श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 27

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 42 मिनट का पठन 118 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
ब्रह्मणः
ब्रह्म का
हि
निश्चय ही
प्रतिष्ठा
आधार
अहम्
मैं हूँ
अमृतस्य
अमृत का
अव्ययस्य
अविनाशी का
च
और
शाश्वतस्य
शाश्वत का
च
और
धर्मस्य
धर्म का
सुखस्य
सुख का
एकान्तिकस्य
एकान्त (परम) का
च
और।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

क्योंकि मैं ही ब्रह्म (वेदों का प्रतिपाद्य) का, अमृत का, अविनाशी का, शाश्वत धर्म का और एकान्त सुख का आधार (प्रतिष्ठा) हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

गीता के चौदھवें अध्याय (गुणात्रयविभाग योग) का यह परम रहस्यमय श्लोक साक्षात पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण की अनन्त विभूतियों, परब्रह्म स्वरूप और अनन्य भक्तियोग के मार्ग को आलोकित करता है।

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्माण्डिक चेतना

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान केवल एक ग्रंथ का नहीं, बल्कि मानवमात्र के जीवन को दिव्यता की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक का है। जब हम गीता के चौदहवें अध्याय के इस अतीव महत्वपूर्ण सत्ताईसवें श्लोक का अध्ययन करते हैं, तो हमारे समक्ष अद्वैत वेदांत, सांख्य दर्शन और परम भक्ति रस का एक अद्भुत त्रिवेणी संगम प्रकट होता है। भगवान श्रीकृष्णा इस श्लोक के माध्यम से अपने उस सर्वोच्च निर्गुण-सगुण स्वरूप का अनावरण करते हैं, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड का आधारस्तंभ है। यह श्लोक यह स्पष्ट रूप से उद्घाटित करता है कि इस भौतिक जगत से परे, काल के चक्र से मुक्त और समस्त दुखों से परे जो शाश्वत सत्य है, उसका केंद्रबिंदु और आश्रय स्वयं वासुदेव श्रीकृष्ण ही हैं।

सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक सनातन धर्म के चार आधारभूत स्तंभों—ब्रह्म (परमात्मा), अमृतत्व (मोक्ष/नश्वरता का अंत), सनातन धर्म (शाश्वत नियम), और ऐकान्तिक सुख (निरपेक्ष एवं अखंड आनंद)—की व्याख्या करता है। मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य दुखों से निवृत्ति और परम सुख की प्राप्ति है। भगवान इस श्लोक में बहुत ही स्पष्ट और अकाट्य शब्दों में घोषणा करते हैं कि इन सभी उच्चतर आध्यात्मिक वास्तविकताओं की प्रतिष्ठा या आश्रय स्वयं वे ही हैं। इसका तात्पर्य यह है कि जो साधु-संत, महात्मा और भक्तगण अनन्य भाव से भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं, वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसी परब्रह्म की प्रतिष्ठा को प्राप्त कर लेते हैं। यह चेतना साधक को यह अहसास कराती है कि बाहरी संसार की नश्वरता के बीच भीतर एक ऐसा अक्षय स्रोत विद्यमान है, जो कभी क्षीण नहीं होता और वही परम शांति का धाम है।

ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से, यदि हम विचार करें तो आकाशगंगाओं के घूमने से लेकर एक छोटे से तिनके के हिलने तक, हर गति के पीछे एक नियति और एक नियम काम कर रहा है। उस नियम को 'धर्म' कहा गया है, उस व्यापक सत्ता को 'ब्रह्म' कहा गया है, उस अमरत्व को 'अमृत' कहा गया है और उस परम संतोष को 'सुख' कहा गया है। जब भगवान यह कहते हैं कि "इन सबका आश्रय मैं हूँ", तो वे सम्पूर्ण ब्रह्मांड की धुरी अपने ही चरणों में स्थापित कर देते हैं। इस प्रकार, यह श्लोक केवल दार्शनिक जिज्ञासा को शांत करने वाला नहीं है, बल्कि यह एक जीव को उसके मूल उद्गम से जोड़ने वाला सेतु है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ अथ श्रीमद्भगवद्गीता चौदहवाँ अध्याय ॥

