बाल काण्ड अध्याय 5 | 20 श्लोक

अयोध्या का वर्णन

बाल काण्ड का पञ्चम सर्ग अयोध्या नगरी के सौन्दर्य, वैभव और समृद्धि का अत्यन्त विस्तृत एवं सजीव वर्णन प्रस्तुत करता है। इस सर्ग में नगरी की भौगोलिक स्थिति, वास्तुकला, सुरक्षा व्यवस्था, निवासियों के गुण, वाणिज्य-व्यापार और राजमहल के ऐश्वर्य का चित्रण है। यह वर्णन एक आदर्श नगरी की कल्पना को साकार रूप में प्रस्तुत करता है।

अध्याय के सभी श्लोक

सर्वा पूर्वमियं येषामासीत् कृत्स्ना वसुंधरा। प्रजापतिमुपादाय नृपाणां जयशालिनाम्॥

“यह सम्पूर्ण वसुंधरा पहले उन जयशाली राजाओं के अधीन थी, जिन्होंने प्रजापति (मनु) से लेकर (राज्य किया)।”

अर्थ: यह श्लोक उन प्रतापी राजाओं की वंश परंपरा का उल्लेख करता है जिनके अधीन सम्पूर्ण पृथ्वी थी। इसमें इक्ष्वाकु वंश की महानता का संकेत है।

टिप्पणी: यह श्लोक बालकाण्ड के पाँचवें सर्ग का प्रथम श्लोक है, जिसमें अयोध्या के राजवंश की पृष्ठभूमि बताई गई है।

येषां स सगरो नाम सागरो येन खानितः। षष्टिपुत्रसहस्राणि यं यान्तं पर्यवारयन्॥

“उन राजाओं में सगर नामक राजा हुए, जिन्होंने सागर (समुद्र) की खुदाई करवाई। उनके साठ हजार पुत्र उनके पीछे-पीछे चलते थे।”

अर्थ: इस श्लोक में सगर राजा का वर्णन है, जिन्होंने सागर (समुद्र) की खुदाई करवाई और उनके साठ हजार पुत्र थे। यह इक्ष्वाकु वंश के एक प्रतापी राजा का उल्लेख है।

टिप्पणी: सगर राजा की कथा रामायण और पुराणों में प्रसिद्ध है। उनके पुत्रों के कारण ही समुद्र को सागर कहा जाता है।

इक्ष्वाकूणामिदं तेषां राज्ञां वंशे महात्मनाम्। महदुत्पन्नमाख्यानं रामायणमिति श्रुतम्॥

“उन महात्मा इक्ष्वाकु राजाओं के वंश में यह महान आख्यान "रामायण" के नाम से प्रसिद्ध हुआ है।”

अर्थ: यह श्लोक रामायण को इक्ष्वाकु वंश से जोड़ता है और बताता है कि यह महाकाव्य उसी वंश के चरित्र पर आधारित है।

टिप्पणी: यहाँ रामायण को इक्ष्वाकु वंश की गौरवगाथा बताया गया है।

तदिदं वर्तयिष्यावः सर्वं निखिलमादितः। धर्मकामार्थसहितं श्रोतव्यमनसूयता॥

“इसलिए हम इस सम्पूर्ण रामायण को आदि से अंत तक, धर्म, अर्थ और काम सहित, ईर्ष्या रहित होकर सुनना चाहिए।”

अर्थ: यह श्लोक रामायण सुनने के महत्व और उसके फल का उपदेश देता है।

टिप्पणी: यह श्लोक श्रोता को निर्देश देता है कि रामायण को ध्यानपूर्वक और बिना द्वेष के सुनना चाहिए।

कोशलो नाम मुदितः स्फीतो जनपदो महान्। निविष्टः सरयूतीरे प्रभूतधनधान्यवान्॥

“कोशल नाम का एक प्रसन्न, समृद्ध और महान जनपद था, जो सरयू नदी के तट पर बसा हुआ था और अत्यधिक धन-धान्य से परिपूर्ण था।”

अर्थ: यह श्लोक अयोध्या की नगरी के स्थान – कोशल जनपद – का परिचय देता है।

टिप्पणी: यहाँ कोशल जनपद की समृद्धि का वर्णन है, जिसकी राजधानी अयोध्या थी।

अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता। मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम्॥

