अयोध्या का वर्णन – श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
सिद्धचारणसंघैश्च चरद्भिरुपशोभिताम्। दिवि देवगणैरिव विमानैरिव संकुलाम्॥
हिंदी अनुवाद
देवलोक में तपस्या से प्राप्त हुए सिद्धों के विमान की भाँति उस पुरी का भूमण्डल में सर्वोत्तम स्थान था। वहाँ के सुन्दर महल बहुत अच्छे ढंग से बनाये और बसाये गये थे। उनके भीतरी भाग बहुत ही सुन्दर थे। बहुत से श्रेष्ठ पुरुष उस पुरी में निवास करते थे।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक अयोध्या की दिव्यता और वैभव को और अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है। सिद्ध और चारण जैसे दिव्य जीव यहाँ विचरण करते हैं, मानो यह स्वर्ग का ही एक भाग हो। महल देवताओं के विमानों के समान प्रतीत होते हैं।
टिप्पणी
सिद्ध वे होते हैं जिन्होंने योग साधना से सिद्धियाँ प्राप्त कर ली हों; चारण आकाशचारी देवताओं की एक श्रेणी हैं। उनका यहाँ विचरण बताता है कि अयोध्या पुण्यभूमि थी। विमान देवताओं के आकाश-यान होते हैं – यहाँ महलों की तुलना विमानों से की गई है।
॥ श्रीरामायण बालकाण्ड सर्ग ५ श्लोक १९ ॥
दिवि देवगणैरिव विमानैरिव संकुलाम् ॥
divi devagaṇairiva vimānairiva saṃkulām ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : देवलोक में तपस्या से प्राप्त हुए सिद्धों के विमान की भाँति उस पुरी का भूमण्डल में सर्वोत्तम स्थान था। वहाँ के सुन्दर महल बहुत अच्छे ढंग से बनाये और बसाये गये थे। उनके भीतरी भाग बहुत ही सुन्दर थे। बहुत से श्रेष्ठ पुरुष उस पुरी में निवास करते थे।
🔹 English Translation : The city was adorned by wandering groups of Siddhas and Cāraṇas (celestial beings). It was crowded with beautiful palaces, as if it were filled with the vimānas (celestial chariots) of the gods in heaven.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| सिद्धचारणसंघैः | पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन | सिद्धों और चारणों के समूहों से |
| च | अव्यय | और |
| चरद्भिः | विशेषण, पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन | विचरण करने वालों से |
| उपशोभिताम् | विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | सुशोभित |
| दिवि | स्त्रीलिंग, सप्तमी एकवचन | द्युलोक में, स्वर्ग में |
| देवगणैः इव | पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन + अव्यय | देवताओं के समूहों के समान |
| विमानैः इव | नपुंसकलिंग, तृतीया बहुवचन + अव्यय | विमानों के समान |
| संकुलाम् | विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | व्याप्त, भरी हुई |
📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
यह श्लोक अयोध्या की दिव्यता और आध्यात्मिक महत्ता को रेखांकित करता है। सिद्ध और चारण जैसे दिव्य पुरुषों का यहाँ विचरण यह बताता है कि यह नगरी पुण्यशाली और तपोभूमि थी। महलों की तुलना विमानों से करके वाल्मीकि ने उनकी भव्यता और सौन्दर्य को अतिशयोक्ति से प्रस्तुत किया है। यह चित्रण अयोध्या को पृथ्वी पर स्वर्ग के समान बना देता है।
प्राचीन भारतीय साहित्य में अक्सर राजधानियों की तुलना स्वर्ग से की जाती थी, और यहाँ वाल्मीकि ने उस परंपरा का पालन करते हुए अयोध्या को इन्द्रपुरी अमरावती के समान बताया है।
🕉️ आध्यात्मिक संदेश
यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमारा शरीर और मन भी एक प्रकार का “नगर” है। यदि हम उसे सद्गुणों और उच्च विचारों (सिद्ध-चारण) से सजाएँ, तो वह भी दिव्य (विमान) के समान सुन्दर हो सकता है। हमें अपने अंतरंग में ऐसे उच्च आदर्शों को स्थान देना चाहिए कि देवता भी हमारे हृदय में विचरण करें।
॥ सिद्धाश्चारणाः सन्ति हृदये यस्य सः नरः ॥
जय श्री राम 🙏