रति धन्यवाद प्रकट करना है। जब एक साधक अपने जीवन में परमात्मा की असीम कृपा का अनुभव करता है, तो उसके हृदय से स्वतः ही कृतज्ञता के अश्रु और शब्द फूट पड़ते हैं। यह भजन उसी दिव्य अनुभूति का संगीतमय प्रकटीकरण है। इस भजन को गाने और सुनने से मन में शांति, विनम्रता और समर्पण का भाव जाग्रत होता है, जो साधक को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ शुक्राना पौणाहारी दा ॥

मुखड़ा:
शुक्राना पौणाहारी दा, शुक्राना पौणाहारी दा।
मैनूं चरणां दे नाल लाया, शुक्राना पौणाहारी दा॥
शुक्राना पौणाहारी दा, शुक्राना पौणाहारी दा।
मैनूं चरणां दे नाल लाया, शुक्राना पौणाहारी दा॥

अंतरा 1:
औगुण मेरे वेखे ना, मेरी झोली भर दित्ती।
मैं तां कक्खां वर्गी सी, मैनूं हीरा कर दित्ती।
मेरी डूबदी नैया नूं, बन्ने लाया पौणाहारी दा।
शुक्राना पौणाहारी दा, शुक्राना पौणाहारी दा...

अंतरा 2:
दर दर रुलदी फिरदी सी, कोई पुछदा बात नहीं।
तेरे बाझों बाबा जी, मेरी कोई औकात नहीं।
मैनूं फर्शों उठा के अर्श बिठाया, शुक्राना पौणाहारी दा।
शुक्राना पौणाहारी दा, शुक्राना पौणाहारी दा...

अंतरा 3:
शाहतलाईयां दे विच बाबा, तू तां धूणा लाया सी।
गरणा दे रुख थल्ले, तू तां गऊआं चराया सी।
रत्नो माई दा मान वधाया, शुक्राना पौणाहारी दा।
शुक्राना पौणाहारी दा, शुक्राना पौणाहारी दा...

अंतरा 4:
तेरी महिमा गा गा के, मेरा रोम रोम हरषावे।
भक्तों दा हर प्राणी, तेरे चरणां विच शीश झुकावे।
मैनूं अपनी दासी बनाया, शुक्राना पौणाहारी दा।
शुक्राना पौणाहारी दा, शुक्राना पौणाहारी दा...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस पावन भजन का केंद्रीय भाव 'कृतज्ञता' (Gratitude) है। सनातन धर्म में कृतज्ञता को सबसे बड़ा सद्गुण माना गया है। जब भक्त को यह आभास होता है कि उसकी अपनी कोई सामर्थ्य नहीं थी, फिर भी भगवान ने उसे अपनी शरण में ले लिया, तब उसके अंतर्मन से केवल 'शुक्राना' निकलता है।

भजन की शुरुआत में भक्त कहता है कि हे पौणाहारी बाबा! आपका कोटि-कोटि धन्यवाद है कि आपने मुझ जैसे साधारण और पापी जीव को अपने पावन चरणों से लगा लिया। संसार में जब कोई सहारा नहीं था, तब आपने अपनी शरण देकर मेरा जीवन धन्य कर दिया।

आगे भक्त अपनी दीनता स्वीकार करते हुए कहता है कि बाबा ने मेरे अवगुणों (पापों और कमियों) पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि अपनी असीम दयालुता से मेरी खाली झोली को खुशियों और भक्ति के रस से भर दिया। मैं तो सूखी घास के तिनके (कक्खां) के समान तुच्छ और मूल्यहीन था, लेकिन बाबा की कृपा दृष्टि ने मुझे अमूल्य हीरा बना दिया। जब मेरी जीवन रूपी नैया संसार के थपेड़ों से डूबने ही वाली थी, तब बाबा ने पतवार थामकर उसे सुरक्षित किनारे (बन्ने) लगा दिया।