“वहाँ (कोशल देश में) अयोध्या नाम की एक नगरी थी, जो लोक में विश्रुत (प्रसिद्ध) थी। जिसे मनु (वैवस्वत मनु) ने स्वयं बसाया था।”

अर्थ: यह श्लोक अयोध्या नगरी का परिचय देता है, जिसे स्वयं मनु ने बसाया था।

टिप्पणी: अयोध्या को मनु द्वारा निर्मित बताया गया है, जिससे उसकी प्राचीनता और पवित्रता सिद्ध होती है।

आयता दश च द्वे च योजनानि महापुरी। श्रीमती त्रीणि विस्तीर्णा सुविभक्तमहापथा॥

“वह महापुरी (अयोध्या) बारह योजन लम्बी और तीन योजन चौड़ी थी, तथा सुन्दर एवं सुव्यवस्थित राजमार्गों वाली थी।”

अर्थ: यह श्लोक अयोध्या के विशाल आकार और सुनियोजित सड़कों का वर्णन करता है।

टिप्पणी: एक योजन लगभग 8-9 मील (13-14 किमी) के बराबर होता है, अतः अयोध्या लगभग 100 किमी लम्बी और 25 किमी चौड़ी थी – यह विराट नगरी थी।

राजमार्गेण महता सुविभक्तेन शोभिता। मुक्तपुष्पावकीर्णेन जलसिक्तेन नित्यशः॥

“वह नगरी बड़े और सुव्यवस्थित राजमार्ग से सुशोभित थी, जो सदा बिखरे हुए फूलों से पटा और जल से सींचा जाता था।”

अर्थ: अयोध्या के राजमार्ग की स्वच्छता एवं सौंदर्य का वर्णन।

टिप्पणी: प्राचीन काल में राजमार्गों पर फूल बिछाने और जल छिड़कने की परंपरा स्वागत एवं शुद्धि के लिए थी।

तां तु राजा दशरथो महाराष्ट्रविवर्धनः। पुरीमावासयामास दिवि देवपतिर्यथा॥

“उस पुरी (अयोध्या) में राजा दशरथ ने निवास किया, जो महाराष्ट्र के विवर्धन (बढ़ाने वाले) थे, जैसे स्वर्ग में देवराज इंद्र निवास करते हैं।”

अर्थ: इस श्लोक में राजा दशरथ का अयोध्या में निवास और उनके ऐश्वर्य का वर्णन है।

टिप्पणी: दशरथ को इंद्र के समान बताकर उनके तेज और प्रताप का संकेत मिलता है।

श्लोक 10

पूरा पढ़ें

कपाटतोरणवतीं सुविभक्तान्तरापणाम्। सर्वयन्त्रायुधवतीमुषितां सर्वशिल्पिभिः॥

“(वह पुरी) विशाल द्वारों और तोरणों से युक्त, सुव्यवस्थित बाजारों वाली, सभी प्रकार के यंत्रों और अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित, तथा सभी शिल्पियों से बसी हुई थी।”

अर्थ: अयोध्या के दुर्ग, बाज़ार, अस्त्र-शस्त्र और शिल्पियों का वर्णन।

टिप्पणी: अयोध्या सैन्य दृष्टि से सुरक्षित और आर्थिक दृष्टि से समृद्ध थी।

श्लोक 11

पूरा पढ़ें

सूतमागधसम्बाधां श्रीमतीमतुलप्रभाम्। उच्चाट्टालध्वजवतीं शतघ्नीशतसंकुलाम्॥

“स्तुति-पाठ करने वाले सूत और वंशावली का बखान करने वाले मागध वहाँ भरे हुए थे। वह पुरी सुन्दर शोभा से सम्पन्न थी। उसकी सुषमा की कहीं तुलना नहीं थी। वहाँ ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ थीं, जिनके ऊपर ध्वज फहराते थे। सैकड़ों शतघ्नियों से वह पुरी व्याप्त थी।”

अर्थ: यह श्लोक अयोध्या की सांस्कृतिक समृद्धि, वैभव और सुरक्षा व्यवस्था का वर्णन करता है। सूत और मागध राजाओं की प्रशस्ति गाते थे, जिससे नगर सदा उत्साहित रहता था। ऊँचे ध्वज और यंत्र (शतघ्नी) नगर की अभेद्यता के प्रतीक हैं।