"गुणात्रयविभागयोग - श्लोक २७"

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥

श्लोक का उच्चारण विधि (उच्चारण निर्देश):

ब्रह्मणः (ब्रह्मणो) हि प्रतिष्ठा (प्रतिष्ठाऽहम्) अहम् अमृतस्य (अमृतस्याव्ययस्य) अव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्य (सुखस्यैकान्तिकस्य) ऐकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥

पाठ करने का संकल्प एवं नियम:

इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए। गीता के १४वें अध्याय के पाठ से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण के बाल या विराट स्वरूप का ध्यान करना अत्यंत फलदायी होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद का सूक्ष्म अध्ययन करने पर हमें वेदों और उपनिषदों का सार प्राप्त होता है। आइए, एक विस्तृत तालिका के माध्यम से हर एक शब्द के शाब्दिक और तात्त्विक अर्थ को समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ब्रह्मणः परब्रह्म का, अक्षर ब्रह्म का वह महान चेतना जो सम्पूर्ण चराचर जगत में व्याप्त है, जिसका कोई आदि या अंत नहीं है।
हि निश्चय ही, निस्संदेह यह शब्द भगवान के कथन में पूर्ण दृढ़ता, सत्यता और अकाट्य सिद्धांत को प्रकट करता है।
प्रतिष्ठा आश्रय, आधार, मूल निवास, प्रतिष्ठा जिस आधार पर पूरा महल टिका होता है, वही मूल स्तंभ या मूल ठिकाना।
अहमू (अहम्) मैं (स्वयं भगवान श्रीकृष्ण) सर्वोच्च नियंत्रक, पुरुषोत्तम भगवान जो सबके स्वामी और प्रियतम हैं।
अमृतस्य अमृत का, अमरता का, मुक्ति का मृत्यु के चक्र से छूटकर हमेशा के लिए अमरत्व और चैतन्य की स्थिति को प्राप्त होना।
अव्ययस्य च और कभी न नष्ट होने वाले (अक्षर) का वह तत्व जो काल के प्रभाव से कभी क्षीण, पुराना या नष्ट नहीं होता, जो अपरिवर्तनीय है।
शाश्वतस्य च और सदा रहने वाले, सनातन का जो तीनों कालों (भूत, भविष्य, वर्तमान) में एक रस और निरंतर स्थिर रहता है।
धर्मस्य सनातन धर्म का, कर्तव्य का, नैतिक नियम का वह आंतरिक नियम जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है और ब्रह्मांड को व्यवस्थित रखता है।
सुखस्य आनंद का, प्रसन्नता का, शांति का विषयों के भोग से मिलने वाले क्षणिक सुख से परे, आत्मा की नैसर्गिक आनंद स्थिति।
ऐकान्तिकस्य च निरपेक्ष, अनन्य, सर्वोच्च एवं अखंड सुख का ऐसा सुख जिसमें किसी भी प्रकार के दुख की कोई मिलावट या संभावना नहीं होती।

भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अक्षर ब्रह्म, अमरता, अव्यय तत्व, सनातन धर्म और परम ऐकान्तिक सुख—इन सबका एकमात्र आश्रय या आधार केवल और केवल मैं ही हूँ। जो मुझको पा लेता है, वह इन सबको स्वतः प्राप्त कर लेता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय का नाम 'गुणात्रयविभाग योग' है। इस अध्याय की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान में रची गई थी, जब कौरव और पाण्डव सेना आमने-सामने खड़ी थीं और अर्जुन घोर विषाद तथा संशय से घिरे हुए थे। अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से यह प्रश्न पूछा था कि हे प्रभु! इन तीनों गुणों (सत्व, रज और तम) से परे मनुष्य कैसे होता है? उनके आचरण कैसे होते हैं और वे इस त्रिगुणमयी माया को कैसे पार करते हैं? अर्जुन की इन जिज्ञासाओं का उत्तर देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने पहले सत्व, रज और तमोगुण के लक्षणों का विस्तार से वर्णन किया और यह बताया कि कैसे ये जीव को संसार में बांधते हैं।