यह भजन हमें सिखाता है कि जब हम अपने अहंकार को त्यागकर पूर्णतः भगवान के चरणों में समर्पित हो जाते हैं, तो वे हमारी रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक भक्त के हृदय की पुकार है जो बाबा के प्रति उसके अटूट विश्वास को दर्शाती है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन बाबा बालक नाथ जी के भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। इसके आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

  • शरणागति का भाव: यह भजन श्रीमद्भगवद्गीता के 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' के सिद्धांत को चरितार्थ करता है। भक्त अपने समस्त कर्मों और अस्तित्व को बाबा के चरणों में सौंप देता है।
  • अहंकार का विसर्जन: "मैं तां कक्खां वर्गी सी" (मैं तो तिनके के समान था) जैसी पंक्तियां भक्त के भीतर से 'मैं' यानी अहंकार को पूरी तरह समाप्त कर देती हैं।
  • कृतज्ञता की शक्ति: आधुनिक मनोविज्ञान भी मानता है कि कृतज्ञता का भाव मानसिक शांति और प्रसन्नता का सबसे बड़ा स्रोत है। यह भजन निरंतर धन्यवाद करने की प्रेरणा देता है।
  • ऐतिहासिक प्रसंगों का समावेश: भजन में बाबा बालक नाथ जी के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण स्थलों जैसे 'शाहतलाईयां' और 'रत्नो माई' का उल्लेख है, जो इसके ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व को बढ़ाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि ईश्वर की आराधना के लिए हर समय शुभ होता है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष परिस्थितियां और विधियां बताई गई हैं:

  • सर्वोत्तम समय: इस भजन का गायन सुबह की पूजा के समय या संध्या आरती के बाद करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। शांत वातावरण में इसका श्रवण मन को एकाग्र करता है।
  • विशेष अवसर: बाबा बालक नाथ जी के वार्षिक मेलों (जो चैत्र मास में हिमाचल प्रदेश के दियोटसिद्ध में आयोजित होते हैं), रविवार के व्रत, और विशेष चौकी या जागरण के समय इस भजन को सामूहिक रूप से गाया जाता है।
  • गायन की विधि: भजन को गाते समय मन में पूर्ण श्रद्धा और समर्पण होना चाहिए। यदि संभव हो तो बाबा की प्रतिमा के समक्ष धूप-दीप प्रज्वलित कर, हाथ जोड़कर या ताली बजाकर संकीर्तन करना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से बाबा बालक नाथ जी को समर्पित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बाबा बालक नाथ जी को भगवान शिव का अंशावतार माना जाता है। वे बाल योगी के रूप में पूजे जाते हैं और उन्होंने कलयुग में भक्तों के कल्याण के लिए अवतार लिया था।

बाबा बालक नाथ जी का संबंध नाथ संप्रदाय से भी है। वे गुरु गोरखनाथ के समकालीन और उनके परम शिष्यों में से एक माने जाते हैं। हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में उनकी अत्यधिक मान्यता है। उनका मुख्य सिद्धपीठ हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के 'दियोटसिद्ध' नामक गुफा में स्थित है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि पंजाब और हिमाचल प्रदेश की लोक-संस्कृति और भक्ति परंपरा से जुड़ी हुई है। बाबा बालक नाथ जी के भजनों में अक्सर पंजाबी और पहाड़ी मिश्रित भाषा का प्रयोग होता है, जो सुनने में अत्यंत कर्णप्रिय और हृदयस्पर्शी लगती है।

भजन में 'शाहतलाईयां' का उल्लेख है, यह वही पवित्र स्थान है जहां बाबा बालक नाथ जी ने रत्नो माई की गऊएं चराई थीं और उनके बारह वर्ष के छाछ और रोटी का हिसाब पल भर में कर दिया था। यह स्थान आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। इस पृष्ठभूमि को जानकर जब भक्त भजन गाता है, तो उसका जुड़ाव और भी गहरा हो जाता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और लोक-संवेदना से जुड़ी हुई पंजाबी-मिश्रित हिंदी है। इसकी काव्य शैली में निम्नलिखित विशेषताएं देखी जा सकती हैं:

  • रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग: भक्त ने स्वयं को 'कक्खां' (तिनका) और बाबा की कृपा को 'हीरा' कहा है, जो कि एक उत्कृष्ट रूपक है।
  • लयबद्धता और गेयता: भजन की लय इतनी सरल और सुरीली है कि कोई भी साधारण व्यक्ति इसे आसानी से गा सकता है। इसके अंतरे और मुखड़े का संयोजन बहुत ही संतुलित है।
  • भाव-प्रधानता: इसमें कठिन दार्शनिक शब्दों के स्थान पर सीधे हृदय को छूने वाले सरल शब्दों का प्रयोग किया गया है, जैसे "फर्शों उठा के अर्श बिठाया"।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल एक स्तुति नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन जीने के कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:

जीवन सीख (Life Lesson) भजन की पंक्ति से संबंध व्यावहारिक जीवन में महत्व
विनम्रता (Humility) "मैं तां कक्खां वर्गी सी..." अपने ज्ञान या धन पर कभी अहंकार न करें, सदैव जमीन से जुड़े रहें।
कृतज्ञता (Gratitude) "शुक्राना पौणाहारी दा..." जीवन में जो कुछ भी मिला है, उसके लिए भगवान और समाज का धन्यवाद करें।
सहानुभूति और करुणा "औगुण मेरे वेखे ना..." दूसरों की गलतियों को माफ करना सीखें और उनके अवगुणों के बजाय गुणों को देखें।
अटूट विश्वास (Faith) "मेरी डूबदी नैया नूं..." कठिन परिस्थितियों में भी विचलित न हों, ईश्वर पर भरोसा रखें।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
शुक्राना धन्यवाद / आभार (Gratitude) ईश्वर की कृपा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना।
पौणाहारी पवन का आहार करने वाले बाबा बालक नाथ जी का एक नाम, जो उनकी उच्च योग साधना को दर्शाता है।
कक्खां वर्गी तिनके के समान तुच्छ साधक की अपनी लघुता और निरहंकारिता का प्रतीक।
बन्ने लाया किनारे लगाया संसार रूपी भवसागर से पार उतारना।
अर्श आसमान / उच्च स्थान आध्यात्मिक उन्नति और सम्मान की पराकाष्ठा।
शाहतलाईयां एक पवित्र स्थान वह स्थान जहां बाबा बालक नाथ जी ने तपस्या की और गऊएं चराई थीं।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

1. "शुक्राना पौणाहारी दा, शुक्राना पौणाहारी दा। मैनूं चरणां दे नाल लाया..."
हे बाबा! आपका बारंबार धन्यवाद है। मुझ जैसे तुच्छ जीव को आपने अपने पावन चरणों में स्थान दिया, इसके लिए मैं सदैव आपका ऋणी रहूंगा।

2. "औगुण मेरे वेखे ना, मेरी झोली भर दित्ती। मैं तां कक्खां वर्गी सी, मैनूं हीरा कर दित्ती..."
यदि आप मेरे पापों और गलतियों का हिसाब करते, तो मुझे कभी आपकी शरण न मिलती। लेकिन आपने मेरी कमियों को अनदेखा कर मेरी झोली खुशियों से भर दी। मैं तो धूल के समान था, आपने मुझे हीरा बना दिया।

3. "दर दर रुलदी फिरदी सी, कोई पुछदा बात नहीं। तेरे बाझों बाबा जी, मेरी कोई औकात नहीं..."
इस मतलबी संसार में जब मैं दर-दर भटक रहा था, तब किसी ने मेरा साथ नहीं दिया। हे बाबा! आपके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। आपने मुझे फर्श से उठाकर अर्श पर बिठा दिया है।

