hari bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

लुट सके तो लुट ले हरी नाम की लुट दोहे का अर्थ(Lut Sake To Lut Le Hari Nam Ki Lut Dohe Ka Arth in Hindi)

पढ़ें लुट सके तो लुट ले हरी नाम की लुट दोहे का अर्थ(Lut Sake To Lut Le Hari Nam Ki Lut Dohe Ka Arth in Hindi) - Bhaktilok का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिं

"लुट सके तो लुट ले हरी नाम की लुट" मध्यकालीन भारत के महान संत, समाज सुधारक और रहस्यवादी कवि संत कबीरदास जी का एक अत्यंत लोकप्रिय और कालजयी दोहा है। यह दोहा मानव जीवन की क्षणभंगुरता और ईश्वर भक्ति की अनिवार्यता को बहुत ही सरल परंतु मर्मस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत करता है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में नाम-स्मरण (भगवान के नाम का जप) को मोक्ष प्राप्ति का सबसे सुगम मार्ग माना गया है, विशेषकर कलयुग में। संत कबीर इस दोहे के माध्यम से संपूर्ण मानवता को सचेत करते हैं कि यह मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है और समय तेजी से हाथ से फिसलता जा रहा है। जब तक शरीर में सांसें चल रही हैं, तब तक बिना किसी संकोच के भगवान के पावन नाम का आश्रय ले लेना चाहिए। इस लेख में हम इस अद्भुत दोहे का विस्तृत अर्थ, दार्शनिक पृष्ठभूमि, साहित्यिक सौंदर्य और व्यावहारिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता का गहन विश्लेषण करेंगे। यह दोहा न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्कि हमें जीवन के अंतिम सत्य यानी मृत्यु के प्रति भी सजग करता है।

मूल दोहा / साखी | Original Text

लुट सके तो लुट ले, हरी नाम की लुट।
अंत समय पछतायेगा, जब प्राण जायेगे छुट॥

उच्चारण, पाठ एवं संरचना | Pronunciation & Structure

यह दोहा पारंपरिक रूप से "दोहा छंद" में रचित है, जो अर्धसम मात्रिक छंद की श्रेणी में आता है। इसके प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं, जबकि द्वितीय और चतुर्थ चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। इसकी भाषा "सधुक्कड़ी" या "संत भाषा" है, जिसमें खड़ी बोली, ब्रजभाषा, अवधी और राजस्थानी का सुंदर सम्मिश्रण देखने को मिलता है।

इस दोहे का पाठ अत्यंत सुगम और संगीतमय है। इसे विभिन्न हरि भजन और संकीर्तनों में मुख्य ध्रुवपद या टेक के रूप में गाया जाता है। इसकी लयबद्धता और सीधे दिल पर चोट करने वाली शैली के कारण यह सदियों से जन-जन के कंठ में बसा हुआ है।

कठिन शब्दार्थ | Word Meanings

शब्द (Word) सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning) संदर्भगत अर्थ (Contextual Meaning)
लुट (Lut) मुफ्त में मिलना, बिना मूल्य प्राप्त होना ईश्वर की असीम कृपा और नाम जप का सुलभ अवसर लुट ले (Lut Le) शीघ्रता से ग्रहण करना, संचय करना बिना समय गंवाए भगवान के नाम का निरंतर स्मरण करना
हरी नाम (Hari Nam) भगवान विष्णु या नारायण का नाम परमात्मा का पावन नाम, जो समस्त दुखों को हरने वाला है
अंत समय (Ant Samay) जीवन का अंतिम क्षण, मृत्यु काल वह समय जब मनुष्य की शारीरिक शक्तियां समाप्त हो जाती हैं
पछतायेगा (Pachtayega) शोक या ग्लानि करना अवसर खो देने के बाद होने वाला मानसिक संताप
प्राण (Pran) जीवन वायु, श्वास आत्मा का शरीर से संबंध, जीवन ऊर्जा
छुट (Chhut) निकल जाना, मुक्त होना शरीर से प्राणों का प्रयाण होना, मृत्यु होना

पदच्छेद एवं पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ | Line-by-Line Explanation

प्रथम पंक्ति: "लुट सके तो लुट ले, हरी नाम की लुट।"