टिप्पणी: शतघ्नी एक प्राचीन अस्त्र था – माना जाता है कि यह एक प्रकार का गोला या पत्थर फेंकने का यंत्र था, जो सौ शत्रुओं को एक साथ मार सकता था। इसकी उपस्थिति अयोध्या की उन्नत युद्धनीति को दर्शाती है।

श्लोक 12

पूरा पढ़ें

वधूनाटकसंधैश्च संयुक्तां सर्वतः पुरीम्। उद्यानाम्रवणोपेतां महतीं सालमेखलाम्॥

“उस पुरी में ऐसी बहुत-सी नाटक-मण्डलियाँ थीं, जिनमें केवल स्त्रियाँ ही नृत्य एवं अभिनय करती थीं। उस नगरी में चारों ओर उद्यान तथा आमों के बगीचे थे। लम्बाई और चौड़ाई की दृष्टि से वह पुरी बहुत विशाल थी तथा साखू के वन उसे सब ओर से घेरे हुए थे।”

अर्थ: यह श्लोक अयोध्या की कलाप्रियता, प्राकृतिक सौन्दर्य और विस्तार का वर्णन करता है। स्त्री-प्रधान नाटक मण्डलियाँ उच्च कला संस्कृति का संकेत हैं। उद्यान, आम्रवन और साल वृक्षों का घेरा नगर को रमणीय एवं सुरक्षित बनाते हैं।

टिप्पणी: प्राचीन भारत में “वधूनाटक” वह नाटक होता था जिसमें सभी भूमिकाएँ स्त्रियाँ ही निभाती थीं। यह मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक सशक्तिकरण का भी प्रतीक था। साल के वन हिमालय की तराई में पाए जाते हैं, जो अयोध्या की भौगोलिक स्थिति का संकेत देते हैं।

श्लोक 13

पूरा पढ़ें

दुर्गगम्भीरपरिखां दुर्गामन्यैर्दुरासदाम्। वाजिवारणसम्पूर्णां गोभिरुष्टैः खरैस्तथा॥

“उसके चारों ओर गहरी खाई खुदी थी, जिसमें प्रवेश करना या जिसे लाँघना अत्यन्त कठिन था। वह नगरी दूसरों के लिये सर्वथा दुर्गम एवं दुर्जय थी। घोड़े, हाथी, गाय-बैल, ऊँट तथा गदहे आदि उपयोगी पशुओं से वह पुरी भरी-पूरी थी।”

अर्थ: यह श्लोक अयोध्या की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था और पशु-धन की समृद्धि का वर्णन करता है। गहरी खाई शत्रुओं के लिए बाधा थी। विविध पशु परिवहन, कृषि और सैन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे।

टिप्पणी: प्राचीन नगरों की सुरक्षा में खाई का बहुत महत्व था। यह न केवल शत्रु की गति रोकती थी, बल्कि जल की आपूर्ति का भी स्रोत होती थी। गाय, घोड़े, हाथी आदि पशु अर्थव्यवस्था और सेना के अभिन्न अंग थे।

श्लोक 14

पूरा पढ़ें

सामन्तराजसंधैश्च बलिकर्मभिरावृताम्। नानादेशनिवासैश्च वणिग्भिरुपशोभिताम्॥

“आय तथा अन्य कर देने वाले सामन्त नरेशों के समुदाय उसे सदा घेरे रहते थे। विभिन्न देशों के निवासी वैश्य उस पुरी की शोभा बढ़ाते थे।”

अर्थ: यह श्लोक अयोध्या की राजनीतिक सत्ता और व्यापारिक समृद्धि का वर्णन करता है। सामन्त राजा कर देते थे, जिससे नगर की अर्थव्यवस्था मजबूत थी। दूर-दराज के व्यापारी यहाँ आकर बसते थे, जिससे सांस्कृतिक और आर्थिक आदान-प्रदान बढ़ता था।

