अयोध्या का वर्णन – श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
दुन्दुभीमृदङ्गानां वीणापणवसंनिनैः। नादेन सुस्वरेणैव नित्यं सम्प्रतिनादिताम्॥
हिंदी अनुवाद
भूमण्डल की वह सर्वोत्तम नगरी दुन्दुभि, मृदंग, वीणा, पणव आदि वाद्यों की मधुर ध्वनि से अत्यन्त गूंजती रहती थी।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक अयोध्या की संगीतमयता और उत्सवप्रियता का वर्णन करता है। विभिन्न वाद्यों की मधुर ध्वनियाँ नगर को सदा गूंजायमान रखती थीं, जिससे वहाँ सदा उत्सव का वातावरण बना रहता था।
टिप्पणी
ये सभी वाद्य प्राचीन भारत में प्रचलित थे। दुन्दुभि एक बड़ा नगाड़ा होता था, मृदंग मिट्टी का बना दो मुख वाला वाद्य, वीणा तार वाद्य, पणव एक छोटा ढोल या डमरू जैसा वाद्य। इनके मधुर नाद से नगर सदा आनंदित रहता था।
॥ श्रीरामायण बालकाण्ड सर्ग ५ श्लोक १८ ॥
नादेन सुस्वरेणैव नित्यं सम्प्रतिनादिताम् ॥
nādena susvareṇaiva nityaṃ sampratināditām ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : भूमण्डल की वह सर्वोत्तम नगरी दुन्दुभि, मृदंग, वीणा, पणव आदि वाद्यों की मधुर ध्वनि से अत्यन्त गूंजती रहती थी।
🔹 English Translation : That foremost city on earth constantly resounded with the sweet sounds of dundubhi (drums), mṛdaṅga (a type of drum), vīṇā (lute), paṇava (a small drum), and other musical instruments.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| दुन्दुभीमृदङ्गानाम् | पुल्लिंग, षष्ठी बहुवचन | दुन्दुभि और मृदंगों के |
| वीणापणवसंनिनैः | पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन | वीणा और पणव की ध्वनियों से |
| नादेन | पुल्लिंग, तृतीया एकवचन | नाद से, ध्वनि से |
| सुस्वरेण | विशेषण, पुल्लिंग, तृतीया एकवचन | सुस्वर, मधुर ध्वनि वाले |
| एव | अव्यय | ही |
| नित्यम् | अव्यय | नित्य, हमेशा |
| सम्प्रतिनादिताम् | विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | गूंजती हुई |
📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
यह श्लोक अयोध्या की समृद्ध संगीत परंपरा का उद्घोष करता है। विभिन्न वाद्यों की मधुर ध्वनियाँ नगर में सदा गूंजती रहती थीं, जिससे वहाँ का वातावरण उल्लासमय रहता था। यह बताता है कि अयोध्या के निवासी कला-प्रेमी और आनंद-प्रिय थे। संगीत और नृत्य का यह वर्णन सामाजिक और सांस्कृतिक उत्कर्ष का सूचक है। प्राचीन भारत में नगरों की समृद्धि का एक मापदंड यह भी था कि वहाँ कला-केंद्र और उत्सव कितने प्रचलित हैं।
वाल्मीकि ने यहाँ अयोध्या को एक जीवंत, कलापूर्ण और आनंदमय नगरी के रूप में चित्रित किया है।
🕉️ आध्यात्मिक संदेश
यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमारा जीवन भी संगीतमय और आनंदमय होना चाहिए। विभिन्न वाद्यों की भाँति हमारे जीवन में भी विविधता होनी चाहिए – कभी उत्साह (दुन्दुभि), कभी लय (मृदंग), कभी मधुरता (वीणा)। नित्य सम्प्रतिनादिताम् का अर्थ है कि हमारे जीवन में सदा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता रहे।
॥ वीणा वादयति, मृदङ्गः नृत्यति ॥
जय श्री राम 🙏