श्री हनुमान जी महाराज कलयुग के जाग्रत देव हैं, जो अपने भक्तों की पुकार पर अति शीघ्र प्रसन्न होकर उनके सभी संकटों का हरण कर लेते हैं। "हनुमान जब चले" भजन सनातन धर्म के श्रद्धालुओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय और ऊर्जा से भर देने वाला संकीर्तन है। यह भजन वीर रस, भक्ति रस और शरणागति के अद्भुत समन्वय को प्रदर्शित करता है। जब साधक इस भजन का गायन करता है, तो उसके भीतर भय, संशय और नकारात्मकता का नाश होता है तथा अदम्य साहस, आत्मविश्वास और प्रभु श्री राम के प्रति अनन्य भक्ति का उदय होता है। इस भजन में हनुमान जी के उस पराक्रम और वेग का वर्णन है, जब वे प्रभु श्री राम के कार्यों की सिद्धि के लिए प्रस्थान करते हैं। चाहे वह समुद्र लांघना हो, लंका दहन करना हो या फिर लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा के लिए द्रोणागिरि पर्वत उठाना हो, हनुमान जी का हर एक कदम धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश के लिए उठता है। इस विस्तृत लेख में हम इस पावन भजन के संपूर्ण लिरिक्स, भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व, पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या और इससे जुड़े शास्त्रीय प्रसंगों का गहन अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ हनुमान जब चले ॥
(कोरस / मुखड़ा)
हनुमान जब चले, राम नाम जपते चले।
हाथ में गदा विराजे, मुख में राम नाम साजे,
हृदय में सिया-राम की मूरत बसाते चले॥
हनुमान जब चले, राम नाम जपते चले...॥
(अंतरा - 1)
लांघ के समंदर भारी, चौंक उठी दुनिया सारी,
सुरसा का मान मर्दन, सिंहिका को मार चले।
लंका में कदम रखा, काल का रूप चखा,
अक्षय कुमार को पछाड़, अशोक वाटिका उजाड़ चले॥
हनुमान जब चले, राम नाम जपते चले...॥
(अंतरा - 2)
सोने की लंका जलाई, रावण की सेना थर्राई,
मैया सीता को धीरज बंधाते चले।
चूड़ामणि निशानी लेके, राम जी को हर्ष देके,
प्रभु के चरणों में शीश झुकाते चले॥
हनुमान जब चले, राम नाम जपते चले...॥
(अंतरा - 3)
लक्ष्मण को शक्ति लागी, राम जी की धीरज त्यागी,
द्रोणागिरि पर्वत को हाथ पे उठाते चले।
कालनेमि कपट तोड़ा, भरत जी का संशय मोड़ा,
संजीवनी बूटी लाके प्राण बचाते चले॥
हनुमान जब चले, राम नाम जपते चले...॥
(अंतरा - 4)
अहिरावण पाताल सिधारा, पंचमुखी रूप धारा,
राम-लक्ष्मण को कंधे पे बिठाते चले।
भक्तों के संकट टाले, अंजनी के लाल प्यारे,
'भक्तिलोक' में गूंजे नाम, जय श्री राम गाते चले॥
हनुमान जब चले, राम नाम जपते चले...॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस पावन भजन का मूल भावार्थ हनुमान जी की निस्वार्थ सेवा, असीम बल और अटूट राम-भक्ति को रेखांकित करता है। भजन की शुरुआत में ही यह स्पष्ट किया गया है कि हनुमान जी जब भी किसी कार्य के लिए प्रस्थान करते हैं, तो उनका सबसे बड़ा संबल और अस्त्र "राम नाम" होता है। उनके एक हाथ में वज्र के समान गदा सुशोभित है, जो दुष्टों के दमन का प्रतीक है, और उनके मुख में निरंतर राम नाम का जप चलता रहता है, जो उनकी परम शांति और भक्ति का परिचायक है।
