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पता नहीं किस रूप में आकर नारायण मिल जाएगा (भजन) लिरिक्स | Pata Nahi Kis Roop Mein Aakar Narayan Mil Jayega Bhajan Lyrics

349 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Chandan Sah
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मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

🙏 पता नहीं किस रूप में आकर, नारायण मिल जाएगा

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

(Pata Nahi Kis Roop Mein Aakar Narayan Mil Jayega) – भजन

🌸 प्रेम प्रभु का बरस रहा है – कण-कण में हरि, क्षण-क्षण में हरि

📝 भजन विवरण

🏷️ श्रेणी: भजन / प्रार्थना / नारायण भक्ति
🎶 भाव: विश्वास, समर्पण, कर्म सिद्धांत, आस्था
📍 विशेषता: ईश्वर के अज्ञात रूपों में मिलने का अद्भुत भाव, प्रेम और करुणा का संदेश
📀 प्रचलन: सभी भक्तों में अत्यंत प्रिय, ध्यान एवं प्रार्थना के लिए उपयुक्त

📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)

प्रेम प्रभु का बरस रहा है,
पीले अमृत प्यासे,
सातों तीरथ तेरे अंदर,
बाहर किसे तलाशे ...
कण-कण में हरि,
क्षण-क्षण में हरि,
मुस्कानों में, असुअन में हरि,
मन की आँखें तूने खोली,
तो ही दर्शन पाएगा...
पता नहीं किस रूप में आकर,
नारायण मिल जाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर,
नारायण मिल जाएगा...

॥ अंतरा १ – नियति और कर्म का सिद्धांत ॥

नियति भेद नहीं करती,
जो लेती है वो देती है,
जो बोएगा वो काटेगा,
ये जग कर्मों की खेती है।
यदि कर्म तेरे पावन हैं,
सभी डूबेगी नहीं तेरी नाव कभी,
तेरी बाँह पकड़ने को,
वो भेष बदल के आएगा...
पता नहीं किस रूप में आकर,
नारायण मिल जाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर,
नारायण मिल जाएगा

॥ अंतरा २ – नेकी, फूल, दीप, साथी का भाव ॥

नेकी व्यर्थ नहीं जाती,
हरि लेखा-जोखा रखते हैं,
औरों को फूल दिए जिसने,
उसके भी हाथ महकते हैं।
कोई दीप मिले तो बाती बन,
तू भी तो किसी का साथी बन,
मन को मानसरोवर कर ले,
तो ही मोती पाएगा...
पता नहीं किस रूप में आकर,
नारायण मिल जाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर,
नारायण मिल जाएगा...

॥ अंतरा ३ – श्रद्धा की परीक्षा, माली का विश्वास ॥

कान लगा के बातें सुन ले,
सूखे हुए दरख़्तों की,
लेता है भगवान परीक्षा,
सबसे प्यारे भक्तों की।
एक प्रश्न है गहरा,
जिसकी हरि को थाह लगानी है,
तेरी श्रद्धा सोना है या,
बस सोने का पानी है...
जो फूल धरे हर डाली पर,
विश्वास तो रख उस माली पर,
तेरे भाग में पत्थर है तो,
पत्थर भी खिल जाएगा...
पता नहीं किस रूप में आकर,
नारायण मिल जाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर,
नारायण मिल जाएगा...

✍️ रचनाकार :- लोक परम्परा / अज्ञात

🙏 भजन का अर्थ और संदेश

यह अत्यंत सारगर्भित भजन नारायण (ईश्वर) के अप्रत्याशित रूपों में मिलने की बात करता है। “पता नहीं किस रूप में आकर, नारायण मिल जाएगा” – भक्त कहता है कि हम नहीं जानते कि भगवान किस रूप में हमसे मिलने आएंगे। वे किसी गरीब, किसी दुखी, किसी मित्र या किसी अजनबी के रूप में आ सकते हैं।

“प्रेम प्रभु का बरस रहा है, पीले अमृत प्यासे” – ईश्वर का प्रेम अमृत की तरह बरस रहा है। सातों तीर्थ हमारे अंदर ही हैं, बाहर किसे ढूंढें? कण-कण में हरि, क्षण-क्षण में हरि – हर जगह, हर पल वे विद्यमान हैं। मन की आँखें खोलने पर ही दर्शन मिलते हैं।

दूसरे अंतरे में कर्म का सिद्धांत – नियति भेदभाव नहीं करती, जो बोएगा वही काटेगा। यदि कर्म पवन हैं तो नाव नहीं डूबेगी, और प्रभु स्वयं भेष बदलकर बाँह पकड़ने आएंगे।

तीसरे अंतरे में – नेकी व्यर्थ नहीं जाती, हरि हर कर्म का लेखा रखते हैं। दूसरों को फूल देने वाले के हाथ महकते हैं। दीप मिले तो बाती बनो, किसी के साथी बनो। मन को मानसरोवर (पवित्र सरोवर) बना लो तो मोती पाओगे।

चौथे अंतरे में – सूखे पेड़ों की बात सुनो, भगवान अपने प्यारे भक्तों की परीक्षा लेते हैं। सवाल है – तुम्हारी श्रद्धा सच्चा सोना है या केवल सोने का पानी? यदि तुम विश्वास रखते हो तो पत्थर भी खिल जाएगा।

यह भजन सिखाता है कि ईश्वर हर कण में है, हर क्षण में है, और वह किसी भी रूप में हमसे मिलने आ सकता है। हमें बस विश्वास, सच्ची श्रद्धा और अच्छे कर्मों की आवश्यकता है।

🔍 भजन का विशेष महत्त्व

कण-कण में हरि, क्षण-क्षण में हरि: यह पंक्ति अद्वैत वेदांत के सिद्धांत को सहज भाषा में प्रस्तुत करती है – ईश्वर सर्वव्यापी है, हर जगह और हर पल विद्यमान है।

कर्म सिद्धांत: “जो बोएगा वो काटेगा, ये जग कर्मों की खेती है” – यह गीता के कर्म सिद्धांत की सरल व्याख्या है।

श्रद्धा की परीक्षा: “तेरी श्रद्धा सोना है या बस सोने का पानी है” – यह हमारी आस्था की गहराई को परखने वाला प्रश्न है।

💖 आस्था और समर्पण का संगम

🎯 संदेश

नारायण किसी भी रूप में आ सकते हैं – किसी जरूरतमंद, किसी मित्र, किसी अजनबी या किसी संकट के रूप में। हमें हर रूप में उनका स्वागत करने के लिए तैयार रहना चाहिए। सच्ची श्रद्धा और अच्छे कर्म ही हमें उनसे मिलवा सकते हैं।

✨ आस्था का प्रतीक

यह भजन हर उस भक्त के लिए प्रेरणा है जो ईश्वर को एक निश्चित रूप में ढूंढ रहा है। यह बताता है कि ईश्वर हर रूप में है, और सच्ची भक्ति से वह किसी भी रूप में प्रकट हो सकता है।

🙏 ॐ नमो नारायणाय ।। पता नहीं किस रूप में आकर, नारायण मिल जाएगा ।।

॥ इति नारायण भजनम् ॥
॥ कण-कण में हरि, क्षण-क्षण में हरि – मन की आँखें खोलो तो ही दर्शन पाओगे ॥

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "पता नहीं किस रूप में आकर नारायण मिल जाएगा (भजन) लिरिक्स | Pata Nahi Kis Roop Mein Aakar Narayan Mil Jayega Bhajan Lyrics" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।

भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।

भजनों को गाने की सही विधि क्या है?

भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।

क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 02 Sep 2026

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