टिप्पणी: बलि शब्द का अर्थ है राजकर या उपहार। सामन्त राजा अपने अधीनस्थ क्षेत्रों से कर एकत्र कर अयोध्या के राजा को अर्पित करते थे। विभिन्न देशों के व्यापारियों का निवास बताता है कि अयोध्या एक वैश्विक व्यापार केंद्र था।

श्लोक 15

पूरा पढ़ें

प्रासादै रत्नविकृतैः पर्वतैरिव शोभिताम्। कूटागारैश्च सम्पूर्णामिन्द्रस्येवामरावतीम्॥

“वहाँ के महलों का निर्माण नाना प्रकार के रत्नों से हुआ था। वे गगनचुम्बी प्रासाद पर्वतों के समान जान पड़ते थे। उनसे उस पुरी की बड़ी शोभा हो रही थी। बहुसंख्यक कूटागारों (गुप्त गृहों) से परिपूर्ण वह नगरी इन्द्र की अमरावती के समान जान पड़ती थी।”

अर्थ: यह श्लोक अयोध्या की वास्तुकला और वैभव का अद्भुत वर्णन करता है। रत्नजड़ित गगनचुम्बी प्रासाद पर्वतों की भाँति सुशोभित थे। अनेक कूटागारों से युक्त यह नगरी देवराज इन्द्र की अमरावती से तुलना की गई है।

टिप्पणी: कूटागार बहुमंजिला भवन या गुप्त कक्ष होते थे। इनका उपयोग खजाना, शस्त्रागार या विश्राम गृह के रूप में होता था। अमरावती इन्द्र की राजधानी है, जो अपनी सुन्दरता और समृद्धि के लिए प्रसिद्ध है। इस तुलना से अयोध्या की दिव्यता सिद्ध होती है।

श्लोक 16

पूरा पढ़ें

चित्रां चित्रगतां रम्यां स्त्रीरत्नैरुपशोभिताम्। हर्म्यप्रासादसम्बाधां रत्नवेदीविभूषिताम्॥

“उसकी शोभा विचित्र थी। उसके महलों पर सोने का पानी चढ़ाया गया था। श्रेष्ठ एवं सुन्दर नारियों के समूह उस पुरी की शोभा बढ़ाते थे। वह सब प्रकार के रत्नों से भरी-पूरी तथा सातमंजिले प्रासादों से सुशोभित थी।”

अर्थ: यह श्लोक अयोध्या के सौन्दर्य, नारी समाज की विशिष्टता और वास्तुकला के उत्कर्ष का वर्णन करता है। स्वर्ण-निर्मित महल और रत्नमय वेदियाँ नगर की दिव्यता बढ़ाती थीं। स्त्रीरत्न का अर्थ है रत्नतुल्य स्त्रियाँ, जो संस्कृति और कला की धारक थीं।

टिप्पणी: हर्म्य का अर्थ है सात मंजिला महल या राजप्रासाद। यह अत्यंत भव्य होता था। वेदी यज्ञ वेदिका भी होती है और रत्नजड़ित आसन भी। यहाँ रत्नवेदी से तात्पर्य रत्नजड़ित चबूतरों या आसनों से है। स्त्रीरत्नैः से पता चलता है कि अयोध्या में शिक्षित, कलाविद् और सुंदर स्त्रियाँ समाज की शोभा थीं।

श्लोक 17

पूरा पढ़ें

अनेकशतसंवाधां मनःकान्तां सुशोभिताम्। सम्पन्नफलमूलाढ्यां सुजलां सुप्रतिष्ठिताम्॥

“पुरवासियों के घरों से उसकी आबादी इतनी घनी हो गयी थी कि कहीं थोड़ा-सा भी अवकाश नहीं दिखायी देता था। उसे समतल भूमि पर बसाया गया था। वह नगरी जड़हन धान के चावलों से भरपूर थी। वहाँ का जल इतना मीठा या स्वादिष्ट था, मानो ईख का रस हो।”

अर्थ: यह श्लोक अयोध्या की जनसंख्या घनत्व, कृषि समृद्धि, जल की गुणवत्ता और नगर नियोजन का वर्णन करता है। नगर इतना घना बसा था कि खाली स्थान नहीं था। उपजाऊ भूमि और मीठा जल निवासियों के सुखी जीवन के सूचक हैं।