संत कबीरदास जी कहते हैं कि वर्तमान समय में भगवान श्री हरि के नाम की महिमा चारों ओर फैली हुई है। यह एक ऐसी दिव्य लूट है जिसके लिए किसी धन, संपत्ति या विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं है। यह पूरी तरह से निःशुल्क और सबके लिए सुलभ है। कबीर जी आह्वान करते हैं कि हे मानव! यदि तुझमें सामर्थ्य है, यदि तू सजग है, तो इस अवसर का लाभ उठा और जितनी अधिक मात्रा में हो सके, हरि नाम का संचय कर ले।

द्वितीय पंक्ति: "अंत समय पछतायेगा, जब प्राण जायेगे छुट।"

दूसरी पंक्ति में कबीर जी जीवन की कड़वी सच्चाई को सामने रखते हैं। वे चेतावनी देते हुए कहते हैं कि यदि तुमने इस बहुमूल्य जीवन को केवल भौतिक सुखों और सांसारिक प्रपंचों में गंवा दिया, तो मृत्यु के समय तुम्हारे पास केवल पश्चाताप ही बचेगा। जब यमराज के दूत सामने खड़े होंगे और शरीर से प्राण निकलने वाले होंगे, तब तुम्हें अपनी भूल का अहसास होगा कि तुमने असली धन (हरि नाम) को छोड़कर केवल नश्वर मिट्टी को बटोरा। लेकिन उस समय चाहकर भी तुम कुछ नहीं कर पाओगे।

सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ | Hindi Meaning & Bhavarth

इस दोहे का विस्तृत भावार्थ अत्यंत गहरा और वैराग्य से परिपूर्ण है। संत कबीरदास जी हमें जीवन की नश्वरता और समय के मूल्य का बोध कराते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य का यह शरीर पानी के बुलबुले के समान है, जो कब फूट जाए, कोई नहीं जानता। हम दिन-रात धन, दौलत, परिवार और सामाजिक प्रतिष्ठा के पीछे भागते रहते हैं, जो अंततः इसी पृथ्वी पर छूट जाने वाले हैं। मृत्यु के बाद जीव के साथ केवल उसके द्वारा किए गए सत्कर्म और भगवान का नाम ही जाता है।

कबीर जी ने "लूट" शब्द का प्रयोग बहुत ही सोच-समझकर किया है। सांसारिक जीवन में जब कहीं कोई मूल्यवान वस्तु मुफ्त में बंट रही होती है, तो लोग उसे लूटने के लिए दौड़ पड़ते हैं। कबीर जी कहते हैं कि भगवान का नाम भी एक ऐसा ही अमूल्य खजाना है जो कलयुग में अत्यंत सुलभ है। इसके लिए तुम्हें किसी कठिन तपस्या, यज्ञ या कंदराओं में जाने की आवश्यकता नहीं है। तुम गृहस्थ जीवन में रहते हुए, अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी मन ही मन हरि नाम का जप कर सकते हो।

यदि मनुष्य इस सुलभ अवसर को आलस्य, प्रमाद और अज्ञानता के कारण खो देता है, तो अंत समय में उसे भारी मानसिक पीड़ा और पश्चाताप का सामना करना पड़ता है। उस समय उसे समझ आता है कि उसने हीरा खोकर कंकड़-पत्थर बटोर लिए। इसलिए, बुद्धिमान वही है जो समय रहते जाग जाए और अपने जीवन की प्रत्येक श्वास को हरि सुमिरन में लगा दे।

मुख्य भाव एवं केंद्रीय विचार | Core Theme

इस दोहे का केंद्रीय विचार निम्नलिखित तीन स्तंभों पर आधारित है:

  • भक्ति भाव (Devotion): ईश्वर के नाम की सर्वोच्चता को स्वीकार करना और उनके प्रति पूर्ण समर्पण।
  • वैराग्य (Detachment): सांसारिक वस्तुओं की नश्वरता को पहचानना और उनसे आसक्ति कम करना।
  • समय की महत्ता (Value of Time): वर्तमान क्षण में जीना और आध्यात्मिक साधना को कल पर न टालना।

यह दोहा हमें सिखाता है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल भौतिक समृद्धि नहीं, बल्कि आत्मिक कल्याण और परमात्मा से मिलन होना चाहिए।

आध्यात्मिक व दार्शनिक संदेश | Spiritual & Philosophical Message

दार्शनिक दृष्टिकोण से, यह दोहा सनातन धर्म के "नाम-महिमा" सिद्धांत की पुष्टि करता है। श्रीमद्भागवत महापुराण और गोस्वामी तुलसीदास जी रचित रामचरितमानस में भी बार-बार कहा गया है कि कलयुग में केवल नाम का ही आधार है—"कलयुग केवल नाम अधारा, सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।"