अध्याय के अंत में, जब अर्जुन ने यह पूछा कि इन गुणों को लांघने वाले महापुरुष के क्या लक्षण हैं और वह किस प्रकार इन गुणों से अतीत हो जाता है, तब भगवान ने विस्तार से समझाया कि जो अनन्य भक्तियोग के द्वारा केवल मेरी ही सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को पूरी तरह पार कर जाता है और ब्रह्मभूत होने की योग्यता प्राप्त कर लेता है। इस संदर्भ को और अधिक गहराई से समझने के लिए हमें वैदिक कथाओं और उपनिषदों की ओर देखना होगा। वेदों में जिस 'परब्रह्म' की चर्चा की गई है, उपनिषदों में जिसे 'अमृतस्य परम् धाम' कहा गया है, और पुराणों में जिसे 'नारायण' या 'वासुदेव' के रूप में चित्रित किया गया है, उसी परम सत्य को भगवान श्रीकृष्ण यहाँ अपने ही रूप में स्थापित कर रहे हैं।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस भीष्म पर्व (जिसमें भगवद्गीता समाहित है) के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का यह कथन सामान्य मनुष्य का उपदेश नहीं है, बल्कि यह स्वयं परमेश्वर की प्रत्यक्ष वाणी है। कुरुक्षेत्र की उस धर्मभूमि पर जब चारों ओर मृत्यु का तांडव चल रहा था और अर्जुन अपने स्वजनों को देखकर युद्ध से विमुख हो रहे थे, तब भगवान ने उन्हें यह ज्ञान देकर यह समझाया कि शरीर नश्वर है, परंतु इस शरीर के भीतर जो 'ब्रह्म', 'अमृत' और 'धर्म' है, वह अविनाश है और उसका केंद्र बिंदु यह भौतिक शरीर नहीं बल्कि स्वयं परमेश्वर हैं। इस प्रकार, यह ऐतिहासिक प्रसंग केवल दो व्यक्तियों का संवाद नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए अज्ञान रूपी अंधकार को चीरने वाला सूर्य का प्रकाश बन गया।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस परम पवित्र श्लोक का नियमित मनन, जप और इसके अर्थ का ध्यान करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। शास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसके निम्नलिखित प्रमुख लाभ हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में चिंता और तनाव आम बात हो गई है। इस श्लोक का स्मरण करने से मन को यह विश्वास होता है कि जीवन का आधार कोई स्थिर और सुरक्षित सत्ता है, जिससे मन शांत होता है।

2. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का विकास

संस्कृत के इन पावन श्लोकों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाले ध्वनि कंपन (Vibrations) आसपास के वातावरण को शुद्ध करते हैं और एक दैवीय सकारात्मक आवरण का निर्माण करते हैं।

3. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

जब साधक यह जान लेता है कि समस्त धर्म और कर्म का आश्रय भगवान ही हैं, तो उसके सारे कर्म समर्पण भाव से होने लगते हैं, जिससे नए कर्म बंधनों का निर्माण रुक जाता है और पुराने कर्मों का शमन होता है।

4. मृत्यु के भय से मुक्ति

चूँकि भगवान स्वयं को 'अमृत' (अमरता) का आश्रय बताते हैं, इस श्लोक का नियमित ध्यान करने वाले व्यक्ति के मन से मृत्यु का अस्वाभाविक भय धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है और वह आत्मा की अमरता को अनुभव करता है।

5. अनन्य भक्ति की प्राप्ति

इस श्लोक के माध्यम से भगवान की शरण में जाने की प्रेरणा मिलती है, जिससे साधक के हृदय में भगवान के प्रति अगाध प्रेम और अनन्य भक्तियोग स्वतः जागृत होता है।

6. ऐकान्तिक सुख (परम आनंद) का अनुभव

संसार के दुखों से ऊपर उठकर एक आंतरिक संतोष और अखंड आनंद की अनुभूति होती है, जिसे शास्त्रों में 'ऐकान्तिक सुख' कहा गया है।

