Vrindavan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

कोई जाए जो वृंदावन गीत (jaye jo vrindavan lyrics in hindi)

कोई जाए जो वृंदावन मेरा पैगाम ले जाना भजन के लिरिक्स, हिंदी अर्थ और भावार्थ पढ़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित | Bhaktilok पर।

"कोई जाए जो वृंदावन मेरा पैगाम ले जाना" एक अत्यंत ही भावपूर्ण और विरह रस से ओत-प्रोत वैष्णव भजन है। यह भजन भक्त के हृदय की उस व्याकुलता को दर्शाता है, जो सांसारिक बंधनों और माया के जाल में फंसे होने के कारण साक्षात् श्रीधाम वृंदावन की पावन रज में उपस्थित नहीं हो पा रहा है। इस भजन में 'विरह भाव' (Separation) और 'शरणागति' (Surrender) की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। जब एक जीवात्मा अपने आराध्य श्री बांके बिहारी लाल के दर्शन के लिए तड़पती है, तो वह वृंदावन जाने वाले किसी भी अन्य यात्री को अपना संदेशवाहक (दूत) बना लेती है। यह भजन श्री हरिदासी संप्रदाय की दिव्य रस-पद्धति और सखी-भाव को समर्पित है, जिसे गाते समय प्रत्येक श्रद्धालु की आँखें अश्रुपूर्ण हो जाती हैं। आइए, इस पावन भजन के संपूर्ण लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और शास्त्रीय संदर्भों का गहराई से अध्ययन करें।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें


कोई जाये जो वृन्दावन, मेरा पैगाम ले जाना।
मैं खुद तो जा नहीं पाऊँ, मेरा प्रणाम ले जाना॥

ये कहना मुरली वाले से, मुझे तुम कब बुलाओगे।
पड़े जो जाल माया के, उन्हें तुम कब छुड़ाओगे॥
मुझे इस घोर दल-दल से, मेरे भगवान ले जाना।
कोई जाये जो वृन्दावन, मेरा पैगाम ले जाना...

जब उनके सामने जाओ, तो उनको देखते रहना।
मेरा जो हाल पूछें तो, ज़ुबाँ से कुछ नहीं कहना॥
बहा देना कुछ एक आँसू, मेरी पहचान ले जाना।
कोई जाये जो वृन्दावन, मेरा पैगाम ले जाना...

जो रातें जाग कर देखें, मेरे सब ख्वाब ले जाना।
मेरे आँसू तड़प मेरी, मेरे सब भाव ले जाना॥
न ले जाओ अगर मुझको, मेरा सामान ले जाना।
कोई जाये जो वृन्दावन, मेरा पैगाम ले जाना...

मैं भटकूँ दर ब दर प्यारे, जो तेरे मन में आये कर।
मेरी जो साँसे अंतिम हो, वो निकलें तेरी चौखट पर॥
‘हरिदासी’ हूँ मैं तेरी, मुझे बिन दाम ले जाना।
कोई जाये जो वृन्दावन, मेरा पैगाम ले जाना...

कोई जाये जो वृन्दावन, मेरा पैगाम ले जाना।
मैं खुद तो जा नहीं पाऊँ, मेरा प्रणाम ले जाना॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि एक विरही भक्त के हृदय का क्रंदन है। जब संसार के सारे सहारे छूट जाते हैं और जीव को अपनी असमर्थता का आभास होता है, तब वह भगवान की शरण में जाने के लिए छटपटाता है। इस भजन का मुख्य भाव यह है कि यदि हम स्वयं शारीरिक रूप से वृंदावन नहीं जा पा रहे हैं, तो हमारा मन, हमारी भावनाएं और हमारे आंसू वहां पहुंच जाने चाहिए।

भक्त कहता है कि हे वृंदावन जाने वाले राही! तुम बड़े भाग्यशाली हो जो उस पावन भूमि पर जा रहे हो जहां श्री राधा-कृष्ण की नित्य रासलीला होती है। मैं तो इस संसार के प्रपंचों, पारिवारिक जिम्मेदारियों और कर्मों के बंधन में बंधा हुआ हूँ, इसलिए स्वयं नहीं जा सकता। तुम मेरा प्रणाम ठाकुर जी के चरणों में अर्पित कर देना।

भक्त अपने संदेशवाहक से कहता है कि जब तुम श्री बांके बिहारी के सम्मुख खड़े हो, तो उनसे कुछ मत कहना। बस अपनी आँखों से दो बूंद आंसू बहा देना। वे आंसू ही मेरी पहचान हैं, क्योंकि आंसू कभी झूठ नहीं बोलते। वे हृदय की सच्ची पुकार को बिना शब्दों के ही व्यक्त कर देते हैं। अंत में, भक्त अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त करता है कि चाहे पूरा जीवन भटकते हुए बीत जाए, लेकिन जब अंतिम सांस आए, तो वह वृंदावन की पावन चौखट पर ही निकले।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे अन्य भजनों से विशिष्ट और अत्यंत लोकप्रिय बनाती हैं:

  • विरह भक्ति (Longing for Divine): यह भजन गौड़ीय और हरिदासी संप्रदाय के विरह भाव को प्रदर्शित करता है। इसमें मिलन की खुशी से अधिक बिछड़ने की तड़प और मिलने की तीव्र उत्कंठा है।
  • सच्ची शरणागति (Total Surrender): 'मुझे बिन दाम ले जाना' पंक्ति दर्शाती है कि भक्त स्वयं को पूरी तरह से भगवान को सौंप चुका है। उसका अपना कोई मूल्य नहीं है, वह निष्काम भाव से प्रभु का होना चाहता है।
  • आंसुओं की भाषा: हिंदू दर्शन में आंसुओं को भक्ति का सबसे पवित्र माध्यम माना गया है। यह भजन शब्दों के स्थान पर आंसुओं को संदेशवाहक बनाने की बात करता है।
  • वृंदावन धाम की महिमा: भजन इस बात की पुष्टि करता है कि वृंदावन केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि वह चिन्मय धाम है जहां साक्षात परब्रह्म निवास करते हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान के नाम संकीर्तन के लिए कोई भी समय वर्जित नहीं है, परंतु इस भजन की प्रकृति विरह और शांत रस की होने के कारण इसे निम्नलिखित समय पर गाना अत्यंत फलदायी होता है:

संध्या काल (Evening Prayer): संध्या आरती के पश्चात जब मन शांत होता है, तब इस भजन का गायन हृदय को शांति और भक्ति रस से सराबोर कर देता है।

एकांत साधना (Personal Meditation): जब आप अकेले बैठे हों और ठाकुर जी की याद आ रही हो, तब इस भजन को गुनगुनाने से मानसिक क्लेश दूर होते हैं और अश्रुपात के माध्यम से अंतःकरण शुद्ध होता है।

गायन की विधि: इसे बहुत तीव्र गति से नहीं गाना चाहिए। इसे अत्यंत धीमी लय, करुण पुकार और बंद आंखों से प्रभु की छवि का ध्यान करते हुए गाना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से श्री बांके बिहारी लाल (भगवान श्री कृष्ण) और श्री राधा रानी को समर्पित है। वृंदावन के अधिष्ठाता देव श्री बांके बिहारी जी ही इस भजन के केंद्र बिंदु हैं।

इस भजन के भाव स्वामी हरिदास जी की परंपरा से प्रेरित हैं। स्वामी हरिदास जी ने ही निधिवन में अपनी संगीत साधना से श्री बांके बिहारी जी को प्रकट किया था। इस भजन के अंत में आने वाला शब्द 'हरिदासी' इसी परंपरा और सखी-भाव की ओर संकेत करता है, जहां भक्त स्वयं को श्री राधा-कृष्ण की सखियों की दासी मानकर सेवा करता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस अत्यंत लोकप्रिय और भावपूर्ण भजन के स्वर एवं रचनाकार भैय्या हैप्पी शर्मा (श्री हरीदासी जी) हैं, जो फगवाड़ा, पंजाब के रहने वाले हैं। उन्होंने इस भजन में अपने हृदय के वास्तविक उद्गारों को पिरोया है। पंजाब की पावन भूमि से उठकर यह भजन आज संपूर्ण ब्रजमंडल और विश्वभर के कृष्ण भक्तों के कंठ का हार बन चुका है। इसकी सरल शब्दावली और हृदयस्पर्शी संगीत संयोजन के कारण यह हर आयु वर्ग के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा और सूफी काव्य शैली का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है।

  • रूपक अलंकार (Metaphor): 'माया का जाल' और 'घोर दल-दल' जैसे शब्दों में रूपक अलंकार का प्रयोग किया गया है, जो संसार की नश्वरता और कठिनाई को दर्शाता है।
  • प्रतीकात्मकता (Symbolism): 'सामान' शब्द का प्रयोग भक्त के संचित कर्मों, इच्छाओं, आंसुओं और भावों के लिए किया गया है।
  • लयबद्धता: भजन की प्रत्येक पंक्ति में एक सुंदर प्रवाह है, जो संगीत के शास्त्रीय और सुगम दोनों रूपों में आसानी से ढाला जा सकता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें केवल भावुक नहीं बनाता, बल्कि जीवन के गंभीर आध्यात्मिक सत्यों से भी परिचित कराता है:

  1. संसार की असारता: यह संसार एक 'दल-दल' के समान है। हम इसमें जितना निकलने का प्रयास करेंगे, उतना ही धंसते चले जाएंगे। केवल भगवान की कृपा का संबल ही हमें इससे बाहर निकाल सकता है।
  2. अहंकार का त्याग: 'बिन दाम ले जाना' का अर्थ है कि हमारे पास भगवान को देने के लिए कुछ नहीं है। हम निष्कंचन होकर ही उनके पास जा सकते हैं।
  3. प्रार्थना की शक्ति: जब हम स्वयं असमर्थ हों, तो दूसरों से प्रार्थना करवाना (वैष्णव सेवा और संगति) भी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
पैगाम संदेश (Message) भक्त के हृदय की पुकार जो वह भगवान तक पहुंचाना चाहता है।
माया का जाल सांसारिक मोह-माया (Illusion) वह बंधन जो जीव को ईश्वर की ओर बढ़ने से रोकता है।
घोर दल-दल संसार रूपी कीचड़ (Samsara) जन्म-मृत्यु और दुखों का चक्र जिसमें जीव फंसा हुआ है।
सामान भाव, आंसू और यादें भक्त की एकमात्र पूंजी जो उसके पास प्रभु को अर्पित करने के लिए है।
हरिदासी स्वामी हरिदास की दासी / सखी भाव स्वयं को भगवान की नित्य दासी स्वीकार करना।
बिन दाम बिना किसी मूल्य के (Priceless) बिना किसी शर्त या अपेक्षा के पूर्ण आत्मसमर्पण।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

1. "कोई जाये जो वृन्दावन, मेरा पैगाम ले जाना। मैं खुद तो जा नहीं पाऊँ, मेरा प्रणाम ले जाना॥"
हे भाग्यशाली पथिक! यदि तुम वृंदावन जा रहे हो, तो मेरी ओर से एक संदेश ले जाओ। मैं अपने पापों, कर्मों और सांसारिक बंधनों के कारण वहां आने में असमर्थ हूँ, इसलिए तुम मेरा सादर प्रणाम प्रभु के चरणों में अर्पित कर देना।

2. "ये कहना मुरली वाले से मुझे तुम कब बुलाओगे। पड़े जो जाल माया के उन्हे तुम कब छुडाओगे॥"
उस मुरलीधर से पूछना कि हे प्रभु! आपने पूरी सृष्टि का उद्धार किया, मुझे अपनी शरण में कब बुलाओगे? मैं जिस अज्ञान और माया के जाल में जकड़ा हुआ हूँ, उससे मुझे कब मुक्ति दिलाओगे?

3. "मुझे इस घोर दल-दल से मेरे भगवान ले जाना..."
यह संसार एक ऐसा दल-दल है जहां वासना, क्रोध और लोभ निरंतर जीव को नीचे खींचते हैं। हे मेरे भगवान! अपनी कृपा का हाथ बढ़ाकर मुझे इस दल-दल से बाहर निकाल लीजिए।

4. "जब उनके सामने जाओ तो उनको देखते रहना। मेरा जो हाल पूछें तो ज़ुबाँ से कुछ नहीं कहना॥"
जब तुम गर्भगृह में श्री बांके बिहारी के सम्मुख खड़े हो, तो अपनी पलकें मत झपकाना, बस उन्हें निहारते रहना। और यदि वे मेरे बारे में पूछें, तो अपने मुख से कुछ मत कहना, क्योंकि मेरी दयनीय स्थिति शब्दों में बयां नहीं की जा सकती।

5. "बहा देना कुछ एक आँसू मेरी पहचान ले जाना..."
मेरी ओर से बस कुछ आंसू बहा देना। वे आंसू ही मेरे मौन आमंत्रण और मेरी विरह-अवस्था को बयां कर देंगे। वही मेरी वास्तविक पहचान है।

6. "जो रातें जाग कर देखें, मेरे सब ख्वाब ले जाना। मेरे आंसू तड़प मेरी, मेरे सब भाव ले जाना॥"
मैंने जो रातें उनकी याद में जागकर बिताई हैं, जो सपने संजोए हैं, जो आंसू बहाए हैं और जो तड़प झेली है, उन सभी भावों को तुम अपने साथ ले जाओ और प्रभु को समर्पित कर दो।

7. "न ले जाओ अगर मुझको, मेरा सामान ले जाना..."
यदि ठाकुर जी मुझे अभी अपने पास बुलाने के लिए तैयार नहीं हैं, तो कोई बात नहीं। लेकिन मेरी इन भावनाओं, आंसुओं और प्रेम रूपी सामान को तो अपने पास रख लें।

8. "मैं भटकूँ दर ब दर प्यारे, जो तेरे मन में आये कर। मेरी जो साँसे अंतिम हो वो निकलें तेरी चौखट पर॥"
हे प्यारे श्यामसुंदर! मैं इस संसार में दर-दर भटक रहा हूँ। अब मेरी डोर आपके हाथ में है, जैसी आपकी इच्छा हो वैसा करें। मेरी बस एक ही अंतिम अभिलाषा है कि जब मेरा अंत समय आए, तो मेरी अंतिम सांस आपकी पावन चौखट पर ही निकले।

