मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन
शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें
🙏 मरते समय मुख से हरि-नाम निकले – सत्संग भजन
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।
(Marte Samay Mukh Se Hari Naam Nikle – Satsang Bhajan)
📝 भजन विवरण
📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)
मरते समय मुख से हरि-नाम निकले,
तो समझो कि भव से तरण मिल गया है।
अजामिल से पापी को अंतिम समय में,
प्रभु के चरण में शरण मिल गया है॥
संगों की संगत कुसंगत मिटाए,
प्रभु से मिलन का मार्ग दिखाए।
जिसने किया साधु-संतों की संगत,
सुन्दर उसे आचरण मिल गया है॥
मरते समय मुख से हरि-नाम निकले,
तो समझो कि भव से तरण मिल गया है॥
घड़ी मौत की उसके सर पे जब आई,
तो बेटे “नारायण” की थी रट लगाई।
नारायण ने समझा हमें है बुलाता,
नरक से उसे उद्धरण मिल गया है॥
अजामिल से पापी को अंतिम समय में,
प्रभु के चरण में शरण मिल गया है॥
प्रभु की कृपा जो भी पाता नहीं है,
अंतिम समय नाम आता नहीं है।
स्वासों में निसिदिन जो भी जपेगा,
जीवन का उसको मर्म मिल गया है॥
मरते समय मुख से हरि-नाम निकले,
तो समझो कि भव से तरण मिल गया है॥
🎵 रचनाकार : लोक परम्परा / सत्संग भजन
🙏 भजन का अर्थ और संदेश
यह अत्यंत प्रभावशाली सत्संग भजन अजामिल के प्रसंग पर आधारित है, जो बताता है कि अंतिम समय में हरि-नाम जपने से मुक्ति मिल जाती है। “मरते समय मुख से हरि-नाम निकले, तो समझो कि भव से तरण मिल गया है” – यदि मृत्यु के समय मुँह से हरि-नाम निकल जाए, तो समझ लो कि जन्म-मरण के सागर (भव) से पार उतरने (तरण) का साधन मिल गया।
“अजामिल से पापी को अंतिम समय में, प्रभु के चरण में शरण मिल गया है” – पुराणों के अनुसार अजामिल ने अपने पुत्र “नारायण” को पुकारा था, और भगवान ने उसे मोक्ष दे दिया। यह बताता है कि अंतिम समय में भी सच्चे मन से नाम जपने पर प्रभु की शरण मिलती है।
पहले अंतरे में – संतों की संगति (सत्संग) कुसंगति को मिटाती है और प्रभु से मिलन का मार्ग दिखाती है। जिसने साधु-संतों की संगत की, उसे सुंदर आचरण मिल गया।
दूसरे अंतरे में – अजामिल के प्रसंग का सीधा उल्लेख। मृत्यु की घड़ी आने पर उसने अपने बेटे “नारायण” को पुकारा, और भगवान नारायण ने समझा कि वह हमें बुला रहा है – इस प्रकार उसे नरक से उद्धार मिल गया।
तीसरे अंतरे में – जो प्रभु की कृपा नहीं पाता, उसके अंतिम समय में नाम नहीं आता। इसलिए हर सांस में, नित्य-प्रति (निसिदिन) नाम जपना चाहिए – तभी जीवन का मर्म (सार) मिलता है।
यह भजन सिखाता है कि कभी भी, यहाँ तक कि मृत्यु के अंतिम क्षणों में भी, हरि-नाम जपने से मुक्ति मिल सकती है। लेकिन सच्ची भक्ति तो जीवनभर नाम जपने में ही है।
🔍 भजन का विशेष महत्त्व
अजामिल प्रसंग: यह भागवत पुराण का प्रसिद्ध प्रसंग है जिसमें एक ब्राह्मण अजामिल ने पापों में जीवन बिताया, लेकिन अंतिम समय में अपने पुत्र नारायण का नाम लेते हुए मरे, और भगवान के दूतों ने उसे मोक्ष दिलाया।
“तरण” का अर्थ: तरण का अर्थ है पार करना, उद्धार। भवसागर (जन्म-मरण के समुद्र) से पार होना ही मोक्ष है।
सत्संग की महिमा: “संगों की संगत कुसंगत मिटाए” – सत्संग (अच्छी संगति) बुरी संगति को मिटा देती है और प्रभु-प्राप्ति का मार्ग दिखाती है।
💖 हरि-नाम की महिमा
🎯 संदेश
चाहे जीवन भर पाप ही क्यों न किए हों, यदि अंतिम समय में सच्चे मन से हरि-नाम निकल जाए, तो भगवान अपने भक्त का उद्धार करते हैं। इसलिए कभी निराश न हों – हरि-नाम जपते रहो।
✨ आस्था का प्रतीक
यह भजन हर भक्त को यह विश्वास दिलाता है कि भगवान का नाम सबसे बड़ा सहारा है। अजामिल जैसे पापी का भी उद्धार हुआ – तो हम क्यों न करें?
🙏 ॐ नमो नारायणाय ।। हरि-नाम की जय ।। अजामिल उद्धार प्रसंग ।।
🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ
यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "मरते समय मुख से हरि-नाम निकले (सत्संग भजन) लिरिक्स | Marte Samay Mukh Se Hari Naam Nikle Satsang Bhajan Lyrics" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।
भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।
🔍 विशेष महत्त्व और लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।
🕒 साधना एवं गायन विधि
भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।
भजनों को गाने की सही विधि क्या है?
भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।
क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?
हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।
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