प्रमुख हिंदू त्योहार • वर्ष २०२७

माँ तारा (उग्रतारा) विशेष पंचांग पर्व व उत्सव (2027): शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं व्रत कथा

माँ तारा दस महाविद्याओं में दूसरी और अत्यंत शक्तिशाली देवी हैं। यह पर्व तंत्र साधना, मोक्ष और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इस लेख में माँ तारा की उत्पत्ति, पूजा विधि, मंत्र और 2027 के विशेष मुहूर्त का विस्तृत वर्णन है।

१८ अप्रैल २०२७, रविवार तिथि व दिनांक
प्रमुख हिंदू त्योहार धार्मिक श्रेणी
३ कुल पाठक संख्या
१० मिनट पठन अवधि
महत्वपूर्ण सारांश: माँ तारा दस महाविद्याओं में दूसरी और अत्यंत शक्तिशाली देवी हैं। यह पर्व तंत्र साधना, मोक्ष और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इस लेख में माँ तारा की उत्पत्ति, पूजा विधि, मंत्र और 2027 के विशेष मुहूर्त का विस्तृत वर्णन है।
पावन पर्व तिथि एवं समय निर्धारण
पावन तिथि: चैत्र शुक्ल नवमी
प्रारंभ / मुख्य तिथि: १८ अप्रैल २०२७, रविवार
शुभ मुहूर्त / समय: निशिता काल: 23:45 से 00:35 बजे तक
विशेष उत्सव क्षेत्र: संपूर्ण भारत
पावन सिद्ध मंत्र
ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट

माँ तारा (उग्रतारा) विशेष पंचांग पर्व व उत्सव: आध्यात्मिक महत्व

सनातन धर्म में दस महाविद्याओं का विशेष स्थान है, जिनमें माँ तारा का स्थान द्वितीय है। माँ तारा को 'तारिणी' कहा जाता है, जो संसार रूपी सागर से अपने भक्तों का उद्धार करती हैं। स्कंद पुराण और तंत्र शास्त्र के अनुसार, माँ तारा की उपासना से साधक को वाक सिद्धि, धन, ऐश्वर्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है। उग्रतारा का स्वरूप यद्यपि उग्र है, परंतु वे अपने भक्तों के लिए अत्यंत सौम्य और करुणामयी हैं।

पंचांग एवं शुभ मुहूर्त (2027)

विवरणसमय/तिथि
तिथिचैत्र शुक्ल नवमी (तारा जयंती)
ब्रह्म मुहूर्त04:15 - 05:05
अभिजित मुहूर्त11:55 - 12:45
निशिता काल (पूजा हेतु)23:45 - 00:35

पूजा विधि एवं संकल्प

माँ तारा की पूजा मुख्य रूप से रात्रि के समय (निशिता काल) में की जाती है। सर्वप्रथम स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 'ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट' मंत्र का उच्चारण करते हुए संकल्प लें। चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर माँ तारा का चित्र या यंत्र स्थापित करें। पंचोपचार या षोडशोपचार विधि से पूजा करें। नैवेद्य में गुड़, चने और विशेष रूप से नीले पुष्प अर्पित करें।

माँ तारा की पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब समुद्र मंथन से हलाहल विष निकला, तो भगवान शिव ने उसे धारण किया। विष की ज्वाला से शिवजी व्याकुल हो उठे। तब माँ तारा ने 'नील सरस्वती' के रूप में प्रकट होकर शिवजी को अपने स्तनपान से शांत किया। वे ही संसार के दुखों को हरने वाली 'तारिणी' कहलाईं।

मंत्र एवं साधना

माँ तारा का मूल मंत्र: ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट। इस मंत्र का जप रुद्राक्ष की माला से करना चाहिए। यह मंत्र साधक के जीवन से सभी प्रकार के भय और बाधाओं को दूर करता है।

नियम एवं सावधानियां

साधना के दौरान सात्विकता का पालन करें। तामसिक भोजन का त्याग करें। माँ तारा की पूजा में एकाग्रता और गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य है। व्रत के दिन निराहार या फलाहार रहकर माँ का ध्यान करें।

