Chhath Puja Geet मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

उगी हे सुरुजदेव भईल अरघ के बेर (Ugi He Surujdev Bhayil Aragh Ke Ber) - Anirudh Singh Chhath Puja Song

पढ़ें उगी हे सुरुजदेव भईल अरघ के बेर (Ugi He Surujdev Bhayil Aragh Ke Ber) - Anirudh Singh Chhath Puja Song - Bhaktilok का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी

छठ महापर्व लोक आस्था, शुचिता और प्रकृति की आराधना का सबसे पावन उत्सव है। इस महापर्व के दौरान गाए जाने वाले लोकगीत न केवल उत्सव की शोभा बढ़ाते हैं, बल्कि भक्तों के हृदय में अगाध श्रद्धा और समर्पण का संचार भी करते हैं। ऐसा ही एक अत्यंत लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी छठ गीत है "उगी हे सुरुजदेव भईल अरघ के बेर" (Ugi He Surujdev Bhayil Aragh Ke Ber), जिसे सुप्रसिद्ध लोक गायक अनिरुद्ध सिंह ने अपनी मधुर और भावपूर्ण आवाज में गाया है। यह गीत सूर्य देव की उपासना, उनकी प्रतीक्षा और छठी मैया के प्रति अनन्य भक्ति को दर्शाता है। जब छठ व्रती नदी या तालाब के शीतल जल में खड़े होकर भगवान भास्कर के उदित होने की प्रतीक्षा करते हैं, तब यह गीत उनके धैर्य, श्रद्धा और समर्पण की पराकाष्ठा को स्वर देता है। प्रस्तुत लेख में हम इस पावन गीत के बोल, उसका विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का गहन विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

उगी हे सुरुजदेव भईल अरघ के बेर

(मुखड़ा)
उगी हे सुरुजदेव भईल अरघ के बेर।
अँजोर करीं हे प्रभु भईल अरघ के बेर॥
उगी हे सुरुजदेव भईल अरघ के बेर।
अँजोर करीं हे प्रभु भईल अरघ के बेर॥

(अंतरा 1)
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए।
बात जे पुछेले बटोहिया, बहंगी केकरा के जाए?
तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया, बहंगी छठी माई के जाए।
उगी हे सुरुजदेव भईल अरघ के बेर...

(अंतरा 2)
केला के पात पर उगेलन सुरुजदेव झांकेलन झुकेलन।
एह पर सुतलीं छठी माई, सुरुजदेव अरघ के बेर।
उगी हे सुरुजदेव भईल अरघ के बेर...

(अंतरा 3)
नारियल फलवा सेब सेवइयां, सब कुछ सजल बावे थाल।
दउरा सजवले बानी माई, दर्शन दीहीं हे कृपाल।
उगी हे सुरुजदेव भईल अरघ के बेर...

(अंतरा 4)
हाथ जोड़ि ठाढ़ बानी तीरे, अरज करीं स्वीकार।
अंधकार मिटा के प्रभु, जग में करीं उजियार।
उगी हे सुरुजदेव भईल अरघ के बेर...
अँजोर करीं हे प्रभु भईल अरघ के बेर॥

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह गीत छठ महापर्व के सबसे महत्वपूर्ण क्षण 'अर्घ्य दान' (Arghya) को समर्पित है। गीत के प्रत्येक अंतरे में लोक संस्कृति की सादगी और ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम समाहित है:

  • मुखड़ा: गीत की शुरुआत भगवान सूर्य देव से प्रार्थना के साथ होती है। व्रती और भक्तगण पुकारते हैं कि हे सूर्य देव! अब उदित हो जाइए, क्योंकि अर्घ्य देने का पावन समय हो चुका है। आप अपनी दिव्य किरणों से चारों ओर प्रकाश (अँजोर) फैलाएं और हमारे जीवन के अंधकार को दूर करें।
  • प्रथम अंतरा: इस अंतरे में छठ पूजा की प्रसिद्ध 'बहंगी' (बांस की टोकरी ले जाने वाला ढांचा) का वर्णन है। जब कोई राहगीर (बटोहिया) पूछता है कि यह सुंदर बहंगी किसके लिए जा रही है, तो उसे उत्तर मिलता है कि हे राहगीर! क्या तुम नहीं जानते कि यह पावन बहंगी साक्षात छठी मैया के लिए जा रही है। यह लोक आस्था की उस गहराई को दिखाता है जहां हर कोई इस पर्व से जुड़ा हुआ है।
  • द्वितीय अंतरा: यहां प्रकृति और देवत्व के सुंदर मिलन का वर्णन है। केले के पत्तों के बीच से जब सूर्य देव की पहली किरणें छनकर आती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो वे झुककर और झांककर अपनी बहन छठी मैया और उनके व्रतियों को देख रहे हैं। इस पावन बेला में छठी मैया जागृत हैं और सूर्य देव के अर्घ्य का समय हो गया है।
  • तृतीय एवं चतुर्थ अंतरा: भक्त अपनी पूजा की थाली और दउरा (बांस का सूप) में सजाए गए नैवेद्य जैसे नारियल, सेब, ठेकुआ आदि का वर्णन करते हैं। वे जल के किनारे हाथ जोड़कर खड़े हैं और प्रार्थना कर रहे हैं कि हे कृपालु देव! हमारे इस तुच्छ अर्पण को स्वीकार करें और संपूर्ण जगत का कल्याण करें।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत की मुख्य भावना समर्पण, धैर्य और कृतज्ञता है। छठ पूजा एक ऐसा अनूठा पर्व है जहां डूबते हुए सूर्य और उगते हुए सूर्य दोनों की पूजा की जाती है। यह गीत विशेष रूप से 'उषा अर्घ्य' यानी सुबह के अर्घ्य के समय गाया जाता है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे कितना भी अंधकार क्यों न हो, सुबह की पहली किरण के साथ नया सवेरा अवश्य आता है। गीत में प्रयुक्त 'बहंगी' और 'दउरा' जैसे शब्द इस बात का संदेश देते हैं कि ईश्वर की आराधना के लिए किसी आडंबर की आवश्यकता नहीं है, बल्कि प्रकृति द्वारा प्रदत्त सरल वस्तुओं से भी परमेश्वर को प्रसन्न किया जा सकता है।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण बिंदु जानकारी
गीत का नाम उगी हे सुरुजदेव भईल अरघ के बेर (Ugi He Surujdev Bhayil Aragh Ke Ber)
गायक अनिरुद्ध सिंह (Anirudh Singh)
गीतकार / संगीतकार पारंपरिक लोक धुन एवं अनिरुद्ध सिंह
भाषा भोजपुरी (Bhojpuri)
मुख्य विषय छठ महापर्व, सूर्य देव एवं छठी मैया की आराधना
संगीत शैली भोजपुरी लोकगीत (Chhath Puja Geet)

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

यह गीत मूल रूप से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की समृद्ध लोक परंपरा का हिस्सा है। लोक गायक अनिरुद्ध सिंह ने इस पारंपरिक गीत को अपने अनूठे अंदाज और शास्त्रीय पुट के साथ गाकर इसे एक नया जीवन दिया है। उनकी आवाज में जो दर्द, पुकार और भक्ति का भाव है, वह सीधे सुनने वाले के हृदय को छू लेता है। इस गीत का संगीत पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे ढोलक, मंजीरा और बांसुरी के सुंदर संयोजन से बना है, जो छठ घाटों पर एक अलौकिक और शांत वातावरण का निर्माण करता है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

शब्द सरल अर्थ सांस्कृतिक संदर्भ
सुरुजदेव सूर्य देव / भगवान भास्कर सृष्टि के प्रत्यक्ष देवता और ऊर्जा के स्रोत।
अरघ (अर्घ्य) पवित्र जल या दूध का अर्पण पूजा के समय देवताओं को आदरपूर्वक जल चढ़ाना।
बेर समय / बेला अर्घ्य देने का शुभ मुहूर्त।
अँजोर उजाला / प्रकाश अज्ञान और अंधकार को मिटाने वाला दिव्य प्रकाश।
बहंगिया बांस का बना हुआ ढांचा जिसमें पूजा की सामग्री रखकर घाट तक ले जाई जाती है।
बटोहिया राहगीर / यात्री संसार रूपी मार्ग पर चलने वाला साधारण मनुष्य।
दउरा बांस की बड़ी टोकरी जिसमें छठ का मुख्य प्रसाद 'ठेकुआ' और फल रखे जाते हैं।

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

वैदिक काल से ही भारत में सूर्य उपासना का विशेष महत्व रहा है। ऋग्वेद के सूर्य सूक्त में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। छठ पूजा इसी वैदिक परंपरा का लोक स्वरूप है। "उगी हे सुरुजदेव भईल अरघ के बेर" गीत केवल एक मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह एक मंत्रवत प्रार्थना है।

सांस्कृतिक रूप से, यह गीत समाज में समानता और बंधुत्व का संदेश देता है। जब घाट पर अमीर-गरीब सभी एक साथ खड़े होकर इस गीत को गाते हैं, तो सामाजिक दूरियां समाप्त हो जाती हैं। मिट्टी के चूल्हे पर बना प्रसाद, बांस के सूप और बहंगी का उपयोग यह दर्शाता है कि यह पर्व पूरी तरह से प्रकृति को समर्पित है और इसमें किसी भी प्रकार के कृत्रिम आडंबर की जगह नहीं है।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

