hari bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

मेरे बांके बिहारी लाल तू इतना ना करियो सिंगार(Mere Banke Bihari Lal Tu Itna Na Kariyo Sringar Lyrics in Hindi)

मेरे बांके बिहारी लाल तू इतना ना करियो सिंगार भजन के बोल हिंदी में पढ़ें। श्री बांके बिहारी जी की भक्ति और प्रेम से ओत-प्रोत इस मधुर भजन का आनंद लें।

मेरे बांके बिहारी लाल तू इतना ना करियो सिंगार (Mere Banke Bihari Lal Tu Itna Na Kariyo Sringar Lyrics in Hindi)

श्रेणी: हरी भजन | आधारित: श्री बांके बिहारी लाल जी की अलौकिक छवि एवं ब्रज भक्ति

ब्रजभूमि की पावन एवं रस से सराबोर भूमि पर जब भी श्री बांके बिहारी लाल की दिव्यता और उनके मनोरम श्रृंगार का स्मरण किया जाता है, तो भक्त हृदय में प्रेम और करुणा का एक अनूठा ज्वार उठने लगता है। "मेरे बांके बिहारी लाल तू इतना ना करियो सिंगार" यह अत्यंत लोकप्रिय, मधुर और भावपूर्ण भजन भगवान श्री कृष्ण के बांके बिहारी स्वरूप के प्रति एक अनन्य प्रेमाभक्ति (माधुर्य भाव) का प्रतीक है। इस भजन में भक्त की आत्मीय चिंता और अगाध प्रेम झलकता है, जहाँ वह अपने आराध्य की सुंदरता से मुग्ध होकर उनकी नजर उतरने की कामना करता है। ब्रज के मंदिरों, संकीर्तन मंडलों और घर-घर में गाए जाने वाले इस भजन का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह भजन केवल एक संगीत रचना नहीं, बल्कि भगवान और भक्त के बीच के उस वात्सल्य और सख्य भाव का जीवंत दस्तावेज है जहाँ भक्त अपने प्रभु को बालक या प्रियतम मानकर उनकी हर छोटी-बड़ी बात का ध्यान रखता है। इस विस्तृत गाइड में हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण बोल, इसका गूढ़ अर्थ, भावार्थ, गायन की विधि, और इसके आध्यात्मिक संदेश पर विस्तार से चर्चा करेंगे ताकि साधक इसे पूरी तल्लीनता के साथ अपने जीवन और साधना में उतार सकें।


सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन ॥

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

मेरे बांके बिहारी लाल तू इतना ना करियो सिंगार,
नजर तोहे लग जाएगी प्यारे नजर तोहे लग जाएगी!

तेरी सुरतिया पे मन मोरा अटका,
प्यारा लागे तेरा पीला पटका।
तेरे गले में वैजयंती माल,
तू इतना ना करियो सिंगार नजर तोहे लग जाएगी,
प्यारे नजर तोहे लग जाएगी!

मेरे बांके बिहारी लाल तू इतना ना करियो सिंगार,
नजर तोहे लग जाएगी प्यारे नजर तोहे लग जाएगी!

तेरी मुरलिया पे मन मोरा अटका,
प्यारा लागे तेरा नीला पटका।
तेरे घूंघर वाले बाल,
तू इतना ना करियो सिंगार नजर तोहे लग जाएगी!

तेरी कमरिया पे मन मोरा अटका,
प्यारा लागे तेरा काला पटका।
तेरी टेढ़ी-मेढ़ी चाल,
तू इतना ना करियो सिंगार नजर तोहे लग जाएगी!

मेरे बांके बिहारी लाल तू इतना ना करियो सिंगार,
नजर तोहे लग जाएगी प्यारे नजर तोहे लग जाएगी!

जय गोविंदा जय गोपाला कृष्ण कन्हाई मुरली वाला!

