प्रमुख हिंदू त्योहार • वर्ष २०२७

माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी जयंती 2027: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, रहस्यमयी कथा एवं साधना

माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी देवी शक्ति का वह स्वरूप हैं जो तीनों लोकों में सौंदर्य और ज्ञान का प्रतीक हैं। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाने वाली यह जयंती साधकों के लिए मोक्ष और ऐश्वर्य प्राप्ति का सबसे उत्तम दिन माना जाता है। इस लेख में जानिए माँ ललिता के प्राकट्य की कथा, पूजा विधि और विशेष साधना के नियम।

२२ मार्च २०२७, सोमवार तिथि व दिनांक
प्रमुख हिंदू त्योहार धार्मिक श्रेणी
३ कुल पाठक संख्या
११ मिनट पठन अवधि
महत्वपूर्ण सारांश: माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी देवी शक्ति का वह स्वरूप हैं जो तीनों लोकों में सौंदर्य और ज्ञान का प्रतीक हैं। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाने वाली यह जयंती साधकों के लिए मोक्ष और ऐश्वर्य प्राप्ति का सबसे उत्तम दिन माना जाता है। इस लेख में जानिए माँ ललिता के प्राकट्य की कथा, पूजा विधि और विशेष साधना के नियम।
पावन पर्व तिथि एवं समय निर्धारण
पावन तिथि: फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा
प्रारंभ / मुख्य तिथि: २२ मार्च २०२७, सोमवार
शुभ मुहूर्त / समय: प्रातः 04:30 से 05:15 (ब्रह्म मुहूर्त) / अभिजित मुहूर्त: 12:05 से 12:55
विशेष उत्सव क्षेत्र: संपूर्ण भारत
पावन सिद्ध मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ललितायै नमः

माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी जयंती: ब्रह्मांड की सर्वोच्च शक्ति का प्राकट्य

सनातन धर्म में दस महाविद्याओं में माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी का स्थान सर्वोपरि है। इन्हें 'राजराजेश्वरी', 'बाला', 'षोडशी' और 'ललिता' जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। स्कंद पुराण और ब्रह्मांड पुराण के अनुसार, माँ ललिता साक्षात परब्रह्म का स्वरूप हैं। फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को माँ ललिता का प्राकट्य दिवस मनाया जाता है। यह दिन न केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए, बल्कि भौतिक सुखों और मानसिक शांति के लिए भी अत्यंत फलदायी है।

शास्त्रीय आधार और आध्यात्मिक महत्व

धर्मसिंधु और तंत्र शास्त्रों के अनुसार, माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी का अर्थ है जो तीनों लोकों (स्वर्ग, मृत्यु और पाताल) में सबसे सुंदर और शक्तिशाली हैं। 'त्रिपुर' का अर्थ है तीन पुर (शरीर, मन और आत्मा) और 'सुंदरी' का अर्थ है जो इन तीनों में चेतना बनकर वास करती हैं। इनकी उपासना से साधक को 'श्री विद्या' की प्राप्ति होती है, जो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।

पंचांग एवं शुभ मुहूर्त (2027)

विवरणसमय/तिथि
तिथिफाल्गुन पूर्णिमा
ब्रह्म मुहूर्तप्रातः 04:30 से 05:15
अभिजित मुहूर्तदोपहर 12:05 से 12:55
अमृत कालप्रातः 09:15 से 10:45

पूजा विधि एवं संकल्प

माँ ललिता की पूजा में 'श्री यंत्र' का विशेष महत्व है। पूजा की प्रक्रिया इस प्रकार है:

  1. प्रातः काल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर माँ ललिता की प्रतिमा या श्री यंत्र स्थापित करें।
  3. गंगाजल से शुद्धिकरण करें और संकल्प लें: 'ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः... अद्य फाल्गुन पूर्णिमायां मम सकल पापक्षयपूर्वकं श्री ललिता त्रिपुरसुंदरी प्रीत्यर्थं पूजां करिष्ये।'
  4. षोडशोपचार पूजा करें: गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
  5. माँ को लाल गुड़हल के फूल और श्रीफल अत्यंत प्रिय हैं।
  6. 'ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ललितायै नमः' मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें।

माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी की दिव्य कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब कामदेव को भगवान शिव ने भस्म कर दिया, तो कामदेव के भस्म से 'भंडासुर' नामक राक्षस का जन्म हुआ। भंडासुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया। तब देवताओं की प्रार्थना पर माँ ललिता का प्राकट्य हुआ। माँ ने अपनी शक्ति से भंडासुर का वध किया और सृष्टि को पुनः व्यवस्थित किया। यह कथा हमें सिखाती है कि जब-जब अहंकार (भंडासुर) का उदय होता है, तब-तब माँ ललिता का ज्ञान रूपी प्रकाश उसे नष्ट करने के लिए प्रकट होता है।