यह पावन लोकगीत हमें कई महत्वपूर्ण जीवन मूल्य सिखाता है:

  • धैर्य और प्रतीक्षा: पूरी रात जागकर सुबह के सूर्य के उदय होने की प्रतीक्षा करना हमें सिखाता है कि कठिन समय (रात) के बाद सुखद समय (सुबह) अवश्य आता है।
  • प्रकृति का सम्मान: गीत में बांस, केला, नारियल और नदी के घाट का वर्णन है, जो हमें पर्यावरण के संरक्षण और प्रकृति के प्रति कृतज्ञ रहने की प्रेरणा देता है।
  • सादगी: महंगे उपहारों के बजाय घर में बने साधारण पकवानों (ठेकुआ) और मौसमी फलों से भगवान को प्रसन्न किया जा सकता है।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यह गीत मुख्य रूप से छठ पूजा के चार दिवसीय अनुष्ठान के दौरान गाया जाता है:

  1. खरना के बाद: जब व्रती 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू करते हैं।
  2. संध्या अर्घ्य: कार्तिक शुक्ल षष्ठी की शाम को जब अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
  3. उषा अर्घ्य: सप्तमी की सुबह जब उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, तब इस गीत की गूंज हर घाट पर सुनाई देती है।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

मुख्य विशेषता संक्षिप्त विवरण
गीत का शीर्षक उगी हे सुरुजदेव भईल अरघ के बेर
मुख्य देवता भगवान सूर्य एवं छठी मैया (प्रकृति देवी)
गायन का मुख्य समय छठ पूजा के सुबह के अर्घ्य के समय (उषा काल)
मुख्य भाव भक्ति, वात्सल्य, प्रकृति प्रेम और समर्पण
प्रयुक्त वाद्य यंत्र ढोलक, मंजीरा, बांसुरी, हारमोनियम

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इसका अर्थ है कि "हे सूर्य देव! अब आप उदित हो जाइए क्योंकि आपको अर्घ्य (जल अर्पित करने) का समय हो चुका है। अपनी किरणों से संसार में उजाला फैलाएं।"

इस प्रसिद्ध संस्करण को सुप्रसिद्ध लोक गायक अनिरुद्ध सिंह (Anirudh Singh) ने गाया है।

बहंगी बांस से बना एक ढांचा होता है जिसके दोनों सिरों पर टोकरियां लटकी होती हैं। इसमें पूजा का पवित्र प्रसाद और फल रखकर पुरुष सदस्य कंधे पर उठाकर घाट तक ले जाते हैं। यह सादगी और सेवा का प्रतीक है।

यह गीत विशेष रूप से छठ पूजा के चौथे दिन यानी 'उषा अर्घ्य' (सुबह के अर्घ्य) के समय गाया जाता है जब व्रती सूर्योदय की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।

सूर्य देव इस पृथ्वी पर जीवन के प्रत्यक्ष आधार हैं। उन्हें अर्घ्य देकर भक्त उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

हाँ, यह एक अत्यंत प्राचीन और पारंपरिक भोजपुरी लोकगीत है, जिसे पीढ़ियों से गाया जा रहा है। अनिरुद्ध सिंह सहित कई कलाकारों ने इसे नए संगीत के साथ प्रस्तुत किया है।

'बटोहिया' का अर्थ राहगीर या यात्री होता है। गीत में वह एक जिज्ञासु व्यक्ति का प्रतीक है जो लोक आस्था के इस महापर्व को कौतूहल से देख रहा है।

छठ पूजा का मुख्य प्रसाद 'ठेकुआ' है, जो गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बनाया जाता है। इसके अलावा गन्ना, नारियल और विभिन्न मौसमी फल भी चढ़ाए जाते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। हमारी संपादकीय टीम ने इस पारंपरिक छठ लोकगीत के साहित्यिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहलुओं का गहन विश्लेषण किया है। इस गीत की भाषा भोजपुरी लोक संस्कृति की आत्मा है, जो आधुनिक युग में भी अपनी प्रासंगिकता और मिठास बनाए हुए है। यह लेख पाठकों को न केवल गीत के बोल प्रदान करता है, बल्कि उन्हें इस महापर्व की गहरी दार्शनिक समझ से भी जोड़ता है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत पुराण एवं ऋग्वेद: सूर्य उपासना के वैदिक मंत्र और संदर्भ।
  • बिहार की लोक संस्कृति एवं लोकगीत परंपरा: पारंपरिक छठ गीतों का संकलन।
  • भक्तिलोक संपादकीय टीम: सांस्कृतिक और भाषाई विश्लेषण।

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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