Punjabi Devi Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

फूट गईल ललकी किरिनिया (Phut Gail Lalki Kiriniya Maai) - Priti Lata Devigeet Bhakti Song Mata Bhajan

प्रीति लता द्वारा गाए गए भक्तिपूर्ण देवी गीत 'फूट गईल ललकी किरिनिया' के बोल और उसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ जानें। मां दुर्गा की भक्ति में डूबें।

भोजपुरी लोक संस्कृति और सनातन भक्ति परंपरा में देवी गीतों का एक अत्यंत विशिष्ट और पावन स्थान है। सुप्रसिद्ध गायिका प्रीति लता द्वारा गाया गया भक्तिमय देवी गीत "फूट गईल ललकी किरिनिया" (Phut Gail Lalki Kiriniya Maai) आदिशक्ति मां दुर्गा के जागृत स्वरूप और भोर (प्रातःकाल) की अलौकिक बेला का अत्यंत मनोहारी वर्णन करता है। यह गीत न केवल कानों को प्रिय लगता है, बल्कि साधक के हृदय में मां भगवती के प्रति अगाध श्रद्धा, समर्पण और वात्सल्य भाव का संचार करता है। जब सूर्य की पहली लाल किरणें धरती पर बिखरती हैं, तो पूरा चराचर जगत मां की वंदना में लीन हो जाता है। इस लेख में हम इस पावन देवी गीत के बोल, उसका गहरा आध्यात्मिक भावार्थ, सांस्कृतिक महत्व और इससे मिलने वाले जीवन संदेशों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

मुखड़ा:

फूट गईल ललकी किरिनिया माई हो, भोर भइल ना।
जागा जागा मोरी मैया, भोर भइल ना॥
फूट गईल ललकी किरिनिया माई हो, भोर भइल ना।
जागा जागा मोरी मैया, भोर भइल ना॥

अंतरा १:

पूरब से उगले सुरुज देव, लाल भइल असमनवा।
चिड़िया चहके डाली-डाली, गूंजे मंगलगानवा।
हाथ जोड़ ठाढ़ बाड़े सेवकवा, भोर भइल ना।
जागा जागा मोरी मैया, भोर भइल ना॥

अंतरा २:

गंगा जी से जलवा ले आईल, कइली कलश के तैयारी।
धूप-दीप और नैवेद्य सजल बा, ठाढ़ बाड़े नर- नारी।
चरणन में तोहरे शीश झुकावे, भोर भइल ना।
जागा जागा मोरी मैया, भोर भइल ना॥

अंतरा ३:

लाल चुनरिया चम-चम चमके, सोहे कंगन हाथन में।
महिमा तोहरी अपरम्पार बा, गूंजे सब देहातन में।
प्रीति लता तोहार महिमा गावे, भोर भइल ना।
जागा जागा मोरी मैया, भोर भइल ना॥

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह देवी गीत भोजपुरी लोक संवेदना और अध्यात्म का एक अद्भुत संगम है। इसके प्रत्येक अंतरे में प्रकृति के सौंदर्य और भक्त की व्याकुलता का सुंदर चित्रण किया गया है:

भोर की बेला और मां का जागरण (मुखड़ा)

गीत की शुरुआत भोर की लालिमा के साथ होती है। भक्त कहता है कि हे माता! पूर्व दिशा में सूर्य की लाल किरणें फूट पड़ी हैं, अर्थात सुबह हो चुकी है। अब आप अपनी निद्रा का त्याग कर जाग जाइए और अपने भक्तों को दर्शन दीजिए। यहाँ "ललकी किरिनिया" केवल सूर्य की किरणें नहीं हैं, बल्कि यह ज्ञान के उदय और अज्ञानता के अंधकार के समाप्त होने का प्रतीक है।

प्रकृति द्वारा मां की वंदना (प्रथम अंतरा)

प्रथम अंतरे में प्रकृति के माध्यम से मां की आरती उतारी जा रही है। सूर्य देव उदित हो चुके हैं और पूरा आसमान लाल रंग से सराबोर हो गया है। पेड़ों की डालियों पर पक्षी चहक रहे हैं, जो ऐसा प्रतीत होता है मानो वे मां के स्वागत में मंगल गान गा रहे हों। इस पावन बेला में आपका सेवक हाथ जोड़कर आपके द्वार पर खड़ा है और आपके जागने की प्रतीक्षा कर रहा है।

पूजा की तैयारी और भक्तों का समर्पण (द्वितीय अंतरा)