माँ तारा (उग्रतारा) का तात्विक स्वरूप और 2027 पंचांग का आध्यात्मिक महत्व

सनातन धर्म की दस महाविद्याओं में द्वितीय स्थान पर विराजमान माँ तारा, जिन्हें 'उग्रतारा' के नाम से भी जाना जाता है, ब्रह्मांड की उस चेतना का प्रतिनिधित्व करती हैं जो साधक को भवसागर से पार उतारने वाली 'तारिणी' है। वर्ष 2027 में माँ तारा की विशेष आराधना के लिए पंचांग के अनुसार चैत्र और आश्विन मास की नवरात्रि के अतिरिक्त, तारा जयंती का पर्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। तारा जयंती, जो मुख्य रूप से चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है, 2027 में यह तिथि आध्यात्मिक ऊर्जा के संचय के लिए एक दुर्लभ योग लेकर आ रही है। इस दिन चंद्रमा का नक्षत्र और ग्रहों की स्थिति साधकों के लिए 'नील सरस्वती' की सिद्धि हेतु सर्वोत्तम मानी गई है।

माँ तारा का स्वरूप नील वर्ण का है, जो अनंत आकाश और अगाध समुद्र की गहराई का प्रतीक है। वे अपने भक्तों के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश प्रज्वलित करती हैं। 2027 के पंचांगीय गणनाओं के अनुसार, तारा जयंती के दिन 'सर्वार्थ सिद्धि योग' और 'अमृत सिद्धि योग' का संयोग बन रहा है, जो किसी भी प्रकार की तंत्र साधना, मंत्र अनुष्ठान और विशेष पूजा के लिए अत्यंत फलदायी है। इस वर्ष की ग्रह स्थिति यह संकेत देती है कि जो साधक वाणी की सिद्धि, वाकपटुता और उच्च कोटि के ज्ञान की प्राप्ति के लिए माँ तारा की शरण में जाएंगे, उन्हें विशेष कृपा प्राप्त होगी।

उग्रतारा का अर्थ केवल 'भयानक' नहीं, बल्कि 'तीव्र गति से कल्याण करने वाली' है। वे समय की अधिष्ठात्री हैं, जो काल के चक्र को नियंत्रित करती हैं। 2027 में तारा जयंती के अवसर पर ग्रहों का गोचर विशेष रूप से उन लोगों के लिए अनुकूल है जो अपने जीवन में मानसिक शांति, शत्रुओं पर विजय और आध्यात्मिक उन्नति की कामना रखते हैं। पंचांग के अनुसार, इस दिन की गई पूजा का प्रभाव पूरे वर्ष बना रहता है, क्योंकि यह तिथि सूर्य और चंद्रमा के उस मिलन बिंदु को दर्शाती है जहाँ से सृष्टि का सृजन और संहार दोनों संचालित होते हैं।

तारा जयंती 2027: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और अनुष्ठान के नियम

वर्ष 2027 में तारा जयंती के पावन पर्व पर पूजा का शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार विशेष रूप से निर्धारित किया गया है। साधकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि माँ तारा की पूजा मुख्य रूप से निशीथ काल (मध्यरात्रि) में की जाती है, क्योंकि वे रात्रि की अधिष्ठात्री देवी हैं। 2027 में चैत्र शुक्ल नवमी तिथि का प्रारंभ और समापन काल इस प्रकार है कि मध्यरात्रि का समय 'अभिजीत मुहूर्त' के साथ मिलकर एक शक्तिशाली ऊर्जा क्षेत्र का निर्माण करेगा। पूजा के लिए साधक को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए और नील वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ माना गया है।

पूजा विधि में सबसे पहले 'स्वस्ति वाचन' और 'संकल्प' अत्यंत अनिवार्य है। माँ तारा के समक्ष नीले पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य के रूप में गुड़ और चने का भोग अर्पित करना चाहिए। 'ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट' इस मंत्र का जप कम से कम 108 बार या 11 माला करना चाहिए। यदि संभव हो, तो इस दिन 'नील सरस्वती स्तोत्र' का पाठ करना चाहिए, जो वाणी के दोषों को दूर करने और बुद्धि को प्रखर बनाने में अचूक है। पूजा के अंत में क्षमा प्रार्थना करते हुए माँ से अपने अज्ञान के नाश की याचना करनी चाहिए।