पूजा सामग्री सूची

  • श्री यंत्र या माँ ललिता का चित्र
  • लाल वस्त्र, लाल पुष्प (गुड़हल)
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शर्करा)
  • अक्षत, कुमकुम, चंदन
  • नैवेद्य (खीर, फल, मिष्ठान)
  • धूप, दीप, कपूर

महत्वपूर्ण मंत्र

ध्यान मंत्र:
सिन्दूरारुण विग्रहां त्रिनयनां माणिक्य मौलिस्फुरत्
तारा नायक शेखरां स्मितमुखी मापीन वक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्ण रत्न चषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं
सौम्यां रत्न घटस्थ रक्त चरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम्॥

अर्थ: हे माँ, जिनका शरीर सिंदूर के समान लाल है, जो तीन नेत्रों वाली हैं, जिनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है, ऐसी सौम्य माँ ललिता का मैं ध्यान करता हूँ।

व्रत के नियम एवं सावधानियां

माँ ललिता की जयंती पर उपवास रखने वाले भक्तों को सात्विक आहार लेना चाहिए। तामसिक भोजन का त्याग करें। दिन भर मौन रहकर या मंत्र जप करते हुए समय व्यतीत करें। रात्रि में जागरण का विशेष महत्व है।

निष्कर्ष

माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी की उपासना केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर छिपी हुई दिव्य शक्ति को जागृत करने का माध्यम है। इस फाल्गुन पूर्णिमा पर माँ की भक्ति में लीन होकर अपने जीवन को धन्य बनाएं।

माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी का प्राकट्य रहस्य और आध्यात्मिक दर्शन

सनातन धर्म के तंत्र और भक्ति शास्त्र में माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी को 'श्रीविद्या' की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। वे दस महाविद्याओं में प्रथम और सर्वोच्च स्थान रखती हैं। वर्ष 2027 में माँ ललिता जयंती का पावन पर्व चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि को अत्यंत शुभ योगों के साथ मनाया जाएगा। ललिता शब्द का अर्थ है 'वह जो समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है और जिसकी लीला ही सृष्टि का आधार है'। त्रिपुरसुंदरी का अर्थ है—जो तीनों लोकों (स्वर्ग, मृत्यु और पाताल) में सबसे सुंदर और शक्तिशाली हैं। वे स्वयं पराशक्ति हैं, जो भगवान शिव के साथ मिलकर सृष्टि के चक्र को संचालित करती हैं।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, जब कामदेव को भगवान शिव ने भस्म कर दिया था, तब कामदेव के भस्म से 'भांडासुर' नामक एक अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर राक्षस का जन्म हुआ। भांडासुर ने अपनी तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर वरदान प्राप्त किया और देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। तब देवताओं ने मिलकर आदि शक्ति की आराधना की। उनकी पुकार सुनकर माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी 'श्रीचक्र' के मध्य से प्रकट हुईं। उनका प्राकट्य इतना तेजस्वी था कि समस्त ब्रह्मांड आलोकित हो उठा। उन्होंने भांडासुर का वध कर देवताओं को भयमुक्त किया और सृष्टि में पुनः धर्म की स्थापना की।

आध्यात्मिक दृष्टि से, माँ ललिता का प्राकट्य हमारे भीतर के अज्ञान रूपी भांडासुर का विनाश करने का प्रतीक है। 'त्रिपुर' का अर्थ हमारे तीन शरीर—स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर भी है। माँ ललिता इन तीनों शरीरों की अधिष्ठात्री हैं। उनकी जयंती के दिन जो साधक श्रीयंत्र की पूजा करता है, उसे न केवल सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है, बल्कि अंत में मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त होता है। यह दिन आत्म-साक्षात्कार और कुंडलिनी जागरण के लिए वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।

वर्ष 2027 ललिता जयंती: शुभ मुहूर्त और पूजा की विस्तृत विधि

वर्ष 2027 में ललिता जयंती के दिन ग्रहों की स्थिति अत्यंत अनुकूल है। इस दिन चंद्रमा का प्रभाव और पूर्णिमा की पूर्णता साधकों को मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करेगी। पूजा का मुख्य उद्देश्य माँ को प्रसन्न करना और उनके श्रीचरणों में स्वयं को समर्पित करना है। नीचे दी गई तालिका के माध्यम से आप पूजा के प्रमुख मुहूर्त और समय को समझ सकते हैं, जो आपकी साधना को सफल बनाने में सहायक होंगे।