द्वितीय अंतरे में भक्त अपनी पूजा की तैयारियों का वर्णन करता है। वह कहता है कि हे मां! हम गंगा जी से पवित्र जल लेकर आए हैं और कलश की स्थापना कर दी गई है। धूप, दीप और नैवेद्य (प्रसाद) से सजी थाली तैयार है। सभी नर-नारी आपके दर्शनों के लिए कतारबद्ध खड़े हैं और आपके चरणों में अपना शीश झुकाकर आशीर्वाद मांग रहे हैं।

मां का अलौकिक श्रृंगार और महिमा (तृतीय अंतरा)

अंतिम अंतरे में मां के दिव्य रूप का वर्णन है। मां की लाल चुनरी चमचमा रही है और उनके हाथों में सुंदर कंगन सुशोभित हो रहे हैं। मां की महिमा इतनी अपरम्पार है कि पूरे ग्रामीण अंचल और देहात में केवल उन्हीं के जयकारे गूंज रहे हैं। गायिका प्रीति लता भी मां के चरणों में अपनी सुरमयी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी महिमा का गान कर रही हैं।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस देवी गीत का मुख्य स्वर "वात्सल्य" और "दास्य भाव" का है। सनातन धर्म में सुबह का समय (ब्रह्ममुहूर्त) अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस समय की गई प्रार्थना सीधे परमात्मा तक पहुँचती है। यह गीत हमें संदेश देता है कि हमें अपने दिन की शुरुआत ईश्वर के स्मरण और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करते हुए करनी चाहिए। लाल रंग ऊर्जा, शक्ति और उत्साह का प्रतीक है, जो मां दुर्गा का प्रिय रंग भी है। यह गीत भक्त के भीतर एक नई सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण बिंदु जानकारी (Information)
गीत का नाम (Song Name) फूट गईल ललकी किरिनिया (Phut Gail Lalki Kiriniya Maai)
गायिका (Singer) प्रीति लता (Priti Lata)
गीत का प्रकार (Genre) भोजपुरी देवी गीत / माता भजन (Bhojpuri Devi Geet)
मुख्य भाषा (Language) भोजपुरी (Bhojpuri)
मुख्य विषय (Theme) मां दुर्गा का सुबह का जागरण और प्रकृति वंदना
उपयुक्त अवसर (Occasion) नवरात्रि, सुबह की पूजा, देवी जागरण, मंगला आरती

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

इस मधुर भजन को भोजपुरी संगीत जगत की जानी-मानी गायिका प्रीति लता ने अपनी सुरीली आवाज दी है। प्रीति लता पारंपरिक और लोक गीतों को आधुनिक संगीत के साथ इस तरह पिरोती हैं कि वह हर पीढ़ी के श्रोताओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस गीत में प्रयुक्त वाद्य यंत्र जैसे ढोलक, मंजीरा और बांसुरी पारंपरिक भोजपुरी संगीत की आत्मा को जीवंत करते हैं।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

कठिन शब्द सरल हिंदी अर्थ संदर्भ / महत्व
ललकी किरिनिया सूर्य की लाल किरणें प्रातःकाल की पहली किरण जो अंधकार को मिटाती है।
भोर सुबह / तड़के ब्रह्ममुहूर्त का समय जो साधना के लिए सर्वोत्तम है।
सुरुज देव सूर्य देवता प्रत्यक्ष देवता जो संपूर्ण जगत को प्रकाश देते हैं।
ठाढ़ खड़े होना भक्त का मां के द्वार पर श्रद्धापूर्वक खड़े रहना।
जलवा पवित्र जल (गंगाजल) कलश स्थापना और अभिषेक के लिए प्रयुक्त जल।
देहातन गांवों / ग्रामीण क्षेत्रों में लोक संस्कृति में मां की व्यापक मान्यता को दर्शाता है।

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

भोजपुरी भाषी क्षेत्रों (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड) में देवी गीतों का सांस्कृतिक महत्व बहुत गहरा है। इन क्षेत्रों में नवरात्रि के दौरान हर घर में सुबह-सुबह लाउडस्पीकर और भजनों के माध्यम से देवी मां को जगाने की परंपरा है।

  • प्रकृति और ईश्वर का संबंध: यह गीत दिखाता है कि कैसे प्रकृति (सूर्य, पक्षी, नदियां) सबसे पहले ईश्वर की आराधना करती है।
  • सामूहिकता की भावना: "ठाढ़ बाड़े नर-नारी" पंक्ति दर्शाती है कि भक्ति में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता, सभी मिलकर मां की आराधना करते हैं।
  • लोक कला का संरक्षण: ऐसे गीत हमारी क्षेत्रीय भाषाओं और लोक संगीत को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