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन साधारण शब्दों में रचित होते हुए भी भक्ति के अत्यंत उच्च शिखर को छूता है। इसका भावार्थ दो स्तरों पर समझा जा सकता है—पहला, एक साधारण भक्त का अपने इष्ट के प्रति वात्सल्य और रक्षात्मक भाव, और दूसरा, दार्शनिक स्तर पर भगवान की मोहनी मूरत के प्रति पूर्ण समर्पण।

भक्त अपने प्रियतम ठाकुर जी (बांके बिहारी) से निवेदन करता है कि हे प्रभु! आप अपनी इस अत्यंत मनमोहक और सुंदर छवि पर इतना अधिक श्रृंगार मत कीजिए। आपकी यह रूप-सुधा इतनी तीव्र और आकर्षक है कि संसार की नजर (नकारात्मक ऊर्जा या ईर्ष्या-भाव) आपको लग सकती है। ब्रज संस्कृति में माताएँ और प्रेमी भक्त अपने प्रिय की सुंदरता से स्वयं भी डर जाती हैं कि कहीं किसी की बुरी नजर न लग जाए। यहाँ भक्त का प्रेम इतना निश्छल और अनन्य है कि वह भगवान को संसार की बुरी नजरों से बचाना चाहता है।

भजन की पंक्तियों में बिहारी लाल के विभिन्न अंगों और वस्त्रों का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है। कभी उनका पीला पटका, कभी नीला पटका, कभी काला पटका, उनके घुंघराले बाल, गले में सुशोभित वैजयंती माला और उनकी वह प्रसिद्ध टेढ़ी-मेढ़ी चाल (त्रभंग मुद्रा)—यह सब मिलकर भक्त के मन को पूरी तरह मोह लेते हैं। भक्त कहता है कि आपकी इन तमाम अदाओं पर मेरा मन अटक गया है, इसलिए आप अपनी इस मादक सुंदरता में थोड़ा संकोच रखें ताकि किसी की नजर न लगे। अंत में 'जय गोविंदा जय गोपाला' का संकीर्तन इस बात का द्योतक है कि रूप के इन सभी आकर्षणों का केंद्र वही परम ब्रह्म श्री कृष्ण हैं। ऐसे पावन भजनों के गायन से साधक का मन अन्यत्र भटकने के बजाय भगवान के चरणों में स्थिर हो जाता है, ठीक वैसे ही जैसे अन्य महान स्तुतियों जैसे श्री बांके बिहारी चालीसा के पाठ से भक्तों को आत्मिक शांति मिलती है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • माधुर्य एवं वात्सल्य रस का समन्वय: इस भजन में भगवान के प्रति सखा, माता और प्रेमी—तीनों भावों का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है।
  • दृश्यात्मक काव्यात्मकता (Visual Imagery): बांके बिहारी के वस्त्रों (पीला, नीला, काला पटका), वैजयंती माला, घुंघराले बालों और टेढ़ी चाल का सजीव चित्रण किया गया है।
  • नजर दोष निवारण की लोक संस्कृति: भारतीय सनातन संस्कृति में सुंदर बालकों और देव मूर्तियों को नजर से बचाने की लोक-परंपरा को इस भजन में बहुत ही सुंदर ढंग से पिरोया गया है।
  • मानसिक एकाग्रता: इस भजन को गाने या सुनने से चंचल मन तुरंत श्री कृष्ण की त्रिभंग मुद्रा में स्थिर हो जाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को किसी भी समय, विशेषकर संध्याकालीन आरती के समय, एकांत साधना में, अथवा किसी सत्संग और संकीर्तन के दौरान गाया जा सकता है। इसे गाने की विधि अत्यंत सरल है:

  1. प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और अपने घर के मंदिर या बांके बिहारी जी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित करें।
  2. प्रिय भगवान को तुलसी दल और मक्खन-मिश्री का भोग अर्पित करें।
  3. पूरी तल्लीनता और ताल के साथ इस भजन की पंक्तियों का उच्च स्वर में गायन करें।
  4. गायकी के अंत में भगवान से अपने मन को उनके चरणों में जोड़े रखने की प्रार्थना करें।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र में ब्रज के प्राणधन, वृंदावन के आराध्य श्री बांके बिहारी लाल (भगवान श्री कृष्ण) हैं। बांके बिहारी जी की मूर्ति त्रिभंग मुद्रा में है, जिसके दर्शन मात्र से जन्म-जन्मांतर के संताप मिट जाते हैं। इस प्रकार के पारंपरिक भजन पीढ़ियों से संतों, महात्माओं और ब्रज के रसिक भक्तों द्वारा गाए जाते रहे हैं, जो भगवान के साथ एक आत्मीय और जीवित संबंध स्थापित करने का माध्यम बनते हैं। श्री हरि के विभिन्न रूपों के स्मरण के लिए साधक श्री हरि स्तोत्र का भी पाठ कर सकते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन लोक परंपरा और ब्रज की सांस्कृतिक धरोहर का एक अमूल्य हिस्सा है। इसे किसी एक प्रसिद्ध कवि की रचना के रूप में सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि यह सदियों से ब्रज के संतों, कीर्तनियाओं और कृष्ण भक्तों के कंठ से प्रवाहित होता रहा है। इसकी भाषा ब्रजभाषा और सरल हिंदी का एक सहज मिश्रण है, जो आम जनमानस के हृदय को तुरंत स्पर्श कर लेती है। लोक-साहित्य में इस प्रकार के पद भगवान के साथ आत्मीयता का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

भजन की भाषा बेहद सरल, मधुर और संगीतात्मक है। इसमें ब्रजभाषा के शब्दों (जैसे- सुरतिया, पटका, कमरिया, चाल) का बहुत ही स्वाभाविक प्रयोग किया गया है। काव्य शैली की दृष्टि से इसमें 'अनुप्रास' और 'पुनरुक्ति' अलंकारों का सुंदर प्रयोग मिलता है जो लय और ताल को और अधिक प्रभावी बनाते हैं। यह शैली श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती है और बिना किसी कठिन प्रयास के अर्थ सीधे हृदय में उतर जाता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  • अहंकार का त्याग: जैसे भगवान अपनी सुंदरता और श्रृंगार के प्रति सहज हैं, वैसे ही मनुष्य को भी बाहरी दिखावे से दूर रहकर अपनी आंतरिक सुंदरता पर ध्यान देना चाहिए।
  • अनन्य प्रेम और सुरक्षा का भाव: ईश्वर के प्रति हमारा प्रेम इतना सच्चा होना चाहिए कि हम उनकी हर वस्तु और हर रूप के प्रति समर्पित हो जाएं।
  • मन की स्थिरता: चंचल मन को यदि किसी एक बिंदु पर टिकाना है, तो वह केवल बांके बिहारी की सुंदर छवि हो सकती है।
  • धार्मिक चेतना को बनाए रखने के लिए भक्तों को समय-समय पर रामचरितमानस के पावन प्रसंगों का भी अध्ययन करना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संदर्भ
बांके बिहारी तीन जगह से मुड़े हुए (त्रिभंग मुद्रा वाले) भगवान कृष्ण वृंदावन के मुख्य आराध्य देव श्री कृष्ण का प्रसिद्ध नाम
सुरतिया सुंदर सूरत या मुखड़ा भगवान का अलौकिक और मोहक रूप
पटका कमर पर बांधने का वस्त्र या दुपट्टा पीला, नीला या काला वस्त्र जो श्रृंगार की शोभा बढ़ाता है
वैजयंती माल विभिन्न प्रकार के विशेष पुष्पों और मणियों की माला भगवान विष्णु और कृष्ण के गले की शोभा बढ़ाने वाली पावन माला
कमरिया कमर का हिस्सा श्री कृष्ण की त्रिभंग मुद्रा की कटि-प्रदेश की सुंदरता

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"मेरे बांके बिहारी लाल तू इतना ना करियो सिंगार..."
भक्त अपने प्रियतम ठाकुर जी से हाथ जोड़कर प्रार्थना करता है कि हे मेरे प्यारे बांके बिहारी! आप अपनी इस अलोकतांत्रिक और सम्मोहक सुंदरता को थोड़ा संभालिए और जरूरत से ज्यादा श्रृंगार मत कीजिए, अन्यथा इस संसार की नजर आपको लग जाएगी।

