| परब करौली हम तोहार
प्रकाशित तिथि: 2021-11-04 | अद्यतन: 2026-03-31 | संकलन: भक्तिलोक संपादकीय टीम
लोक आस्था, सूर्य उपासना और प्रकृति के प्रति अगाध कृतज्ञता के महापर्व छठ की गूंज जब पूर्वांचल की माटी से उठती है, तो संपूर्ण वातावरण छठी मईया के भजनों से पावन हो उठता है। "छठ पूजा का सबसे प्यारा भोजपुरी गीत || परब करौली हम तोहार" केवल एक लोकगीत नहीं, बल्कि एक गृहणी, एक व्रती और एक भक्त के अंतःकरण से निकला वह पवित्र उदगार है, जिसमें सूर्य नारायण और छठी मैया के प्रति अनन्य समर्पण, निष्ठा और पारिवारिक कल्याण की कामना समाहित है। भोजपुरी लोक संगीत की यह बानगी पारंपरिक वाद्ययंत्रों और लोक धुनों के माध्यम से उत्तर भारत की संस्कृति को जीवंत कर देती है। इस गीत में व्रती माता की उस कठिन तपस्या और संकल्प का सजीव चित्रण मिलता है, जो वह अपने परिवार, संतान की लंबी आयु और समाज की समृद्धि के लिए चार दिनों तक रखती है। भक्तिलोक के इस विशेष आलेख में हम इसी अत्यंत मधुर एवं लोकप्रिय छठ गीत के संपूर्ण बोल, इसके मर्म, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और आध्यात्मिक महत्व का रसास्वादन करेंगे।
सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics
भोजपुरी लोक संस्कृति और छठ महापर्व की मिठास समेटे इस अत्यंत लोकप्रिय गीत के मूल बोल नीचे दिए गए हैं:
घाटवा सजाइब हे छठी मईया, दीपवा जराइब हे,
तोहरे भरोसा हम त परब करौली, अर्घ्य धराईब हे!
परब करौली हम तोहार, हे छठी मईया,
निहुरि के चरण धरिब, सुनु अरदास मईया!
कोशिश कइनी हम त पूरा नियम से, अरघ के बेरिया भइले कम से,
दउरा उठाइब हम त माथे धइके, घाटवा जाइब हे,
तोहरे भरोसा हम त परब करौली, अर्घ्य धराईब हे!
उगहू हे सुरुज देव भइले बिहानवा, जोहे तोहरे बाट हमार पूरा परिकारवा,
किरण तोहार बरसे सुतल भाग्य जाइगे, दरसन दिहियू हे,
तोहरे भरोसा हम त परब करौली, अर्घ्य धराईब हे!
सुमित्रा के सुर सजावे महिमा गाये, बालकन के सुख सदा दिहियू बचाये,
भक्ति के दीप जले मनवा उजियार बा, अरध पहुंचाइबे,
तोहरे भरोसा हम त परब करौली, अर्घ्य धराईब हे!
गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth
इस भोजपुरी छठ गीत की पंक्तियाँ एक साधारण व्रती स्त्री की उस महानिष्ठा को प्रकट करती हैं, जो कठिन व्रत के नियमों का पालन करते हुए भगवान सूर्य और षष्ठी देवी की आराधना करती है। गीत के मुखड़े में व्रती कहती है कि हे छठी मईया! मैंने आपके लिए पूरे विधि-विधान से यह महापर्व शुरू किया है। घाट की सफाई, दीपोत्सव और सूप सजाने से लेकर अर्घ्य देने तक की हर प्रक्रिया में आपकी ही कृपा का संबल है।
दूसरे और तीसरे अंतरे में व्रती का विरह और सूर्य देव के प्रति आकुलता स्पष्ट झलकती है। वह सुबह की पहली किरण का इंतजार करते हुए कहती है कि हे सूर्य देव! पूरा परिवार आपकी प्रतीक्षा में बैठा है। आपकी एक किरण हमारे सोए हुए भाग्य को जगा सकती है। यह गीत केवल एक संगीत रचना नहीं है, बल्कि यह भौतिक संसार से ऊपर उठकर प्रकृति (सूर्य) और मातृत्व शक्ति (छठी मईया) के प्रति समर्पण की साक्षात अभिव्यक्ति है। इस प्रकार के भावुक छठ पूजा गीत भक्तों के अंतर्मन को पवित्र कर देते हैं।
गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message
- अनन्य समर्पण एवं विश्वास: गीत का केंद्रीय भाव यह है कि भगवान पर अटूट विश्वास होने पर कठिन से कठिन व्रत और साधना भी सहज हो जाती है।