संत कबीरदास जी अद्वैत वेदांत के व्यावहारिक रूप को प्रस्तुत करते हैं। वे जानते हैं कि सामान्य मनुष्य के लिए कठिन योग साधना या वेदांत के अमूर्त सिद्धांतों को समझना कठिन है। इसलिए वे सबसे सरल और प्रभावी मार्ग सुझाते हैं—"हरि नाम का जप"। यह जप मन को शुद्ध करता है, अहंकार को नष्ट करता है और साधक को धीरे-धीरे समाधि की अवस्था तक ले जाता है।

यहाँ "प्राण छूटने" का अर्थ केवल शारीरिक मृत्यु नहीं है, बल्कि अवसर का समाप्त हो जाना भी है। जब तक हमारे पास बुद्धि, विवेक और स्वस्थ शरीर है, तभी तक हम साधना कर सकते हैं। वृद्धावस्था या बीमारी में जब इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं, तब मन को एकाग्र करना अत्यंत कठिन हो जाता है। इसलिए साधना की शुरुआत युवावस्था से ही होनी चाहिए।

भक्ति परंपरा में महत्व | Importance in Bhakti Tradition

भारतीय भक्ति आंदोलन में संतों ने शास्त्रीय जटिलताओं से दूर हटकर लोकभाषा में धर्म का प्रचार किया। कबीरदास जी का यह दोहा इसी आंदोलन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह दोहा जाति, धर्म, वर्ग और लिंग की सीमाओं से परे जाकर हर मनुष्य को ईश्वर से जुड़ने का समान अधिकार देता है।

चाहे वह सगुण उपासक हो या निर्गुण, हरि नाम की महिमा दोनों ही मार्गों में सर्वोपरि है। जैसे श्री बांके बिहारी चालीसा में भगवान के सगुण रूप की स्तुति की जाती है, वैसे ही कबीर जी का यह दोहा हमें उस परम सत्ता के नाम की शक्ति का स्मरण कराता है जो घट-घट में व्याप्त है।

दैनिक जीवन में प्रासंगिकता एवं सीख | Daily Life Relevance & Lessons

आज के आधुनिक और भागदौड़ भरे जीवन में यह दोहा और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। आज का मनुष्य अत्यधिक तनाव, अवसाद और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। इस दोहे से हम निम्नलिखित व्यावहारिक सीख ले सकते हैं:

  1. मानसिक शांति: दिनभर के कार्यों के बीच कुछ मिनट निकालकर हरि नाम का जप करने से मानसिक शांति मिलती है और तनाव दूर होता है।
  2. प्राथमिकताओं का निर्धारण: यह दोहा हमें याद दिलाता है कि काम और पैसा जरूरी हैं, लेकिन वे जीवन का अंतिम सत्य नहीं हैं। हमें अपने आत्मिक विकास के लिए भी समय निकालना चाहिए।
  3. सजगता (Mindfulness): वर्तमान क्षण में जीना सीखें। कल पर अपनी साधना या अच्छे कार्यों को न टालें।
  4. अहंकार की मुक्ति: जब हम यह स्वीकार करते हैं कि अंत समय में सब कुछ यहीं छूट जाएगा, तो हमारा अहंकार स्वतः ही शांत होने लगता है।

प्रतीक, रूपक एवं साहित्यिक शैली | Literary Analysis

कबीरदास जी की साहित्यिक शैली अत्यंत अनूठी है। वे अपनी बात को सीधे और तीखे अंदाज में कहने के लिए जाने जाते हैं। इस दोहे में उन्होंने "लूट" जैसे लोक-प्रचलित शब्द का रूपक के रूप में प्रयोग किया है। आमतौर पर लूट को एक नकारात्मक कृत्य माना जाता है, लेकिन यहाँ कबीर जी ने इसे सकारात्मक और आध्यात्मिक अर्थ दिया है। यह "उलटबांसी" शैली का एक सूक्ष्म रूप है, जहाँ सांसारिक शब्दावली का उपयोग आध्यात्मिक सत्यों को उजागर करने के लिए किया जाता है।

दोहे में "अनुप्रास अलंकार" और "रूपक अलंकार" का सुंदर प्रयोग हुआ है। भाषा की सरलता ही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है, जिसके कारण यह अनपढ़ से लेकर विद्वान तक, सभी को समान रूप से प्रभावित करता है।

