"सुख भी मुझे प्यारे हैं दुख भी मुझे प्यारे हैं" (Sukh Bhi Mujhe Pyare Hai Dukh Bhi Mujhe Pyare Hai) एक अत्यंत ही पावन, मर्मस्पर्शी और दार्शनिक भक्ति रस से परिपूर्ण भजन है। इस भजन को सुप्रसिद्ध गायक प्रकाश गांधी ने अपनी मधुर और भावपूर्ण आवाज में गाकर जन-जन के हृदय में स्थापित कर दिया है। यह भजन ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम, पूर्ण शरणागति (Surrender) और समत्व भाव (Equanimity) की पराकाष्ठा को दर्शाता है। भारतीय वैदिक दर्शन में सुख और दुख को एक ही सिक्के के दो पहलू माना गया है, और यह भजन इसी शाश्वत सत्य को अत्यंत सरल एवं सुबोध भाषा में हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है। जब एक भक्त अपने आराध्य के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है, तब उसके लिए अनुकूलता (सुख) और प्रतिकूलता (दुख) दोनों ही ईश्वर का प्रसाद बन जाते हैं। इस लेख में हम इस पावन भजन के संपूर्ण लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक संदेश, और इसके दार्शनिक पहलुओं का गहराई से विश्लेषण करेंगे।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
सुख भी मुझे प्यारे हैं दुख भी मुझे प्यारे हैं
सुख भी मुझे प्यारे हैं दुःख भी मुझे प्यारे हैं,
छोड़ूँ मैं किसे भगवन दोनों ही तुम्हारे हैं।
दुःख चाहे ना कोई भी सब सुख को तरसते हैं,
सुख में सब हँसते हैं दुःख में सब रोते हैं,
सुख मिले जिसे उसने दुःख भी तो सहारे हैं,
छोड़ूँ मैं किसे भगवन दोनों ही तुम्हारे हैं।
मैं कैसे कहूँ मुझको ये देदे या वो देदे,
जो भी तेरी मर्जी है मर्जी से जो देदे,
मैंने तो तेरे आगे ये हाथ पसारे हैं,
छोड़ूँ मैं किसे भगवन दोनों ही तुम्हारे हैं।
सुख में तेरा शुकर करूँ दुःख में फरियाद करूँ,
जिस हाल में तुम रखो मैं तुम को याद करूँ,
यादों में वियोगी ने ये गीत सवारे हैं,
छोड़ूँ मैं किसे भगवन दोनों ही तुम्हारे हैं।
सुख भी मुझे प्यारे हैं दुःख भी मुझे प्यारे हैं,
छोड़ूँ मैं किसे भगवन दोनों ही तुम्हारे हैं।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का मूल भाव श्रीमद्भगवद्गीता के "समत्वं योग उच्यते" (दुख-सुख में समान रहना ही योग है) के सिद्धांत पर आधारित है। भक्त भगवान से कहता है कि हे प्रभु! मेरे जीवन में आने वाले सुख और दुख दोनों ही मुझे अत्यंत प्रिय हैं, क्योंकि ये दोनों ही आपकी इच्छा और विधान से मुझे प्राप्त हुए हैं। मैं इन दोनों में से किसी एक का भी त्याग नहीं कर सकता, क्योंकि दोनों ही आपके द्वारा भेजे गए उपहार हैं।
संसार का यह नियम है कि कोई भी व्यक्ति दुख नहीं चाहता, हर कोई केवल सुख की कामना करता है। सुख के समय मनुष्य प्रसन्न होता है और हंसता है, जबकि दुख आने पर वह विलाप करता है और रोता है। परंतु एक सच्चा भक्त जानता है कि जिसे आज सुख मिला है, उसे कभी न कभी दुख का सामना भी करना ही होगा। सुख और दुख का यह चक्र निरंतर चलता रहता है। इसलिए, भक्त अपनी इच्छाओं को भगवान की इच्छा में विलीन कर देता है। वह भगवान से यह नहीं मांगता कि मुझे केवल सुख ही मिले, बल्कि वह कहता है कि हे ईश्वर! आपकी जो भी मर्जी हो, आप मुझे वही प्रदान करें। मैंने आपके सामने अपने हाथ फैला दिए हैं और अब मेरा जीवन पूरी तरह से आपके अधीन है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन केवल एक संगीतमय प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक महान कला सिखाता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- पूर्ण शरणागति का संदेश: यह भजन भक्त को सिखाता है कि जब हम अपना अहंकार छोड़कर ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाते हैं, तो हमारे जीवन की सभी चिंताएं समाप्त हो जाती हैं।
- मानसिक शांति का मार्ग: सुख-दुख में समभाव रखने से मन विचलित नहीं होता। यह भजन अशांत मन को सांत्वना और धैर्य प्रदान करता है।
- कृतज्ञता का भाव: भजन की पंक्तियां हमें हर परिस्थिति में ईश्वर का धन्यवाद (शुकर) करने की प्रेरणा देती हैं।
- सरल और सुबोध भाषा: प्रकाश गांधी जी ने इसे अत्यंत सरल और लोक-शैली में गाया है, जिससे यह सीधे हृदय को छूता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन का श्रवण और कीर्तन किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु निम्नलिखित अवसरों पर इसका विशेष महत्व है:
- प्रातः काल की प्रार्थना: सुबह के समय इस भजन को सुनने से मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और पूरे दिन के लिए मानसिक संतुलन बना रहता है।
- संध्या आरती और सत्संग: शाम के समय परिवार के साथ बैठकर या सत्संग में इस भजन का सामूहिक गायन करने से घर का वातावरण भक्तिमय और शांत हो जाता है।
- कठिन परिस्थितियों में: जब जीवन में कोई संकट या दुख आए, तब इस भजन का स्मरण करने से आंतरिक शक्ति और साहस प्राप्त होता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन किसी एक विशिष्ट देवी या देवता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह निराकार और साकार दोनों रूपों में "परमेश्वर" (भगवन) को संबोधित है। यह भजन भगवान कृष्ण, भगवान राम या शिव किसी भी आराध्य के प्रति समर्पित किया जा सकता है। इस भजन के रचयिता ने स्वयं को "वियोगी" के रूप में प्रस्तुत किया है, जो कि ईश्वर के विरह और प्रेम में डूबा हुआ एक भक्त है। संत कबीर, सूरदास और मीराबाई की परंपरा में भी इसी प्रकार के समत्व और समर्पण के भाव देखने को मिलते हैं।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
इस भजन की पृष्ठभूमि पारंपरिक राजस्थानी और उत्तर भारतीय लोक-भक्ति से प्रेरित है। गायक प्रकाश गांधी ने अपनी विशिष्ट गायन शैली के माध्यम से इस पारंपरिक दर्शन को आधुनिक श्रोताओं के लिए सुलभ बनाया है। भजन में प्रयुक्त शब्द "वियोगी" यह दर्शाता है कि इसके मूल लेखक ने सांसारिक मोह-माया से विरक्त होकर, ईश्वर के वियोग और मिलन की तड़प में इन पंक्तियों की रचना की है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें उर्दू के कुछ सुंदर शब्दों जैसे "शुकर" (धन्यवाद) और "फरियाद" (प्रार्थना) का बहुत ही खूबसूरती से समावेश किया गया है। इसकी काव्य शैली "गीतिका" और "पद" शैली पर आधारित है। इसमें अंत्यानुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है (जैसे: प्यारे हैं - तुम्हारे हैं, तरसते हैं - रोते हैं), जो इसे अत्यधिक गेय और कर्णप्रिय बनाता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
इस भजन से हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण जीवन सीख मिलती हैं:
- स्वीकार्यता (Acceptance): जीवन में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उसे ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करना सीखें।
- अहंकार का विसर्जन: "मैं" और "मेरा" के भाव को छोड़कर "तेरा तुझको सौंपता" का भाव अपनाएं।
- धैर्य और संयम: सुख में अति-उत्साहित न हों और दुख में हताश न हों। दोनों ही स्थितियां अस्थायी हैं।
- प्रार्थना की शक्ति: हर हाल में ईश्वर का स्मरण और उनकी यादों में लीन रहना ही जीवन का वास्तविक आनंद है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| भगवन | ईश्वर, परमात्मा, आराध्य | सृष्टि के नियंता और रक्षक |
| तरसते | लालायित होना, इच्छा करना | संसार के लोगों की सुख के प्रति आसक्ति |
| सहारे | सहन करना, स्वीकार करना | दुख को भी ईश्वर का प्रसाद मानकर सहना |
| हाथ पसारे | हाथ फैलाना, याचना करना | ईश्वर के समक्ष पूर्ण समर्पण और याचना |
| शुकर | आभार, धन्यवाद (Gratitude) | सुख के समय ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना |
| फरियाद | पुकार, प्रार्थना (Prayer) | दुख के समय ईश्वर से रक्षा की गुहार लगाना |
| वियोगी | विरही भक्त, लेखक का उपनाम | ईश्वर के प्रेम में लीन रहने वाला साधक |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
पंक्ति: "सुख भी मुझे प्यारे हैं दुःख भी मुझे प्यारे हैं, छोड़ूँ मैं किसे भगवन दोनों ही तुम्हारे हैं।"
भावार्थ: भक्त कहता है कि हे प्रभु, मेरे लिए सुख और दुख दोनों ही समान रूप से प्रिय हैं। मैं इनमें से किसी एक को भी कैसे छोड़ सकता हूँ, क्योंकि ये दोनों ही आपकी मर्जी से मुझे मिले हैं और दोनों पर आपका ही अधिकार है।
पंक्ति: "दुःख चाहे ना कोई भी सब सुख को तरसते हैं, सुख में सब हँसते हैं दुःख में सब रोते हैं, सुख मिले जिसे उसने दुःख भी तो सहारे हैं..."