यह देवी गीत हमें केवल भक्ति ही नहीं सिखाता, बल्कि हमारे दैनिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख भी देता है:

  1. अनुशासन और दिनचर्या: सुबह जल्दी उठना (भोर में जागना) स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिए अत्यंत आवश्यक है।
  2. कृतज्ञता का भाव: नए दिन की शुरुआत के लिए ईश्वर और प्रकृति का धन्यवाद करना चाहिए।
  3. पवित्रता: गंगाजल और धूप-दीप की तरह हमें अपने विचारों को भी शुद्ध और पवित्र रखना चाहिए।
  4. समर्पण: जब हम अपना अहंकार छोड़कर मां के चरणों में शीश झुकाते हैं, तभी हमें वास्तविक शांति मिलती है।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यद्यपि मां की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, लेकिन इस गीत को सुनने और गाने के कुछ विशेष अवसर हैं:

  • शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि: नवरात्रि के नौ दिनों में सुबह की पूजा के समय यह गीत घरों और मंदिरों में विशेष रूप से बजाया जाता है।
  • दैनिक सुबह की प्रार्थना: अपने दिन को सकारात्मक ऊर्जा से भरने के लिए इसे रोज सुबह सुना जा सकता है।
  • पारिवारिक मांगलिक कार्य: मुंडन, जनेऊ या गृह प्रवेश जैसे शुभ अवसरों पर देवी पूजन के समय इस गीत का गायन किया जाता है।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

मुख्य विशेषता संक्षिप्त विवरण
भजन का नाम फूट गईल ललकी किरिनिया माई हो
मुख्य देवी आदिशक्ति मां दुर्गा / विंध्यवासिनी
संगीत शैली पारंपरिक भोजपुरी लोक संगीत (Devi Geet)
मुख्य वाद्य यंत्र हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा, बांसुरी
भाव भक्ति, वात्सल्य और जागृति
प्रसार क्षेत्र उत्तर भारत, विशेषकर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस अत्यंत लोकप्रिय भोजपुरी देवी गीत को सुप्रसिद्ध लोक गायिका प्रीति लता (Priti Lata) ने गाया है।

"ललकी किरिनिया" का अर्थ है सूर्य की सुबह की लाल किरणें। यह अंधकार के नाश और एक नए, ज्ञानमयी सवेरे की शुरुआत का प्रतीक है।

यह भजन जगत जननी आदिशक्ति माता दुर्गा (महालक्ष्मी, महासरस्वती) को समर्पित है, जिन्हें भक्त प्यार से 'मैया' कहकर पुकारते हैं।

चूंकि यह एक जागरण गीत (प्रभात काल का भजन) है, इसलिए इसे सुबह के समय, विशेषकर ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय के समय सुनना सबसे उत्तम माना जाता है।

नवरात्रि के दौरान देवी मां के नौ रूपों की पूजा की जाती है। इस समय सुबह-सुबह देवी को जगाने और उनकी आराधना करने के लिए इस पारंपरिक गीत का गायन किया जाता है, जिससे घर में सुख-समृद्धि आती है।

यह गीत मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में बेहद लोकप्रिय है, लेकिन अपनी मधुर धुन और भक्ति भाव के कारण इसे देश-विदेश में रहने वाले सभी प्रवासी भारतीय बड़े चाव से सुनते हैं।

भजन में गंगाजल, कलश, धूप, दीप, नैवेद्य (प्रसाद) और मां के लिए लाल चुनरी व कंगन जैसी पारंपरिक पूजा सामग्रियों का उल्लेख किया गया है।

यह गीत हमें सिखाता है कि ईश्वर की भक्ति में ही परम शांति है। प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर सुबह की शुरुआत प्रार्थना से करने से जीवन में सकारात्मकता और ऊर्जा का संचार होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख लोक परंपराओं, पारंपरिक भोजपुरी देवी गीतों के मौखिक इतिहास और सनातन भक्ति ग्रंथों के आधार पर तैयार किया गया है। इस गीत की भाषा सरल, सुबोध और सीधे हृदय को छूने वाली है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि भजन के मूल शब्दों और उसकी पवित्रता में कोई बदलाव न हो। यह लेख पाठकों को न केवल गीत के बोल प्रदान करता है, बल्कि उन्हें इसके गहरे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहलुओं से भी परिचित कराता है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • भोजपुरी लोक साहित्य एवं पारंपरिक देवी गीत संग्रह।
  • श्रीमद्देवीभागवत पुराण - माता की महिमा और प्रातःकालीन पूजा विधान।
  • उत्तर भारतीय लोक संगीत एवं सांस्कृतिक अनुसंधान केंद्र की रिपोर्ट।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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