"तेरी सुरतिया पे मन मोरा अटका, प्यारा लागे तेरा पीला पटका..."
आपका यह मुखड़ा इतना प्यारा है कि मेरा मन इस पर अटक गया है। आपके शरीर पर लिपटा हुआ पीला पटका आपकी सुंदरता में चार चांद लगा रहा है और मेरे नेत्रों को बहुत सुहाता है।

"तेरे गले में वैजयंती माल, तू इतना ना करियो सिंगार..."
आपके गले में सुशोभित वैजयंती माला आपके सौंदर्य को और अधिक बढ़ा रही है, इसलिए हे प्रभु! आप और अधिक श्रृंगार करके अपनी इस सुंदरता को नजर से न बचाएं, ऐसा मेरा भोला मन डरता है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

॥ कृष्ण मंत्र ॥

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"

"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय నమో नमः॥"

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम मेरे बांके बिहारी लाल तू इतना ना करियो सिंगार (Mere Banke Bihari Lal)
आराध्य देवता भगवान श्री बांके बिहारी (श्री कृष्ण)
रचना परंपरा ब्रज की लोक एवं पारंपरिक भक्ति धारा
भाषा ब्रजभाषा मिश्रित सरल हिंदी
प्रमुख विषय / थीम माधुर्य भक्ति, वात्सल्य, रूप-सौंदर्य और रक्षा-भाव
प्रधान भाव अनन्य प्रेम, सुरक्षा और समर्पण
उपयुक्त अवसर संध्या आरती, जन्माष्टमी, होली, और दैनिक सत्संग

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह पावन भजन ब्रज के प्रमुख आराध्य भगवान श्री बांके बिहारी (श्री कृष्ण) के अलौकिक सौंदर्य और उनके श्रृंगार को समर्पित है।

इस भजन का मुख्य भाव माधुर्य और वात्सल्य प्रेम है, जहाँ भक्त अपने इष्ट की अत्यधिक सुंदरता से मोहित होकर उन्हें बुरी नजर से बचाने की कामना करता है।

हाँ, इस भजन को घर पर सुबह या शाम की पूजा, आरती के दौरान या सत्संग में बड़े ही आनंद और भक्ति भाव के साथ गाया जा सकता है।

भजन में बांके बिहारी के पीले, नीले और काले पटके, गले की वैजयंती माला, घुंघराले बालों और उनकी मनमोहक टेढ़ी चाल का सुंदर वर्णन किया गया है।

जब साधक पूरी तल्लीनता और प्रेम के साथ भगवान के रूप-सौंदर्य का गुणगान करता है, तो उसका चंचल मन संसार से हटकर भगवान के चरणों में स्थिर हो जाता है, जिससे असीम मानसिक शांति प्राप्त होती है।

यह भजन मुख्य रूप से ब्रज की लोक-भक्ति परंपरा और संकीर्तन संस्कृति का हिस्सा है, जो श्रीमद्भागवत और कृष्णलीला के प्रेम रस से प्रेरित है।

भजन के अंत में "जय गोविंदा जय गोपाला कृष्ण कन्हाई मुरली वाला!" का जयकारा लगाकर संकीर्तन को पूर्ण किया जाता है।

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संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह आलेख ब्रज की लोक-संस्कृति, संकीर्तन परंपरा और कृष्ण भक्ति साहित्य के पारंपरिक स्रोतों के आधार पर तैयार किया गया है। सामग्री की शुद्धता और भक्ति रस की गरिमा का विशेष ध्यान रखा गया है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • ब्रज की लोक-साहित्य परंपरा एवं संकीर्तन पद संग्रह
  • श्रीमद्भागवत महापुराण (कृष्ण लीला प्रसंग)
  • भक्ति रसामृत सिंधु - श्री रूप गोस्वामी
  • पारंपरिक ब्रज लोकगीत एवं भजन संकलन

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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