पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हे भरतश्रेष्ठ! जिस काल (समय) में मरकर योगी लौटकर नहीं आते और जिस काल में मरकर लौटते हैं, उस काल को मैं बताऊँगा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय 'अक्षरब्रह्मयोग' का यह २३वाँ श्लोक मानव जीवन की सबसे बड़ी पहेली—मृत्यु और उसके बाद की यात्रा—पर एक दिव्य प्रकाश डालता है। यहाँ जगद्गुरु भगवान श्री कृष्ण अपने परम सखा अर्जुन को उन दो विशिष्ट मार्गों के विषय में बताने की प्रतिज्ञा करते हैं, जिन पर चलते हुए योगी या साधक इस संसार से विदा होते हैं। यह श्लोक केवल भौतिक मृत्यु का समय नहीं दर्शाता, अपितु यह उस सूक्ष्म आध्यात्मिक चेतना, ब्रह्मांडीय ऊर्जा और काल चक्र की ओर संकेत करता है जो जीवात्मा की मुक्ति (अनावृत्ति) अथवा पुनर्जन्म (आवृत्ति) को निर्धारित करती है। भारतीय सनातन दर्शन में काल (समय) को केवल घड़ियों या पंचांगों की सीमा में नहीं बांधा गया है, बल्कि इसे साक्षात् परब्रह्म का रूप माना गया है। इस श्लोक की पृष्ठभूमि में उपनिषदों का वह महान ज्ञान समाहित है जो देवयान और पितृयान मार्गों की व्याख्या करता है। इस दिव्य विवेचन के माध्यम से, भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को 'भरतर्षभ' कहकर संबोधित करते हैं और उसे उस परम विज्ञान से अवगत कराते हैं जिसके द्वारा एक योगी मृत्यु के भय से मुक्त होकर शाश्वत आनंद को प्राप्त कर सकता है। यह संपूर्ण व्याख्यान साधक को कर्मों की गहन गति और ध्यान की पराकाष्ठा को समझने में सहायता करता है।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३॥
"Yatra kāle tv anāvṛttim āvṛttiṁ caiva yoginaḥ |
Prayātā yānti taṁ kālaṁ vakṣyāmi bharatarṣabha || 23 ||"
पवित्र पाठ एवं जप की शास्त्रीय विधि:
इस श्लोक का पाठ केवल बौद्धिक विमर्श के लिए नहीं, अपितु अंतःकरण की शुद्धि और मृत्यु-भय के निवारण के लिए किया जाता है। इसकी साधना के लिए निम्नलिखित विधि अत्यंत फलदायी मानी गई है:
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
गूढ़ दार्शनिक विश्लेषण:
इस श्लोक में प्रयुक्त 'काल' शब्द अत्यंत रहस्यमयी है। आदि शंकराचार्य और रामानुजाचार्य जैसे महान आचार्यों के अनुसार, यहाँ 'काल' केवल समय की अवधि नहीं है, बल्कि यह उन मार्गों के अधिष्ठातृ देवताओं (मार्ग-चिह्नों) का वाचक है जो जीवात्मा को शरीर छोड़ने के बाद ले जाते हैं। जब कोई योगी शरीर त्यागता है, तो उसकी सूक्ष्म चेतना ब्रह्मांड के विभिन्न स्तरों से होकर गुजरती है। यदि वह प्रकाशमय मार्ग (शुक्ल मार्ग) से जाता है, तो उसे 'अनावृत्ति' यानी मोक्ष मिलता है। यदि वह अंधकारमय मार्ग (कृष्ण मार्ग) से जाता है, तो उसे 'आवृत्ति' यानी पुनः जन्म लेना पड़ता है। भगवान श्री कृष्ण इसी रहस्यमयी विज्ञान को अगले श्लोकों में विस्तार से समझाने की भूमिका यहाँ बाँध रहे हैं।
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
इस श्लोक की जड़ें उपनिषदों के अत्यंत प्राचीन और प्रामाणिक ज्ञान में निहित हैं। विशेष रूप से छान्दोग्य उपनिषद (पंचम प्रपाठक) और बृहदारण्यक उपनिषद में 'पंचाग्नि विद्या' के अंतर्गत देवयान (अर्चिरादि मार्ग) और पितृयान (धूमादि मार्ग) का विस्तृत वर्णन मिलता है। महाभारत के युद्ध क्षेत्र कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन विषाद और मोह से घिरे थे, तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें केवल युद्ध करने की प्रेरणा ही नहीं दी, बल्कि जीवन, मृत्यु और मोक्ष के संपूर्ण विज्ञान से अवगत कराया।
पौराणिक संदर्भों में इस श्लोक की प्रासंगिकता को समझने के लिए हमें भीष्म पितामह के प्रसंग को देखना होगा। महाभारत के युद्ध में तीरों की शय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह ने अपने प्राणों का त्याग करने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी। वे स्वेच्छा मृत्यु के वरदान से युक्त थे। उन्होंने दक्षिणायन में शरीर त्यागना उचित नहीं समझा, क्योंकि उत्तरायण का काल शुक्ल मार्ग (प्रकाश के मार्ग) का प्रतीक है, जो सीधे ब्रह्मलोक की ओर ले जाता है जहाँ से जीव को पुनः लौटकर नहीं आना पड़ता।
ऋषियों का मत और वैदिक दृष्टिकोण:
वैदिक ऋषियों का मानना था कि संपूर्ण ब्रह्मांड और मानव शरीर (पिंड और ब्रह्मांड) एक ही नियम से संचालित होते हैं। जो शक्तियां बाहर सूर्य, चंद्रमा, दिन और रात के रूप में कार्य करती हैं, वही हमारे शरीर के भीतर इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों के रूप में प्रवाहित होती हैं। जब एक योगी सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से प्राणों को ब्रह्मरंध्र से बाहर निकालता है, तो वह देवयान मार्ग पर अग्रसर होता है। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को इसी आंतरिक और बाह्य काल के सामंजस्य का उपदेश दे रहे हैं ताकि वह कर्म करते हुए भी परम गति को प्राप्त कर सके।
यह श्लोक इस बात का भी प्रमाण है कि सनातन धर्म में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक संक्रमण काल (Transition) माना गया है। यह जीवात्मा के वस्त्र बदलने जैसी प्रक्रिया है, और इस संक्रमण के समय जीव की मानसिक स्थिति, उसके संचित संस्कार और उसका ध्यान ही उसके अगले गंतव्य का निर्धारण करते हैं।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
इस श्लोक के अर्थ का चिंतन, मनन और नियमित पाठ करने से साधक को अनेक व्यावहारिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:
१. मृत्यु के भय से मुक्ति
जब साधक यह समझ जाता है कि मृत्यु केवल एक मार्ग का परिवर्तन है, तो उसका अकारण भय समाप्त हो जाता है और वह जीवन को अधिक जीवंतता से जीता है।
२. चेतना का ऊर्ध्वगमन
इस श्लोक के निरंतर चिंतन से साधक की ऊर्जा मूलाधार से उठकर आज्ञा और सहस्रार चक्र की ओर बढ़ने लगती है, जिससे ध्यान गहरा होता है।
३. मानसिक शांति और तनाव मुक्ति
संसार की नश्वरता और काल चक्र की गति को समझने से दैनिक जीवन की छोटी-मोटी चिंताएं और मानसिक तनाव स्वतः ही शांत हो जाते हैं।
४. सकारात्मक आभा मंडल (Aura) का निर्माण
पवित्र संस्कृत श्लोकों के स्पंदन से साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र का निर्माण होता है जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है।
५. कर्मों के प्रति सजगता
यह ज्ञान साधक को सचेत करता है कि उसके आज के कर्म ही उसकी भविष्य की गति तय करेंगे, जिससे वह निष्काम और शुभ कर्मों की ओर प्रवृत्त होता है।
६. दिव्य कृपा की प्राप्ति
भगवान श्री कृष्ण के वचनों का आदरपूर्वक पाठ करने से साधक को गुरु-कृपा और ईश्वरीय संरक्षण का प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ
यह आलेख Bhaktilok.in के विद्वान मंडल द्वारा तैयार की गई संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इस विवेचन का मुख्य उद्देश्य श्रीमद्भगवद्गीता के गूढ़तम रहस्यों को जनमानस के लिए सुलभ और व्यावहारिक बनाना है। इस व्याख्या के निर्माण में प्रस्थानत्रयी (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता) के प्रामाणिक भाष्यों, विशेष रूप से आदि शंकराचार्य के 'गीता भाष्य', रामानुजाचार्य के 'गीता भाष्य' और आधुनिक युग के महान संतों के प्रवचनों का गहन अध्ययन किया गया है। हम किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते, बल्कि सनातन ज्ञान के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। पाठक इस ज्ञान को अपने विवेक और साधना के स्तर के अनुसार ग्रहण करें।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।"
भगवान श्री कृष्ण की शरण में रहकर अपने जीवन को सार्थक बनाएं। जय श्री कृष्ण!
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कृष्ण कहते हैं: हे भरतश्रेष्ठ! जिस काल (समय) में मरकर योगी लौटकर नहीं आते और जिस काल में मरकर लौटते हैं, उस काल को मैं बताऊँगा। Krishna says: O best of the Bharatas, I will now declare that time departing at which yogis attain non-return, and also the time departing at which they return.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यहाँ भगवान मृत्यु के समय के महत्व पर प्रकाश डालते हैं। योगी लोग मृत्यु के समय की परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न गतियों को प्राप्त होते हैं। Here the Lord highlights the importance of the time of death. Yogis attain different destinations depending on the circumstances at death.