9. "‘हरिदासी’ हूँ मैं तेरी मुझे बिन दाम ले जाना..."
मैं आपकी दासी हूँ, आपके चरणों की चेरी हूँ। मुझे खरीदने के लिए आपको कोई मूल्य नहीं चुकाना पड़ेगा, मैं तो बिना किसी शर्त के आपकी शरण में आने को आतुर हूँ।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के शरणागति भाव को समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का यह प्रसिद्ध श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

अर्थ: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा, शोक मत करो।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम कोई जाए जो वृंदावन (Koi Jaye Jo Vrindavan)
मुख्य आराध्य श्री बांके बिहारी लाल (श्री कृष्ण) एवं श्री राधा रानी
रचनाकार / स्वर भैय्या हैप्पी शर्मा (श्री हरीदासी जी), फगवाड़ा
मुख्य रस / भाव करुण रस, विरह भाव, सखी भाव, शरणागति
भाषा सरल हिंदी (ब्रजभाषा के प्रभाव सहित)
उपयुक्त अवसर संध्या आरती, सत्संग, कार्तिक मास, एकादशी, जन्माष्टमी
मुख्य संदेश सांसारिक माया का त्याग कर ईश्वर के चरणों में पूर्ण समर्पण

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन के मूल लेखक और गायक भैय्या हैप्पी शर्मा (श्री हरीदासी जी) हैं, जो फगवाड़ा (पंजाब) के एक प्रसिद्ध कृष्ण भक्त और संकीर्तनकार हैं।

'हरिदासी' शब्द स्वामी हरिदास जी की परंपरा और सखी-भाव को दर्शाता है। इसका अर्थ है कि भक्त स्वयं को श्री राधा-कृष्ण की नित्य दासी मानकर पूर्ण समर्पण के साथ उनकी सेवा करना चाहता है।

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि जब मनुष्य सांसारिक बंधनों (माया के जाल) के कारण स्वयं ईश्वर के पास नहीं जा पाता, तो उसकी सच्ची तड़प, आंसू और पूर्ण शरणागति ही उसे ईश्वर से मिला देती है।

इसका अर्थ है कि भगवान के सामने किसी लंबी चौड़ी प्रार्थना या शब्दों की आवश्यकता नहीं होती। हृदय से निकले सच्चे आंसू ही भक्त की सबसे बड़ी पहचान और उसकी पुकार को व्यक्त करने का सर्वोत्तम माध्यम हैं।

यह भजन मुख्य रूप से वैष्णव संप्रदाय, विशेषकर सखी भाव और हरिदासी संप्रदाय की रस-पद्धति से अत्यधिक प्रभावित है, जिसमें भगवान को अत्यंत आत्मीय भाव से पुकारा जाता है।

इसे संध्या काल में, एकांत साधना के समय या रात्रि के समय शांत वातावरण में गाना सबसे अधिक प्रभावशाली होता है, क्योंकि इस समय मन बाहरी कोलाहल से मुक्त होकर अंतर्मुखी होता है।

यहाँ 'सामान' से तात्पर्य भक्त के भौतिक सामान से नहीं, बल्कि उसके हृदय के भावों, उसकी तड़प, उसके सपनों, उसकी यादों और उसके आंसुओं से है, जो वह भगवान के चरणों में अर्पित करना चाहता है।

भजन में वृंदावन को परम गंतव्य और मुक्ति का द्वार माना गया है। भक्त की अभिलाषा है कि उसकी अंतिम सांसें वृंदावन की चौखट पर ही निकलें, जिससे उसे मोक्ष और प्रभु के नित्य धाम की प्राप्ति हो सके।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। भक्तिलोक की संपादकीय टीम ने इस भजन के पाठ, इसके दार्शनिक पहलुओं और इसके रचयिता के संदर्भों की गहन जांच की है। यह भजन ब्रज साहित्य और आधुनिक कृष्ण भक्ति संगीत का एक अद्भुत संगम है। इसकी प्रत्येक पंक्ति में छिपे गूढ़ अर्थों को वैष्णव दर्शन के आलोक में स्पष्ट किया गया है ताकि पाठकों को न केवल इसके बोल मिलें, बल्कि वे इसके पीछे की दिव्य भावना को भी महसूस कर सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता - शरणागति योग (अध्याय 18)
  • स्वामी हरिदास जी का जीवन चरित्र एवं उनकी अष्टछाप परंपरा
  • श्री हरिदासी संप्रदाय के पारंपरिक संकीर्तन संग्रह
  • भैय्या हैप्पी शर्मा (श्री हरीदासी जी) के आधिकारिक संकीर्तन सत्र

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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