अयोध्या का वर्णन – श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
प्रासादै रत्नविकृतैः पर्वतैरिव शोभिताम्। कूटागारैश्च सम्पूर्णामिन्द्रस्येवामरावतीम्॥
हिंदी अनुवाद
वहाँ के महलों का निर्माण नाना प्रकार के रत्नों से हुआ था। वे गगनचुम्बी प्रासाद पर्वतों के समान जान पड़ते थे। उनसे उस पुरी की बड़ी शोभा हो रही थी। बहुसंख्यक कूटागारों (गुप्त गृहों) से परिपूर्ण वह नगरी इन्द्र की अमरावती के समान जान पड़ती थी।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक अयोध्या की वास्तुकला और वैभव का अद्भुत वर्णन करता है। रत्नजड़ित गगनचुम्बी प्रासाद पर्वतों की भाँति सुशोभित थे। अनेक कूटागारों से युक्त यह नगरी देवराज इन्द्र की अमरावती से तुलना की गई है।
टिप्पणी
कूटागार बहुमंजिला भवन या गुप्त कक्ष होते थे। इनका उपयोग खजाना, शस्त्रागार या विश्राम गृह के रूप में होता था। अमरावती इन्द्र की राजधानी है, जो अपनी सुन्दरता और समृद्धि के लिए प्रसिद्ध है। इस तुलना से अयोध्या की दिव्यता सिद्ध होती है।
॥ श्रीरामायण बालकाण्ड सर्ग ५ श्लोक १५ ॥
कूटागारैश्च सम्पूर्णामिन्द्रस्येवामरावतीम् ॥
kūṭāgāraiśca sampūrṇāmindrasyevāmarāvatīm ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : वहाँ के महलों का निर्माण नाना प्रकार के रत्नों से हुआ था। वे गगनचुम्बी प्रासाद पर्वतों के समान जान पड़ते थे। उनसे उस पुरी की बड़ी शोभा हो रही थी। बहुसंख्यक कूटागारों (गुप्त गृहों) से परिपूर्ण वह नगरी इन्द्र की अमरावती के समान जान पड़ती थी।
🔹 English Translation : The palaces there were constructed with various gems. Those sky-touching mansions appeared like mountains, and they greatly enhanced the beauty of the city. Filled with numerous multi-storied buildings (kūṭāgāras), that city appeared like Indra's Amaravati.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| प्रासादैः | पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन | महलों से |
| रत्नविकृतैः | विशेषण, पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन | रत्नों से निर्मित / रत्नजड़ित |
| पर्वतैः इव | पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन + अव्यय | पर्वतों के समान |
| शोभिताम् | विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | सुशोभित |
| कूटागारैः | पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन | कूटागारों (गुप्त गृहों) से |
| च | अव्यय | और |
| सम्पूर्णाम् | विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | परिपूर्ण |
| इन्द्रस्य इव | पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन + अव्यय | इन्द्र के समान |
| अमरावतीम् | स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | अमरावती (इन्द्रपुरी) के समान |
📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
यह श्लोक अयोध्या की स्थापत्य कला और वैभव का वर्णन करता है। रत्नजड़ित प्रासाद न केवल समृद्धि का प्रतीक थे, बल्कि उच्च वास्तुकला का भी निदर्शन थे। गगनचुम्बी भवन (बहुमंजिला) प्राचीन भारत की उन्नत निर्माण तकनीक को दर्शाते हैं। कूटागारों का उल्लेख बताता है कि यहाँ सुरक्षित भण्डार और गुप्त कक्ष थे। अयोध्या की तुलना अमरावती से करके वाल्मीकि ने इसे पृथ्वी का स्वर्ग बताया है।
यह श्लोक रामायण के आदर्श राज्य के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है – जहाँ भौतिक सुख, सौन्दर्य और सुरक्षा सभी विद्यमान हों।
🕉️ आध्यात्मिक संदेश
यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमारा “आंतरिक अयोध्या” (हृदय) भी रत्नों (सद्गुणों) से जड़ित होना चाहिए। ऊँचे प्रासाद हमारे उच्च विचारों और आदर्शों के प्रतीक हैं। कूटागार हमारे गुप्त सद्गुणों (दया, करुणा, क्षमा) का भण्डार हैं। जब हमारा हृदय इनसे परिपूर्ण होता है, तो वह दिव्य (अमरावती) के समान शोभायमान होता है।
॥ प्रासादाः सद्गुणाः, कूटागाराः गुप्तदानम् ॥
जय श्री राम 🙏