दोहा/साखी से मिलने वाली प्रमुख सीख | Key Lessons

  • मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ और क्षणभंगुर है, इसे व्यर्थ के प्रपंचों में नष्ट न करें।
  • ईश्वर का नाम ही एकमात्र शाश्वत सत्य और परम धन है।
  • साधना और सत्कर्म करने का सबसे सही समय "अभी" यानी वर्तमान क्षण है।
  • मृत्यु अटल है, और अंत समय में केवल आध्यात्मिक संचय ही काम आता है।
  • भगवान की कृपा सबके लिए समान रूप से उपलब्ध है, बस उसे ग्रहण करने की इच्छा होनी चाहिए।

एक नजर में | Quick Summary

विषय (Topic) विवरण (Details)
रचना (Composition) लुट सके तो लुट ले हरी नाम की लुट (दोहा)
कवि/संत (Poet/Saint) संत कबीरदास जी
भाषा (Language) सधुक्कड़ी / संत भाषा (खड़ी बोली, ब्रज, अवधी का मिश्रण)
काव्य विधा (Genre) दोहा (साखी)
मुख्य रस (Main Rasa) शांत रस और भक्ति रस
केंद्रीय विषय (Core Theme) नाम-महिमा, वैराग्य, जीवन की नश्वरता
मुख्य संदेश (Key Message) समय रहते ईश्वर के नाम का आश्रय लें, अन्यथा अंत समय में पछताना पड़ेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस अत्यंत प्रसिद्ध और प्रेरणादायक दोहे के रचयिता महान संत कबीरदास जी हैं। उन्होंने अपनी साखियों के माध्यम से समाज को जागृत करने का कार्य किया।

यहाँ "लूट" का अर्थ है कि भगवान का नाम और उनकी कृपा कलयुग में बिना किसी मूल्य के, अत्यंत सुगमता से सबके लिए उपलब्ध है। जैसे कोई मुफ्त की वस्तु लूटने के लिए लोग दौड़ते हैं, वैसे ही मनुष्य को हरि नाम जपने के लिए तत्पर रहना चाहिए।

जब मनुष्य जीवनभर केवल भौतिक सुख-सुविधाओं और धन के पीछे भागता है और ईश्वर भक्ति को भूल जाता है, तो मृत्यु के समय उसे अहसास होता है कि वह खाली हाथ जा रहा है। यही अहसास उसके पछतावे का कारण बनता है।

हरि नाम जपने का सबसे सही समय "वर्तमान क्षण" है। कबीर जी के अनुसार, इसे बुढ़ापे या कल पर नहीं टालना चाहिए, क्योंकि जीवन का कोई भरोसा नहीं है कि कब समाप्त हो जाए।

हाँ, बिल्कुल। कबीरदास जी स्वयं एक गृहस्थ थे। उनका मानना था कि अपने दैनिक कर्तव्यों का पालन करते हुए, मन को ईश्वर में लगाए रखना ही सच्ची साधना है। इसके लिए घर-बार छोड़ने की आवश्यकता नहीं है।

इसका मुख्य संदेश यह है कि मानव जीवन क्षणभंगुर है और मृत्यु अवश्यंभावी है। इसलिए, सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर आत्मा के कल्याण के लिए ईश्वर का स्मरण करना ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए।

कबीर जी की भाषा को "सधुक्कड़ी" या "पंचमेल खिचड़ी" कहा जाता है। वे अपनी बात को बहुत ही सीधे, सरल और व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से लोकभाषा में प्रस्तुत करते हैं।

यह दोहा हमें मानसिक शांति प्रदान करता है, हमारे भीतर से मृत्यु के भय को कम करता है, और हमें जीवन में सही प्राथमिकताओं को चुनने की प्रेरणा देता है ताकि हम तनावमुक्त जीवन जी सकें।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस दोहे की व्याख्या पारंपरिक भक्ति साहित्य, संत कबीर की प्रामाणिक साखियों और विभिन्न विद्वानों के भाष्यों के आधार पर की गई है। इसका उद्देश्य पाठकों को कबीर दर्शन के व्यावहारिक और आध्यात्मिक पहलुओं से परिचित कराना है, ताकि वे अपने दैनिक जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • कबीर ग्रंथावली - बाबू श्यामसुंदर दास
  • श्रीमद्भागवत महापुराण - नाम संकीर्तन महिमा खंड
  • कबीर के बीजक - शास्त्रीय व्याख्या
  • भारतीय भक्ति आंदोलन का इतिहास और संतों की वाणी

संबंधित भजन एवं लेख

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!