7. त्रिगुणातीत होने की सामर्थ्य

चौदहवें अध्याय के संदर्भ में, यह श्लोक साधक को सत्व, रज और तम गुणों के बंधनों से ऊपर उठकर मोक्ष की ओर अग्रसर होने में संबल प्रदान करता है।

8. भगवान की विशेष कृपा

जो भक्त भगवान को अपना सर्वस्व और सभी धर्मों व सुखों का आश्रय मानता है, उस पर भगवान श्रीकृष्ण की अहैतुत कृपा और संरक्षण सदैव बना रहता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों—विशेष रूप से महर्षि वेद व्यास रचित 'श्रीमद्भगवद्गीता' (महाभारत का भीष्म पर्व), श्री आदि शंकराचार्य जी के गीता भाष्य, और स्वामी रामसुखदास जी एवं स्वामी ज्ञानानन्द जी महाराज के प्रामाणिक प्रवचनों तथा टीकाओं के गहन अध्ययन के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों, उपनिषदों और गीता के शाश्वत ज्ञान को अत्यंत सरल, शुद्ध और प्रामाणिक हिंदी भाषा में पहुँचाना है। प्रत्येक श्लोक की व्याख्या करते समय उसकी व्याकरणिक शुद्धता, दार्शनिक गहराई और व्यावहारिक जीवन में उसकी उपयोगिता का विशेष ध्यान रखा गया है, ताकि आधुनिक पाठक भी अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं को संतुष्ट कर सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: यहाँ 'ब्रह्म' शब्द का अर्थ उस अक्षर, अविनाशी और सर्वव्यापक परम तत्व से है जो सम्पूर्ण सृष्टि का मूल आधार है। भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि वह निर्गुण-सगुण ब्रह्म कोई अमूर्त ऊर्जा नहीं, बल्कि उसका अंतिम आश्रय और प्रतिष्ठा स्वयं पुरुषोत्तम भगवान वासुदेव ही हैं।

उत्तर: 'ऐकान्तिक सुख' का अर्थ है अनन्य, निरपेक्ष और अखंड आनंद, जिसमें किसी भी प्रकार के दुख या शोक की मिलावट नहीं होती। संसार के विषय-भोगों से मिलने वाला सुख क्षणिक और नाशवान होता है तथा उसके अंत में दुख छिपा होता है, जबकि भगवान की भक्ति से प्राप्त होने वाला ऐकान्तिक सुख शाश्वत और परमानंद रूप होता है।

उत्तर: यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय 'गुणात्रयविभाग योग' का अंतिम सत्ताईसवां (27वां) श्लोक है। इसका मुख्य विषय तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से अतीत होकर अनन्य भक्तियोग के द्वारा परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त करना और उनके स्वरूप में स्थित होना है।

उत्तर: गृहस्थ जीवन में रहते हुए व्यक्ति अपने सभी कर्तव्यों (धर्म) का पालन करते हुए यह भाव रख सकता है कि उसका हर कर्म और उसका वास्तविक आश्रय भगवान श्रीकृष्ण ही हैं। अपने सुख-दुख को भगवान को समर्पित करके और नित्य प्रति इस श्लोक का स्मरण करके वह मानसिक शांति और संतुलन प्राप्त कर सकता है।

उत्तर: श्लोक का नियमित पाठ और मनन साधक की बुद्धि को शुद्ध करता है और उसे भगवान के शरणागत होने की प्रेरणा देता है। जब साधक पूर्ण शरणागति और अनन्य भक्ति को अपने जीवन में उतार लेता है, तब भगवान की कृपा से उसे अमृतत्व (मोक्ष) और परम सुख की प्राप्ति होती है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं: क्योंकि मैं ही ब्रह्म (वेदों का प्रतिपाद्य) का, अमृत का, अविनाशी का, शाश्वत धर्म का और एकान्त सुख का आधार हूँ। For I am the support of Brahman, the immortal and immutable, of eternal Dharma, and of absolute bliss.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान ही सब कुछ हैं। वे ही परम लक्ष्य हैं। उनकी भक्ति से सब कुछ प्राप्त होता है। The Lord is everything; He is the supreme goal. By devotion to Him, everything is attained.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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