4. "शाहतलाईयां दे विच बाबा, तू तां धूणा लाया सी। गरणा दे रुख थल्ले, तू तां गऊआं चराया सी..."
भक्त बाबा के बाल-लीला रूप का स्मरण करते हुए कहता है कि आपने शाहतलाईयां में धूणी रमाई और गरणा के वृक्ष के नीचे बैठकर रत्नो माई की गऊएं चराईं। आपने अपनी लीलाओं से भक्तों का उद्धार किया।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

बाबा बालक नाथ जी की पूजा के समय इस भजन के साथ निम्नलिखित सिद्ध मंत्रों का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है:

॥ ॐ सिद्धाय नमः ॥

॥ ॐ नमो भगवते महायोगीन्द्राय बालकनाथाय नमः ॥

यह मंत्र साधक के जीवन से सभी प्रकार के कष्टों, बाधाओं और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करता है और बाबा की असीम कृपा प्रदान करता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण जानकारी
भजन का नाम शुक्राना पौणाहारी दा (Shukrana Paunahari Da)
आराध्य देव बाबा बालक नाथ जी (पौणाहारी)
मुख्य भाव कृतज्ञता, समर्पण, भक्ति (Gratitude & Surrender)
भाषा पंजाबी-मिश्रित हिंदी (Punjabi-Hindi)
प्रसिद्ध स्थल दियोटसिद्ध, शाहतलाईयां (हिमाचल प्रदेश)
उपयुक्त अवसर रविवार पूजा, बाबा की चौकी, चैत्र मेला, दैनिक प्रार्थना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

'पौणाहारी' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है - 'पौण' (पवन/हवा) और 'आहारी' (भोजन करने वाला)। बाबा बालक नाथ जी ने अपनी कठिन तपस्या के दौरान केवल हवा का सेवन करके जीवन व्यतीत किया था, इसलिए उन्हें 'पौणाहारी' कहा जाता है।

इस भजन के नियमित गायन और श्रवण से मन में विनम्रता आती है, अहंकार का नाश होता है और साधक को मानसिक शांति मिलती है। यह भजन बाबा बालक नाथ जी के प्रति हमारी श्रद्धा को और मजबूत करता है।

बाबा बालक नाथ जी का मुख्य सिद्धपीठ और पवित्र गुफा हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के 'दियोटसिद्ध' नामक स्थान पर स्थित है। यहाँ प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

शाहतलाईयां वह ऐतिहासिक स्थान है जहाँ बाबा बालक नाथ जी ने रत्नो माई की गऊएं चराई थीं और अपनी दिव्य लीलाएं दिखाई थीं। यह स्थान दियोटसिद्ध के पास ही स्थित है और अत्यंत पवित्र माना जाता है।

हाँ, इस भजन को पुरुष और महिलाएँ दोनों ही अत्यंत श्रद्धा के साथ गा सकते हैं। बाबा बालक नाथ जी के प्रति भक्ति में लिंग का कोई भेद नहीं है।

सप्ताह का रविवार का दिन बाबा बालक नाथ जी की पूजा, व्रत और भजन-कीर्तन के लिए विशेष रूप से समर्पित और अत्यंत शुभ माना जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "शुक्राना पौणाहारी दा लिरिक्स" के माध्यम से बाबा बालक नाथ जी के प्रति अनन्य भक्ति और कृतज्ञता के भाव को रेखांकित करता है। इस भजन के प्रत्येक शब्द की व्याख्या सनातन धर्म के शरणागति और निष्काम भक्ति के सिद्धांतों के अनुरूप की गई है। यह सामग्री पूरी तरह से शोध पर आधारित और संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जो पाठकों को प्रामाणिक और उच्च गुणवत्ता वाली आध्यात्मिक जानकारी प्रदान करती है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता - शरणागति योग प्रसंग
  • नाथ संप्रदाय का इतिहास और बाबा बालक नाथ चरित्र
  • हिमाचल प्रदेश के सिद्धपीठ दियोटसिद्ध की स्थानीय लोक-कथाएं और परंपराएं

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

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