भावार्थ: इस संसार में कोई भी व्यक्ति दुख नहीं चाहता, सभी केवल सुख की कामना करते हैं। सुख आने पर लोग हंसते-मुस्कुराते हैं और दुख आने पर रोने लगते हैं। लेकिन सत्य तो यह है कि जिसने सुख का आनंद लिया है, उसे दुख भी सहन करना ही पड़ता है। दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
पंक्ति: "मैं कैसे कहूँ मुझको ये देदे या वो देदे, जो भी तेरी मर्जी है मर्जी से जो देदे, मैंने तो तेरे आगे ये हाथ पसारे हैं..."
भावार्थ: भक्त कहता है कि मेरी इतनी बिसात कहाँ कि मैं आपसे मांगूँ कि मुझे यह चाहिए या वह चाहिए। आपकी जो भी मर्जी हो, आप मुझे वही दें। मैंने तो आपके सामने अपने हाथ फैला दिए हैं, अब आप जो भी देंगे, मैं उसे सहर्ष स्वीकार करूँगा।
पंक्ति: "सुख में तेरा शुकर करूँ दुःख में फरियाद करूँ, जिस हाल में तुम रखो मैं तुम को याद करूँ, यादों में वियोगी ने ये गीत सवारे हैं..."
भावार्थ: यदि आप मुझे सुख देंगे, तो मैं आपका धन्यवाद करूँगा। यदि आप मुझे दुख देंगे, तो मैं आपसे ही प्रार्थना करूँगा। आप मुझे जिस किसी भी हाल में रखें, मैं बस हर पल आपको याद करता रहूँ। इसी विरह और यादों के भाव में भक्त 'वियोगी' ने इस सुंदर गीत की रचना की है।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भाव को पुष्ट करने वाला श्रीमद्भगवद्गीता का एक अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक इस प्रकार है:
"सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥"
(श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 2, श्लोक 38)
अर्थ: सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जाओ; इस प्रकार युद्ध करने से तुम पाप को प्राप्त नहीं होओगे।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | सुख भी मुझे प्यारे हैं दुख भी मुझे प्यारे हैं |
|---|---|
| मुख्य गायक | प्रकाश गांधी (Prakash Gandhi) |
| रचयिता / कवि | वियोगी (Viyogi) |
| मुख्य विषय | समर्पण, समत्व भाव, शरणागति |
| भाषा | हिंदी (खड़ी बोली) |
| संगीत शैली | भक्तिमय लोक संगीत |
| उपयुक्त अवसर | दैनिक प्रार्थना, सत्संग, संध्या कीर्तन |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख भक्तिलोक के विद्वान संपादकों द्वारा तैयार किया गया है। सामग्री के संपादन में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि भजन के मूल भाव और दार्शनिक संदेश में कोई त्रुटि न हो। यह सामग्री पूरी तरह से "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" है, जो पाठकों को प्रामाणिक और उच्च गुणवत्ता वाली आध्यात्मिक जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से लिखी गई है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2 - सांख्य योग)
- पारंपरिक वैष्णव भक्ति साहित्य और लोक भजन संग्रह
- प्रकाश गांधी जी के आधिकारिक भक्ति संगीत एल्बम
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