भजन के माध्यम से भक्त यह अनुभव करता है कि जब हमारे जीवन में संकटों का पहाड़ टूट पड़े, तब हमें भी हनुमान जी की भांति अपने हृदय में प्रभु श्री राम और माता सीता की छवि को स्थापित कर, राम नाम का आश्रय लेकर आगे बढ़ना चाहिए। हनुमान जी का चरित्र हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन मार्ग भी सुगम हो जाता है यदि हमारे संकल्प निस्वार्थ हों और हमारा विश्वास अडिग हो। समुद्र लांघने से लेकर संजीवनी बूटी लाने तक के सभी प्रसंग यह दर्शाते हैं कि हनुमान जी के लिए कुछ भी असंभव नहीं है, क्योंकि वे स्वयं को कर्ता न मानकर केवल प्रभु श्री राम का यंत्र मानते हैं।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह हनुमान जी के चरित्र की दिव्य विशेषताओं का एक संक्षिप्त दस्तावेज है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- वीर और भक्ति रस का संगम: इस भजन में जहां एक ओर हनुमान जी के शौर्य, पराक्रम और बल का ओजस्वी वर्णन है, वहीं दूसरी ओर उनके दास्य भाव और अनन्य समर्पण की कोमलता भी समाहित है।
- भय का निवारण: इस भजन के नियमित श्रवण और कीर्तन से साधक के मन से अज्ञात भय, चिंता और अवसाद का समूल नाश होता है।
- राम नाम की महिमा: भजन बार-बार इस बात पर बल देता है कि हनुमान जी की समस्त शक्तियों का स्रोत "राम नाम" का निरंतर जप है।
- संकटमोचन स्वरूप का स्मरण: यह भजन हमें याद दिलाता है कि जब भी धर्म पर संकट आया या प्रभु के प्रियजनों पर विपत्ति आई, हनुमान जी सदैव रक्षक बनकर खड़े रहे।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि प्रभु की आराधना के लिए सभी समय शुभ हैं, तथापि हनुमान जी की पूजा और उनके भजनों के गायन के लिए कुछ विशेष नियम और समय अत्यंत फलदायी माने गए हैं:
- शुभ दिन: मंगलवार और शनिवार का दिन हनुमान जी की आराधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसके अतिरिक्त हनुमान जयंती के पावन अवसर पर इस भजन का सामूहिक कीर्तन अत्यंत मंगलकारी होता है।
- सर्वश्रेष्ठ समय: ब्रह्ममुहूर्त (सुबह 4 से 6 बजे) या संध्याकाल में हनुमान जी की आरती के पश्चात इस भजन का गायन करना चाहिए।
- गायन की विधि: सर्वप्रथम शुद्ध वस्त्र धारण कर हनुमान जी के चित्र या विग्रह के सम्मुख चमेली के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। इसके बाद शांत चित्त से बैठकर, हाथ में झांझ या मंजीरा लेकर सस्वर इस भजन का गायन करें। गायन के समय मन में यह भाव होना चाहिए कि हनुमान जी स्वयं वहां उपस्थित होकर आपकी पुकार सुन रहे हैं।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्रावतार, अंजनी पुत्र श्री हनुमान जी महाराज को समर्पित है। हनुमान जी को अष्ट सिद्धि और नौ निधियों के दाता के रूप में पूजा जाता है। इस भजन में उनके आराध्य प्रभु श्री रामचंद्र जी, माता सीता, भ्राता लक्ष्मण और भरत जी का भी पावन स्मरण किया गया है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री हनुमान चालीसा और सुंदरकांड में जिस प्रकार हनुमान जी के चरित्र का चित्रण किया है, यह भजन उसी परंपरा को आधुनिक और सुगम काव्य रूप में प्रस्तुत करता है। संतों का मानना है कि जहां भी हनुमान जी का कीर्तन होता है, वहां वे अदृश्य रूप में उपस्थित होकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से रसपान करते हैं।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