पूजा चरण महत्वपूर्ण सामग्री साधना का उद्देश्य
शुद्धि एवं संकल्प गंगाजल, अक्षत, पुष्प संकल्पबद्ध होकर सिद्धि प्राप्ति
आवाहन एवं पूजन नीले पुष्प, चंदन, धूप देवी की ऊर्जा को जागृत करना
मंत्र जप नील रुद्राक्ष माला वाक सिद्धि एवं शत्रुओं का शमन
आरती एवं भोग गुड़, चना, घी का दीपक पूर्णता और आशीर्वाद प्राप्ति

व्रत के नियमों के पालन में सात्विकता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। तारा जयंती के दिन उपवास रखने वाले साधकों को अन्न का त्याग कर फलाहार या केवल जल पर रहना चाहिए। इस दिन तामसिक भोजन, क्रोध, और असत्य भाषण से पूर्णतः बचना चाहिए। माँ तारा की पूजा में 'नील' रंग का महत्व है, इसलिए पूजा स्थल पर नीले रंग के आसन का प्रयोग करना ऊर्जा के प्रवाह को सुचारू बनाता है। 2027 के इस पर्व पर यदि साधक किसी निर्धन को विद्या सामग्री या भोजन का दान करता है, तो उसे माँ तारा की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है।

माँ तारा की पौराणिक कथा और आध्यात्मिक दर्शन

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, जब समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकला, तो भगवान शिव ने उसे धारण किया। उस विष की प्रचंड ज्वाला से स्वयं महादेव भी व्याकुल हो उठे। तब माँ आदि शक्ति ने 'तारा' रूप धारण कर भगवान शिव को अपने स्तन से दुग्धपान कराया, जिससे विष का प्रभाव शांत हुआ। यही कारण है कि माँ तारा को 'विष नाशिनी' और 'दुख हरणी' कहा जाता है।

यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन में जब भी हम विषैली परिस्थितियों, मानसिक तनाव या नकारात्मकता के सागर में घिरे हों, तो माँ तारा का स्मरण ही एकमात्र उपाय है। वे उस शक्ति का नाम है जो हमारे भीतर के विष (अहंकार, मोह, लोभ) को अमृत में बदल देती है। 2027 में जब आप तारा जयंती का व्रत रखें, तो इस कथा को मन में धारण करें कि जिस प्रकार उन्होंने महादेव को कष्ट से मुक्त किया, उसी प्रकार वे आपके जीवन के समस्त कष्टों का निवारण करेंगी। यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि समर्पण ही मुक्ति का मार्ग है।

तारा महाविद्या का दर्शन 'शब्द ब्रह्म' से जुड़ा है। वे 'नील सरस्वती' के रूप में ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं। जो साधक 2027 के इस पर्व पर अपनी वाणी को संयमित रखते हुए माँ के मंत्रों का जप करते हैं, उनकी वाणी में ऐसी शक्ति आती है कि उनके द्वारा कहे गए शब्द सत्य सिद्ध होने लगते हैं। माँ तारा का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि जीवन में 'उग्र' होने का अर्थ हिंसक होना नहीं, बल्कि अपने लक्ष्यों के प्रति 'तीव्र' और 'अटल' होना है।

अंततः, तारा जयंती 2027 का यह पर्व साधकों के लिए आत्म-साक्षात्कार का एक स्वर्णिम अवसर है। पंचांग के अनुसार, इस दिन ग्रहों की स्थिति यह दर्शाती है कि ब्रह्मांड की ऊर्जा माँ तारा के चरणों में केंद्रित है। जो भी व्यक्ति इस दिन पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से पूजा करता है, उसे न केवल सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है, बल्कि मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त होता है। माँ तारा की कृपा से साधक का अंतःकरण शुद्ध होता है और वह भवसागर की लहरों को पार कर आत्म-स्वरूप में स्थित हो जाता है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु व सनातन पंचांग परंपराओं के संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा संकलित किया गया है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा

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