अयोध्या का वर्णन – श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अनेकशतसंवाधां मनःकान्तां सुशोभिताम्। सम्पन्नफलमूलाढ्यां सुजलां सुप्रतिष्ठिताम्॥
हिंदी अनुवाद
पुरवासियों के घरों से उसकी आबादी इतनी घनी हो गयी थी कि कहीं थोड़ा-सा भी अवकाश नहीं दिखायी देता था। उसे समतल भूमि पर बसाया गया था। वह नगरी जड़हन धान के चावलों से भरपूर थी। वहाँ का जल इतना मीठा या स्वादिष्ट था, मानो ईख का रस हो।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक अयोध्या की जनसंख्या घनत्व, कृषि समृद्धि, जल की गुणवत्ता और नगर नियोजन का वर्णन करता है। नगर इतना घना बसा था कि खाली स्थान नहीं था। उपजाऊ भूमि और मीठा जल निवासियों के सुखी जीवन के सूचक हैं।
टिप्पणी
सम्पन्नफलमूलाढ्याम् का अर्थ है फलों और कंद-मूल से समृद्ध, लेकिन यहाँ विशेष रूप से “फल” का अर्थ धान (चावल) भी होता है। सुप्रतिष्ठिताम् का अर्थ है नगर का अच्छी तरह से स्थापित होना, अर्थात् सुनियोजित और दृढ़ नींव पर बसा होना।
॥ श्रीरामायण बालकाण्ड सर्ग ५ श्लोक १७ ॥
सम्पन्नफलमूलाढ्यां सुजलां सुप्रतिष्ठिताम् ॥
sampannaphalamūlāḍhyāṃ sujalāṃ supratiṣṭhitām ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : पुरवासियों के घरों से उसकी आबादी इतनी घनी हो गयी थी कि कहीं थोड़ा-सा भी अवकाश नहीं दिखायी देता था। उसे समतल भूमि पर बसाया गया था। वह नगरी जड़हन धान के चावलों से भरपूर थी। वहाँ का जल इतना मीठा या स्वादिष्ट था, मानो ईख का रस हो।
🔹 English Translation : The city was so densely populated with houses of citizens that there was not even a small vacant space anywhere. It was built on level ground. The city was abundant with rich rice (śāli) and had sweet water that tasted like sugarcane juice.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| अनेकशतसंवाधाम् | विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | अनेक सैकड़ों घरों से व्याप्त / सघन बसी |
| मनःकान्ताम् | विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | मन को प्रिय, रमणीय |
| सुशोभिताम् | विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | सुंदर, सुशोभित |
| सम्पन्नफलमूलाढ्याम् | विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | उत्तम फलों और कंद-मूलों से सम्पन्न |
| सुजलाम् | विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | सुन्दर जल वाली / मीठे जल वाली |
| सुप्रतिष्ठिताम् | विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | अच्छी तरह स्थापित, समतल भूमि पर बसी |
📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
यह श्लोक अयोध्या के सुनियोजित नगर-जीवन और कृषि समृद्धि का वर्णन करता है। सघन आबादी से पता चलता है कि यह एक आकर्षक नगर था, जहाँ लोग बसना चाहते थे। समतल भूमि पर बसा होना नगर नियोजन की दृष्टि से आदर्श था – इससे जल निकासी, यातायात और निर्माण में सुविधा होती थी। “सम्पन्नफलमूल” से तात्पर्य कृषि उत्पादों की प्रचुरता से है, जो आर्थिक समृद्धि का आधार थे। मीठे जल का उल्लेख बताता है कि यहाँ जल स्रोत शुद्ध और स्वादिष्ट थे, जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं।
वाल्मीकि ने अयोध्या को एक सुखद और समृद्ध नगरी के रूप में चित्रित किया है, जहाँ मूलभूत आवश्यकताएँ सहजता से उपलब्ध थीं।
🕉️ आध्यात्मिक संदेश
यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमारा जीवन भी सघन (गुणों से भरा), सुशोभित और सुप्रतिष्ठित होना चाहिए। सम्पन्नफलमूल का अर्थ है हमारे अच्छे कर्मों के फल और मूल (नीति) से समृद्ध होना। सुजलाम् का अर्थ है हमारे हृदय का जल (प्रेम और करुणा) मीठा हो, जो दूसरों को आकर्षित करे। सुप्रतिष्ठिताम् का अर्थ है हमारा आचरण दृढ़ और स्थिर हो।
॥ सघनाः सद्गुणाः, सुजलं हृदयम् ॥
जय श्री राम 🙏