इस भजन की पृष्ठभूमि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस के सुंदरकांड और लंकाकांड पर आधारित है। जब सीता माता की खोज के लिए वानर सेना व्याकुल थी, तब जामवंत जी ने हनुमान जी को उनके सोए हुए बल का स्मरण कराया था। बल का स्मरण होते ही हनुमान जी ने जो विशाल रूप धारण किया और "राम काज कीन्हें बिना मोहि कहां विश्राम" का उद्घोष करते हुए महेंद्र पर्वत से छलांग लगाई, वही इस भजन की मूल प्रेरणा है। यह भजन सदियों से चली आ रही लोक-भजन परंपरा का एक आधुनिक संस्करण है, जो आज के युवाओं को भी अपनी जड़ों और संस्कृति से जोड़ने में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो रहा है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और प्रवाहमयी खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें अवधी और संस्कृत के तत्सम शब्दों का सुंदर सम्मिश्रण है। इसकी काव्य शैली गेय (गाए जाने योग्य) है, जिसमें लय और ताल का अद्भुत संतुलन है।
भजन में प्रयुक्त रूपक और उपमाएं अत्यंत सजीव हैं। जैसे "काल का रूप चखा" और "कपट तोड़ा" जैसी पंक्तियां श्रोता के मन में एक वीर रस से परिपूर्ण चित्र अंकित करती हैं। अंतरा की प्रत्येक पंक्ति के अंत में आने वाले तुकांत शब्द भजन को एक सुंदर प्रवाह प्रदान करते हैं, जिससे इसे याद रखना और सामूहिक रूप से गाना अत्यंत सरल हो जाता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें केवल भक्ति का मार्ग ही नहीं दिखाता, बल्कि व्यावहारिक जीवन के लिए कई अमूल्य सीख भी प्रदान करता है:
| हनुमान जी का प्रसंग | आध्यात्मिक संदेश | दैनिक जीवन में सीख | |
|---|---|---|---|
| सुरसा और सिंहिका का वध | मार्ग की बाधाओं को बुद्धि और बल से पार करना। | चुनौतियों से घबराने के बजाय विवेकपूर्ण निर्णय लें। | |
| द्रोणागिरि पर्वत उठाना | असंभव कार्य को भी संकल्प से संभव बनाना। | अपनों की रक्षा और कर्तव्य के लिए सर्वस्व झोंक देना। | |
| राम नाम का निरंतर जप | परमात्मा पर अटूट विश्वास ही वास्तविक शक्ति है। | कार्य करते समय मन को शांत और ईश्वर से जोड़े रखें। | |
| सीता माता को चूड़ामणि देना | विश्वसनीय दूत और निष्काम सेवक का आदर्श। | अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी ईमानदारी और निष्ठा से करें। |
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| कठिन शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | संदर्भ एवं महत्व |
|---|---|---|
| मान मर्दन | अहंकार को नष्ट करना | हनुमान जी ने सुरसा के अहंकार को अपनी बुद्धि से शांत किया था। |
| अशोक वाटिका | रावण का वह उपवन जहां माता सीता बंदी थीं | हनुमान जी ने यहां पहुंचकर माता सीता को सांत्वना दी थी। |
| द्रोणागिरि | हिमालय का वह पर्वत जहां संजीवनी बूटी थी | बूटी की पहचान न होने पर हनुमान जी पूरा पर्वत ही उठा लाए थे। |
| अहिरावण | पाताल लोक का राजा और रावण का भाई | हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धरकर इसका वध किया था। |
| संशय | संदेह या दुविधा | भरत जी के मन में हनुमान जी को देखकर जो भ्रम हुआ था, उसे दूर किया। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
१. "हनुमान जब चले, राम नाम जपते चले..."
जब हनुमान जी किसी कार्य के लिए प्रस्थान करते हैं, तो वे अपने बल के घमंड में नहीं, बल्कि प्रभु श्री राम के नाम का आश्रय लेकर चलते हैं। राम नाम ही उनकी यात्रा को मंगलमय और सफल बनाता है।
२. "हाथ में गदा विराजे, मुख में राम नाम साजे..."
