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Uthau Suruj Bhaile Bihaan By Sharda Sinha Chhath Songs [Full Song] Chhathi Maiya

पढ़ें Uthau Suruj Bhaile Bihaan By Sharda Sinha Bhojpuri Chhath Songs [Full Song] Chhathi Maiya का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं

बिहार कोकिला स्वर कोकिला स्वर्गीय शारदा सिन्हा जी की दिव्य और सुमधुर आवाज में गाया गया छठ गीत "उठहु सुरुज भइले बिहान" (Uthau Suruj Bhaile Bihaan) केवल एक गीत नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, समर्पण और अश्रुपूरित प्रार्थना का जीवंत प्रतीक है। लोक आस्था के महापर्व छठ के पावन अवसर पर, विशेष रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को उदीयमान सूर्य (सुबह के अर्घ्य) के समय यह गीत हर घाट, हर घर और हर गली में गूंजता है। इस गीत में छठी मैया और भगवान सूर्य देव से जागृत होने और अपने भक्तों को दर्शन देकर उनका अर्घ्य स्वीकार करने की अत्यंत भावुक और मार्मिक विनती की गई है। शारदा सिन्हा जी के कंठ की पवित्रता और इस गीत के पारंपरिक भोजपुरी शब्द मिलकर एक ऐसा आध्यात्मिक वातावरण निर्मित करते हैं, जो मनुष्य को सीधे प्रकृति और परमात्मा से जोड़ देता है।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

उठहु सुरुज भइले बिहान - छठ गीत

उठहु सुरुज भइले बिहान, हे सुरुजदेव!
अरघ के रे बेरवा, उठहु सुरुज भइले बिहान।
अंजलि जोरि ठाढ़ि बानी, हे सुरुजदेव!
अरघ के रे बेरवा, उठहु सुरुज भइले बिहान॥

गंगा के तीरे-तीरे ठाढ़ि बानी बरतिया,
बाट जोहेली तोहार, हे सुरुजदेव!
अरघ के रे बेरवा, उठहु सुरुज भइले बिहान॥

कांच ही बांस के बहंगिया,
बहंगी लचकत जाए, हे सुरुजदेव!
अरघ के रे बेरवा, उठहु सुरुज भइले बिहान॥

केरवा जे फरेला घवद से,
ओह पर सुगा मेड़राय, हे सुरुजदेव!
अरघ के रे बेरवा, उठहु सुरुज भइले बिहान॥

सभ कोइ अरघ देवे सुरुजदेव,
हमरो पर होखू सहाई, हे सुरुजदेव!
अरघ के रे बेरवा, उठहु सुरुज भइले बिहान॥

उठहु सुरुज भइले बिहान, हे सुरुजदेव!
अरघ के रे बेरवा, उठहु सुरुज भइले बिहान॥

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह पारंपरिक छठ गीत भगवान सूर्य देव की स्तुति और उनसे उदित होने की प्रार्थना पर आधारित है। गीत के प्रत्येक अंतरे में गहरी श्रद्धा और लोक संस्कृति का सुंदर चित्रण है:

  • प्रथम अंतरा (उठहु सुरुज भइले बिहान): हे सूर्य देव! अब सुबह हो चुकी है, अंधकार छंट गया है। आपके अर्घ्य का पावन समय आ गया है। कृपया उदित होइए। आपके भक्त हाथ जोड़कर, अंजलि में जल और प्रसाद लेकर नदी के किनारे खड़े हैं और आपके दर्शन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
  • द्वितीय अंतरा (गंगा के तीरे-तीरे): गंगा नदी के पवित्र तट पर व्रत करने वाली महिलाएं (व्रती) और उनके परिवार के सदस्य खड़े हैं। वे सब आपकी राह देख रहे हैं कि कब आपकी पहली किरण धरती पर पड़े और वे आपको श्रद्धापूर्वक अर्घ्य अर्पित कर सकें।
  • तृतीय अंतरा (कांच ही बांस के बहंगिया): छठ पूजा की पवित्र सामग्री को ले जाने के लिए कच्चे बांस से बनी बहंगी (टोकरी) का उपयोग किया जाता है। वह बहंगी पूजा के फलों और प्रसादों के भार से लचक रही है। यह दृश्य भक्तों की अपार श्रद्धा और तैयारी को दर्शाता है।
  • चतुर्थ अंतरा (केरवा जे फरेला घवद से): केले के घौद (गुच्छे) और अन्य फल जो पूजा के लिए लाए गए हैं, वे इतने शुद्ध और ताजे हैं कि उन पर पक्षी (सुगा) भी मंडरा रहे हैं। लेकिन व्रती उन्हें पूरी शुद्धता के साथ बचाकर केवल आपके चरणों में अर्पित करने के लिए लाए हैं।
  • पंचम अंतरा (सभ कोइ अरघ देवे): हे सूर्य देव! संसार के सभी लोग आपकी पूजा कर रहे हैं और आपको अर्घ्य दे रहे हैं। मुझ दीन-हीन और साधारण भक्त पर भी अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें और मेरी पूजा को स्वीकार कर मुझ पर सहायक बनें।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत की मुख्य भावना समर्पण, धैर्य और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता है। सनातन धर्म में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है, जो संपूर्ण जगत को जीवन और ऊर्जा प्रदान करते हैं। छठ महापर्व के दौरान, भक्त पूरी रात जागकर सुबह के सूर्य देव के उदय होने की प्रतीक्षा करते हैं। यह गीत उस प्रतीक्षा की पराकाष्ठा को दर्शाता है। इसमें कोई आडंबर नहीं है, बल्कि बांस की बहंगी, मिट्टी के दीये, और ताजे फलों जैसे अत्यंत सरल और प्राकृतिक साधनों के माध्यम से ईश्वर की आराधना की गई है। यह गीत संदेश देता है कि सच्ची भक्ति के लिए किसी महंगे साधन की नहीं, बल्कि शुद्ध मन और अटूट विश्वास की आवश्यकता होती है।