- पारिवारिक कल्याण: संतान की रक्षा, परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्यता की कामना इस गीत का मुख्य उद्देश्य है।
- प्रकृति और जीवंतता: जल, थल, सूर्य और सूप-दउरा जैसी प्राकृतिक सामग्रियों के साथ जुड़कर जीने का संदेश देता है।
- लोक संस्कृति का संरक्षण: भोजपुरी भाषा की मधुरता के माध्यम से लोक परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का सशक्त माध्यम है।
गीत की जानकारी | Song Information
| गीत का नाम | परब करौली हम तोहार (छठ पूजा गीत) |
|---|---|
| गायिका / कलाकार | सुमित्रा बनर्जी (Sumitra Banerjee) |
| भाषा | भोजपुरी (Bhojpuri) |
| संगीत शैली | पारंपरिक लोक भजन / छठ गीत |
| मुख्य विषय | सूर्य उपासना, छठी मईया की महिमा, व्रत एवं साधना |
| संबंधित पर्व | छठ महापर्व (Chhath Puja) |
कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings
| शब्द / पद | सरल अर्थ | संदर्भ / प्रसंग |
|---|---|---|
| परब | पर्व या व्रत (त्योहार) | छठ पूजा के अनुष्ठान के संदर्भ में |
| निहुरि के | झुककर या प्रणाम करके | छठी मईया के चरणों में श्रद्धा अर्पित करना |
| दउरा | बांस से बनी टोकरी | जिसमें पूजा का प्रसाद और फल सजाए जाते हैं |
| बेरिया | समय या बेला | अर्घ्य देने का निश्चित समय |
| परिकारवा | परिवार | घर-परिवार के सभी सदस्य |
गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance
छठ महापर्व भारतीय सनातन संस्कृति में एकमात्र ऐसा अनुष्ठान है जिसमें अस्त होते और उदय होते दोनों रूपों में सूर्य की पूजा की जाती है। यह पर्व प्रकृति की पूजा का सर्वोच्च उदाहरण है। इस गीत के माध्यम से लोक जीवन की सरलता और शुचिता का दर्शन होता है। जब व्रती महिलाएं नदी के घाट पर सूप लेकर इन गीतों को गाती हैं, तो पूरा वातावरण ऊर्जावान और भक्तिमय हो जाता है। यह गीत समाज को जाति, वर्ग और लिंग के भेदों से परे एक सूत्र में पिरोने का कार्य करता है। इसी प्रकार के अन्य पारंपरिक अनुष्ठानों और गीतों के लिए आप Latest Bhakti Song संग्रह का भी अवलोकन कर सकते हैं।
गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing
यह गीत मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तक चलने वाले छठ महापर्व के दौरान गाया और सुना जाता है। विशेषकर खरना के दिन, संध्या अर्घ्य के समय जब व्रती महिलाएं घाट की ओर प्रस्थान करती हैं, और उषा अर्घ्य के पावन वेला में इस प्रकार के मधुर भजन सुनने से मन को असीम शांति मिलती है। इसके अलावा लोक संगीत के कार्यक्रमों, सांस्कृतिक मंचों और घरों में भी यह गीत बड़ी श्रद्धा से बजाया जाता है। इस पावन अवसर पर अन्य व्रतों जैसे Govardhan puja vrat kath का स्मरण भी पारिवारिक सुख-शांति के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
भक्तिलोक पर प्रस्तुत यह आलेख पारंपरिक लोक साहित्य, सांस्कृतिक संदर्भों और श्रोताओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इस आलेख का उद्देश्य हमारी समृद्ध लोक संस्कृति और छठ पर्व के गीतों के आध्यात्मिक व सांस्कृतिक पक्षों को पाठकों तक प्रामाणिक रूप से पहुँचाना है।
स्रोत एवं संदर्भ:
- पारंपरिक भोजपुरी लोकगीत संग्रह एवं मौखिक परंपराएं
- सूर्य षष्ठी व्रत कथा एवं लोक साहित्य अनुसंधान
- भक्तिलोक संगीत एवं सांस्कृतिक अभिलेखागार
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