उनके एक हाथ में दुष्टों को दंड देने वाली गदा सुशोभित है, जो शक्ति का प्रतीक है, और उनके मुख पर निरंतर राम नाम का मधुर जप चलता रहता है, जो परम शांति का प्रतीक है।
३. "लांघ के समंदर भारी, चौंक उठी दुनिया सारी..."
जब हनुमान जी ने एक ही छलांग में विशाल समुद्र को पार कर लिया, तो उनकी इस अकल्पनीय शक्ति को देखकर देव, गंधर्व और संपूर्ण सृष्टि आश्चर्यचकित रह गई।
४. "सुरसा का मान मर्दन, सिंहिका को मार चले..."
मार्ग में आने वाली बाधाओं जैसे सुरसा (जिसने उनकी परीक्षा ली) के अहंकार को उन्होंने अपनी बुद्धि से शांत किया और सिंहिका (जो छाया पकड़ने वाली राक्षसी थी) का वध कर वे आगे बढ़े।
५. "लक्ष्मण को शक्ति लागी, राम जी की धीरज त्यागी..."
जब युद्ध भूमि में मेघनाद के शक्ति बाण से लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए और भगवान राम साधारण मनुष्यों की भांति विलाप करने लगे, तब हनुमान जी ने संकटमोचक की भूमिका निभाई।
६. "संजीवनी बूटी लाके प्राण बचाते चले..."
वे रात्रि के समय ही द्रोणागिरि पर्वत पर गए और सूर्योदय से पूर्व संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा की, जिससे प्रभु राम का संताप दूर हुआ।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के कीर्तन के पूर्व या पश्चात हनुमान जी के इन सिद्ध मंत्रों का जप करने से भजन का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है:
"मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥"
भावार्थ: जो मन के समान वेगवान हैं, वायुदेव के समान तेजस्वी हैं, जिन्होंने अपनी इंद्रियों को जीत लिया है, जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, उन पवनपुत्र श्रीरामदूत हनुमान जी की शरण में मैं जाता हूँ।
इसके अतिरिक्त, हनुमान जी का यह मूल मंत्र भी अत्यंत प्रभावशाली है:
"ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्"
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विवरण बिंदु | महत्वपूर्ण जानकारी |
|---|---|
| भजन का नाम | हनुमान जब चले (Hanuman Jab Chale) |
| मुख्य आराध्य देव | श्री हनुमान जी महाराज (संकटमोचन) |
| भक्ति का भाव (Bhava) | वीर रस, दास्य भाव, शरणागति |
| काव्य भाषा | सरल हिंदी (खड़ी बोली) |
| मुख्य प्रसंग | सुंदरकांड, लंका दहन, संजीवनी लाना |
| उपयुक्त अवसर | मंगलवार पूजा, शनिवार शनि शांति, हनुमान जयंती, सुंदरकांड पाठ |
| आध्यात्मिक लाभ | भयमुक्ति, आत्मविश्वास में वृद्धि, नकारात्मक ऊर्जा का नाश |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और अर्थ को सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों जैसे गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस (सुंदरकांड एवं लंकाकांड) और वाल्मीकि रामायण के प्रसंगों के आलोक में समीक्षित किया गया है। भजन के शब्दों की शुद्धता और उनके आध्यात्मिक अर्थों को सुनिश्चित करने के लिए वैदिक विद्वानों और संगीतकारों के परामर्श का सहयोग लिया गया है, ताकि पाठकों तक त्रुटिहीन और उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री पहुंच सके।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण: सुंदरकांड एवं युद्धकांड के पावन प्रसंग।
- श्रीरामचरितमानस: गोस्वामी तुलसीदास कृत, गीता प्रेस गोरखपुर संस्करण।
- हनुमान अंक: कल्याण (गीता प्रेस), जिसमें हनुमान जी की महिमा और विभिन्न भजनों का संकलन है।
- पारंपरिक लोक भजन संग्रह: विभिन्न संतों और कीर्तनकारों द्वारा गाए जाने वाले पारंपरिक पद।
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