पूजा चरण महत्वपूर्ण समय (अनुमानित) विशेष निर्देश
ब्रह्म मुहूर्त प्रातः 04:15 - 05:30 ध्यान और श्रीविद्या मंत्र जप
अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:00 - 12:45 मुख्य अनुष्ठान एवं अभिषेक
संध्या पूजन शाम 06:30 - 07:45 ललिता सहस्रनाम पाठ
निशीथ काल मध्यरात्रि 11:45 - 12:30 विशेष तांत्रिक पूजन

पूजा विधि के लिए सर्वप्रथम एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं और उस पर माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी का चित्र या श्रीयंत्र स्थापित करें। गंगाजल से शुद्धिकरण करने के बाद, माँ को पंचामृत से स्नान कराएं। तत्पश्चात उन्हें लाल पुष्प, अक्षत, कुमकुम, और सुगंधित इत्र अर्पित करें। माँ ललिता को 'श्री' का प्रतीक माना जाता है, इसलिए उन्हें कमल का पुष्प अत्यंत प्रिय है। भोग में उन्हें खीर, हलवा, या शहद मिश्रित मिष्ठान अर्पित करना चाहिए। पूजा के दौरान 'ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ललिता त्रिपुरसुंदरी नमः' मंत्र का कम से कम 108 बार जप करना अत्यंत फलदायी होता है।

पूजा के अंत में 'ललिता सहस्रनाम' का पाठ करना अनिवार्य माना गया है। यह स्तोत्र स्वयं वाग्देवी द्वारा रचित है और इसमें माँ के हजार नामों का वर्णन है, जो साधक के समस्त पापों का नाश करने में सक्षम है। यदि संभव हो, तो इस दिन किसी कन्या को भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा दें, क्योंकि कन्याओं में माँ ललिता का ही स्वरूप माना जाता है। व्रत रखने वाले साधकों को सात्विक आहार का पालन करना चाहिए और दिन भर मन में माँ के स्वरूप का ध्यान करना चाहिए।

ललिता व्रत कथा: भांडासुर वध और शक्ति का विजय पर्व

"यथा श्रीचक्रं तथा देही, यथा देही तथा श्रीचक्रम्।" अर्थात् जिस प्रकार श्रीयंत्र माँ ललिता का स्वरूप है, उसी प्रकार यह मानव शरीर भी माँ का ही मंदिर है। जो इस रहस्य को समझ लेता है, वह ललिता जयंती के दिन पूर्ण सिद्धि प्राप्त करता है।

पौराणिक कथा के अनुसार, जब भांडासुर ने देवताओं को प्रताड़ित करना आरंभ किया, तो भगवान शिव ने अपनी योग माया से एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ की अग्नि से माँ ललिता का प्राकट्य हुआ। माँ ललिता के साथ उनकी शक्तियां—मातंगिका, वाराही और श्यामला भी प्रकट हुईं। माँ ललिता ने अपने धनुष से बाण चलाकर भांडासुर की सेना का संहार किया। भांडासुर ने मायावी शक्तियों का प्रयोग किया, परंतु माँ ललिता की दृष्टि मात्र से उसकी समस्त माया नष्ट हो गई। अंत में माँ ने भांडासुर का वध कर उसे मोक्ष प्रदान किया।

इस कथा का गहरा अर्थ यह है कि हमारे भीतर काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार ही भांडासुर हैं। जब हम ललिता जयंती के दिन व्रत और पूजा करते हैं, तो हम माँ से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारे भीतर के इन विकारों का नाश करें। माँ ललिता की कृपा से साधक को 'वाक सिद्धि' प्राप्त होती है। जो भी वह बोलता है, वह सत्य होने लगता है। उनकी उपासना से दरिद्रता का नाश होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।

अंत में, ललिता जयंती का पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर छिपी हुई दिव्य शक्ति को पहचानने का अवसर है। माँ ललिता को 'राजराजेश्वरी' भी कहा जाता है, क्योंकि वे समस्त ब्रह्मांड की साम्राज्ञी हैं। उनकी पूजा करने से व्यक्ति को राजयोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। इस वर्ष 2027 में, जब आप माँ की आराधना करें, तो पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ करें। माँ ललिता अपने भक्तों की पुकार को कभी अनसुना नहीं करतीं और उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करती हैं।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु व सनातन पंचांग परंपराओं के संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा संकलित किया गया है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा

अन्य महत्वपूर्ण सनातन त्यौहार व व्रत

🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!