टिप्पणी: सम्पन्नफलमूलाढ्याम् का अर्थ है फलों और कंद-मूल से समृद्ध, लेकिन यहाँ विशेष रूप से “फल” का अर्थ धान (चावल) भी होता है। सुप्रतिष्ठिताम् का अर्थ है नगर का अच्छी तरह से स्थापित होना, अर्थात् सुनियोजित और दृढ़ नींव पर बसा होना।

श्लोक 18

पूरा पढ़ें

दुन्दुभीमृदङ्गानां वीणापणवसंनिनैः। नादेन सुस्वरेणैव नित्यं सम्प्रतिनादिताम्॥

“भूमण्डल की वह सर्वोत्तम नगरी दुन्दुभि, मृदंग, वीणा, पणव आदि वाद्यों की मधुर ध्वनि से अत्यन्त गूंजती रहती थी।”

अर्थ: यह श्लोक अयोध्या की संगीतमयता और उत्सवप्रियता का वर्णन करता है। विभिन्न वाद्यों की मधुर ध्वनियाँ नगर को सदा गूंजायमान रखती थीं, जिससे वहाँ सदा उत्सव का वातावरण बना रहता था।

टिप्पणी: ये सभी वाद्य प्राचीन भारत में प्रचलित थे। दुन्दुभि एक बड़ा नगाड़ा होता था, मृदंग मिट्टी का बना दो मुख वाला वाद्य, वीणा तार वाद्य, पणव एक छोटा ढोल या डमरू जैसा वाद्य। इनके मधुर नाद से नगर सदा आनंदित रहता था।

श्लोक 19

पूरा पढ़ें

सिद्धचारणसंघैश्च चरद्भिरुपशोभिताम्। दिवि देवगणैरिव विमानैरिव संकुलाम्॥

“देवलोक में तपस्या से प्राप्त हुए सिद्धों के विमान की भाँति उस पुरी का भूमण्डल में सर्वोत्तम स्थान था। वहाँ के सुन्दर महल बहुत अच्छे ढंग से बनाये और बसाये गये थे। उनके भीतरी भाग बहुत ही सुन्दर थे। बहुत से श्रेष्ठ पुरुष उस पुरी में निवास करते थे।”

अर्थ: यह श्लोक अयोध्या की दिव्यता और वैभव को और अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है। सिद्ध और चारण जैसे दिव्य जीव यहाँ विचरण करते हैं, मानो यह स्वर्ग का ही एक भाग हो। महल देवताओं के विमानों के समान प्रतीत होते हैं।

टिप्पणी: सिद्ध वे होते हैं जिन्होंने योग साधना से सिद्धियाँ प्राप्त कर ली हों; चारण आकाशचारी देवताओं की एक श्रेणी हैं। उनका यहाँ विचरण बताता है कि अयोध्या पुण्यभूमि थी। विमान देवताओं के आकाश-यान होते हैं – यहाँ महलों की तुलना विमानों से की गई है।

श्लोक 20

पूरा पढ़ें

मत्तद्विरदसम्बाधां सङ्कीर्णां हरिभिस्तथा। सदा सम्पूर्णमर्यादां मर्यादाभिरिवावृताम्॥

“वह नगरी मदमस्त हाथियों से युक्त तथा बंदरों से भी भरी हुई थी। वह सदा सम्पूर्ण मर्यादाओं से युक्त थी, मानो मर्यादाओं ने ही उसे घेर रखा हो।”

अर्थ: यह श्लोक अयोध्या की प्राकृतिक समृद्धि (हाथी, बन्दर) और नैतिक मर्यादाओं का वर्णन करता है। हाथी और बन्दर वन्य जीवों की बहुलता दर्शाते हैं, जो समृद्ध पर्यावरण का सूचक है। मर्यादाओं से घिरी होना बताता है कि नगर में धर्म और आचार-विचार का सर्वोच्च स्थान था।

टिप्पणी: मर्यादा का अर्थ है सीमा, नियम, आचार संहिता। यहाँ अयोध्या को उन मर्यादाओं से घिरा बताया गया है, जो धर्म की रक्षा करती हैं। हरि शब्द का अर्थ बन्दर या सिंह भी हो सकता है, पर यहाँ प्रसंगवश बन्दर अर्थ उचित है।