गीत की जानकारी | Song Information

विषय विवरण
गीत का नाम उठहु सुरुज भइले बिहान (Uthau Suruj Bhaile Bihaan)
गायिका शारदा सिन्हा (Sharda Sinha) - बिहार कोकिला
गीत का प्रकार पारंपरिक भोजपुरी छठ गीत (Chhath Geet)
मुख्य देवता भगवान सूर्य (सुरुजदेव) और छठी मैया
भाषा भोजपुरी (Bhojpuri)
मुख्य वाद्य यंत्र ढोलक, मंजीरा, बांसुरी, हारमोनियम
प्रासंगिकता छठ पूजा (सुबह का अर्घ्य - उदीयमान सूर्य पूजा)

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

इस कालजयी गीत को अपनी स्वर्गीय आवाज से अमर बनाने का श्रेय पद्म भूषण शारदा सिन्हा जी को जाता है। शारदा सिन्हा जी ने भोजपुरी, मैथिली और मगही लोकगीतों को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई। उनके गाए हुए छठ गीतों के बिना छठ महापर्व की कल्पना भी अधूरी लगती है। इस गीत में प्रयुक्त संगीत पारंपरिक लोक धुनों पर आधारित है, जो सदियों से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में गाया जाता रहा है। शारदा सिन्हा जी की आवाज में जो दर्द, पुकार और भक्ति का अनूठा संगम है, वह सुनने वाले की आंखों में श्रद्धा के आंसू ला देता है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

कठिन शब्द सरल अर्थ सांस्कृतिक संदर्भ
सुरुजदेव सूर्य देव (भगवान भास्कर) छठ पर्व के प्रत्यक्ष आराध्य देव।
बिहान सुबह / प्रातःकाल रात के अंधकार के बाद नई सुबह का आगमन।
अरघ (अर्घ्य) पवित्र जल या दूध का अर्पण सूर्य देव को दिया जाने वाला अर्घ्य।
बेरवा समय / वेला अर्घ्य देने का शुभ मुहूर्त या समय।
बरतिया व्रत करने वाले (व्रती) छठ का अत्यंत कठिन 36 घंटे का निर्जला व्रत रखने वाले।
बहंगिया बांस का बना हुआ कांवर जिसमें पूजा का सूप और फल रखकर घाट पर ले जाया जाता है।
सुगा तोता (पक्षी) पवित्र फलों की शुद्धता बनाए रखने के प्रतीक रूप में प्रयुक्त।

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

वैदिक काल से ही सूर्य उपासना का अत्यंत महत्व रहा है। ऋग्वेद में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। छठ पूजा इसी वैदिक परंपरा का लोक स्वरूप है। "उठहु सुरुज भइले बिहान" गीत का आध्यात्मिक महत्व इस बात में है कि यह साधक के भीतर के अंधकार को मिटाकर ज्ञान रूपी सूर्य के उदय होने की प्रार्थना है। सांस्कृतिक रूप से, यह गीत पूर्वी भारत (बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश) की सामूहिक पहचान और लोक कला का प्रतिनिधित्व करता है। जब लाखों लोग एक साथ नदी के घाटों पर खड़े होकर इस गीत को सुनते हैं, तो जाति, वर्ग और सामाजिक भेदभाव मिट जाते हैं और केवल सामूहिक भक्ति शेष रह जाती है।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

यह पावन लोकगीत हमें कई महत्वपूर्ण व्यावहारिक और आध्यात्मिक सीख देता है:

  1. धैर्य और प्रतीक्षा: जैसे व्रती पूरी रात ठंड में नदी के किनारे खड़े होकर सूर्योदय की प्रतीक्षा करते हैं, वैसे ही हमें अपने जीवन के कठिन समय में धैर्यपूर्वक अच्छे दिनों (सवेरे) की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
  2. प्रकृति का सम्मान: यह गीत बांस, फल, गंगाजल और सूर्य जैसी प्राकृतिक शक्तियों की पूजा करना सिखाता है, जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश है।
  3. समानता और सरलता: छठ पूजा में राजा और रंक सभी एक ही घाट पर मिट्टी के बर्तनों और सूप के साथ खड़े होते हैं। यह गीत जीवन में सादगी अपनाने की प्रेरणा देता है।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यद्यपि यह गीत छठ पूजा के चारों दिनों (नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य) के दौरान सुना जाता है, लेकिन इसका वास्तविक महत्व चौथे दिन यानी सप्तमी की सुबह होता है। जब व्रती घुटने तक पानी में खड़े होकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्य देव के निकलने का इंतजार करते हैं, तब यह गीत लाउडस्पीकरों और घाटों पर सजीव गाया जाता है। इस गीत को सुनने से व्रतियों की थकान दूर होती है और उनके मन में असीम ऊर्जा का संचार होता है।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

मुख्य बिंदु महत्वपूर्ण तथ्य
मुख्य विषय उदीयमान सूर्य देव से उदित होने की प्रार्थना
गायन शैली पारंपरिक भोजपुरी लोक शैली (छठ गीत)
भाव करुणा, समर्पण, विनय और वात्सल्य
प्रसिद्ध गायिका शारदा सिन्हा (Sharda Sinha)
मुख्य प्रतीक बांस की बहंगी, गंगा घाट, केला, सुगा
संबंधित पर्व कार्तिक एवं चैती छठ पूजा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह अत्यंत लोकप्रिय और पारंपरिक छठ गीत बिहार की सुप्रसिद्ध लोक गायिका पद्म भूषण स्वर्गीय शारदा सिन्हा जी द्वारा गाया गया है।

इस गीत का मुख्य संदेश भगवान सूर्य देव से प्रार्थना करना है कि वे शीघ्र उदित हों ताकि नदी के किनारे खड़े व्रती उन्हें अर्घ्य दे सकें और अपना कठिन व्रत संपन्न कर सकें।

सुबह का अर्घ्य (उषा अर्घ्य) उदीयमान सूर्य को दिया जाता है। यह जीवन में नई ऊर्जा, आरोग्य, तेज और अंधकार की समाप्ति का प्रतीक है। इसके साथ ही छठ का महापर्व संपन्न होता है।

इसका अर्थ है कच्चे बांस से बनी टोकरी या कांवर, जिसका उपयोग छठ पूजा के पवित्र प्रसाद (ठेकुआ, फल आदि) को अत्यंत शुद्धता के साथ घाट तक ले जाने के लिए किया जाता है।

शारदा सिन्हा जी की आवाज में गजब की सादगी, पवित्रता और मिट्टी की सोंधी खुशबू महसूस होती है। उनके गीतों में छठ पर्व की पारंपरिक आत्मा बसती है, जो सीधे दिल को छूती है।

हां, यह गीत कार्तिक मास की मुख्य छठ पूजा के साथ-साथ चैत्र मास में होने वाली चैती छठ पूजा के दौरान भी समान श्रद्धा और उत्साह के साथ गाया और सुना जाता है।

लोक कथाओं के अनुसार, पूजा के फलों को पक्षी जूठा न करें, इसके लिए व्रती बहुत सतर्क रहते हैं। गीत में सुगा का मंडराना फलों की मिठास और शुद्धता को बचाने के मानवीय प्रयास को दर्शाता है।

इस गीत को सुनने से मन में परम शांति, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, करुणा और प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम का भाव जाग्रत होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस पावन छठ गीत की व्याख्या और इसके सांस्कृतिक पहलुओं का संकलन पारंपरिक मान्यताओं, लोक कथाओं और वैदिक सूर्य उपासना के सिद्धांतों के आधार पर किया गया है। शारदा सिन्हा जी के गीतों की विरासत को संजोने और नई पीढ़ी तक इसकी शुद्धता पहुंचाने के उद्देश्य से इस सामग्री को अत्यंत सावधानीपूर्वक तैयार किया गया है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • ऋग्वेद - सूर्य सूक्त एवं उषा स्तुति संदर्भ
  • बिहार की लोक संस्कृति और पारंपरिक छठ गीत संग्रह
  • शारदा सिन्हा जी के आधिकारिक संगीत एल्बम और साक्षात्कार
  • सनातन धर्म के पर्व एवं त्योहारों की शास्त्रीय नियमावली

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 09 Oct 2026

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