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शिव शंकर चले कैलाश बुंदिया पड़ने लगी लिरिक्स (Shiv Shankar Chale Kailash Bundiya Padne Lagi Lyrics in Hindi) - Haryanvi Folk Song Rekha Garg

शिव शंकर चले कैलाश बुंदिया पड़ने लगी लिरिक्स पढ़ें। रेखा गर्ग द्वारा गाया गया यह प्रसिद्ध हरियाणवी लोक भजन शिव-पार्वती के प्रेम का अद्भुत वर्णन करता है।

लोक भजन / हरियाणवी भक्ति

Haryanvi Folk Song Rekha Garg

URL Slug: 2023/04/shiv-shankar-chale-kailash-bundiya.html | Categories: Latest Bhakti Song

"शिव शंकर चले कैलाश बुंदिया पड़ने लगी" एक अत्यंत लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी हरियाणवी लोक भजन है, जो देवादिदेव महादेव और जगत जननी माता पार्वती (गौरा जी) के अलौकिक दांपत्य जीवन, उनके सहज प्रेम और कैलाश गमन के पावन प्रसंग को बड़े ही अनूठे और सरल ग्रामीण शब्दों में चित्रित करता है। प्रसिद्ध लोक गायिका रेखा गर्ग की मधुर, सजीव और कूकती हुई आवाज में गाया गया यह भजन न केवल उत्तर भारत की समृद्ध लोक संस्कृति की महक बिखेरता है, बल्कि शिव-गौरा के पावन रिश्ते को मानवीय भावनाओं के साथ जोड़कर भक्तों के मन को पूरी तरह से शिवमय कर देता है। सावन के पवित्र महीने, हरियाली तीज, शिवरात्रि, विवाह उत्सव और विभिन्न मांगलिक अवसरों पर इस भजन का गायन महिलाओं और श्रद्धालुओं द्वारा विशेष रूप से किया जाता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

शिव शंकर चले कैलाश बुंदिया पड़ने लगी,
भोले बाबा चले कैलाश बुंदिया पड़ने लगी।
शिव शंकर चले कैलाश बुंदिया पड़ने लगी ॥

गौरा जी गोदई हरी हरी मेहंदी,
भोले बाबा ने, भोले बाबा ने,
बोदई भांग के बुंदिया पड़ने लगी,
शिव शंकर चले कैलाश बुंदिया पड़ने लगी ॥

गौरा जी की जाम आई हरी हरी मेहंदी,
भोले बाबा की, भोले बाबा की,
जाम आई भांग के बुंदिया पड़ने लगी,
शिव शंकर चले कैलाश बुंदिया पड़ने लगी ॥

गौरा जी की पक गयी हरी हरी मेहंदी,
भोले बाबा की, भोले बाबा की,
पक गयी भांग के बुंदिया पड़ने लगी,
शिव शंकर चले कैलाश बुंदिया पड़ने लगी ॥

गौरा जी पीसन लागी हरी हरी मेहंदी,
भोले बाबा ने, भोले बाबा ने,
घोटाई भांग के बुंदिया पड़ने लगी,
शिव शंकर चले कैलाश बुंदिया पड़ने लगी ॥

गौरा जी जोड़ने लागी हरी हरी मेहंदी,
भोले बाबा ने, भोले बाबा ने,
जोड़ी जटा के बुंदिया पड़ने लगी,
शिव शंकर चले कैलाश बुंदिया पड़ने लगी ॥

गौरा जी लावण लागी हरी हरी मेहंदी,
भोले बाबा ने, भोले बाबा ने,
रमी भंगिया बुंदिया पड़ने लगी,
शिव शंकर चले कैलाश बुंदिया पड़ने लगी ॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह हरियाणवी लोक भजन केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत के लोक जीवन में रचे-बसे शिव और गौरा के घरेलू और स्नेहपूर्ण संबंधों का एक सुंदर जीवंत चित्र है। भजन की मुख्य कड़ी (मुखड़ा) यह दर्शाती है कि जब देवादिदेव शिव शंकर अपनी अर्धांगिनी माता पार्वती के साथ अपने धाम कैलाश की ओर प्रस्थान करते हैं, तो प्रकृति भी प्रसन्न होकर अमृत रूपी वर्षा (बुंदिया पड़ने लगी) करने लगती है।

भजन के विभिन्न अंतरों में लोक संस्कृति की विशिष्ट छटा देखने को मिलती है। जहाँ एक ओर धरती की सुहागिन नारियां और माता गौरा अपने हाथों और पैरों में 'हरी-हरी मेहंदी' बोने, जामने (उगने), पकने, पीसने, जोड़ने और लगाने के पारंपरिक कार्यों में व्यस्त हैं, वहीं दूसरी ओर वैरागी भोलेनाथ अपनी प्रिय 'भांग' को बोने, घोटने और अपनी जटाओं को सँवारने में रमे हुए हैं। मेहंदी का हरा रंग जहाँ सुहाग, हरियाली और प्रकृति का प्रतीक है, वहीं भांग भोले बाबा की अलौकिक वेशभूषा और मस्त स्वभाव का द्योतक है। जब ये दोनों पावन ऊर्जाएं मिलती हैं, तो शिव-गौरा का कैलाश गमन मानो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए उत्सव बन जाता है और वर्षा की बूंदें उस आनंद की पुष्टि करती हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • लोक संस्कृति का अनूठा संगम: यह भजन हरियाणवी लोक परंपराओं, खान-पान, रीति-रिवाजों और महिलाओं के पारंपरिक उत्सवों को महादेव की भक्ति से जोड़ता है।
  • शिव-गौरा का दांपत्य प्रेम: भगवान शिव और माता पार्वती के घरेलू जीवन को बहुत ही सहजता और मिठास के साथ प्रस्तुत किया गया है।
  • प्रकृति का सान्निध्य: सावन महीने की फुहारें, हरी मेहंदी और भांग का प्रसंग पर्यावरण और प्रकृति के साथ भोलेनाथ के गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।
  • भक्ति और आनंद का रस: इस भजन को सुनने और गाने से मन में एक अलोकिक आनंद और सकारात्मकता का संचार होता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस लोक भजन को विशेषकर निम्नलिखित अवसरों पर गाया या सुना जाता है:

  • सावन मास एवं हरियाली तीज: सावन के महीने में जब चारों तरफ हरियाली होती है और वर्षा होती है, तब इस भजन का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
  • शिवरात्रि एवं प्रदोष व्रत: भगवान शिव के व्रतों और जागरण के दौरान महिलाएं इस पारंपरिक गीत को सामूहिक रूप से गाती हैं।
  • विवाह उत्सव एवं महिला संगीत: हरियाणवी संस्कृति में विवाह और मांगलिक कार्यक्रमों के दौरान शिव-पार्वती के प्रसंगों पर आधारित ऐसे लोक गीत गाने की पुरानी परंपरा है।

इसे प्रातःकाल की पूजा के समय, संध्या वंदन में या सत्संग के दौरान ढोलक और मंजीरे की थाप के साथ गाया जाए तो इसका आनंद और प्रभाव और भी अधिक गहरा हो जाता है। आप भगवान शिव की महिमा से जुड़े अन्य ग्रंथों जैसे शिव तांडव स्तोत्र का भी पाठ कर सकते हैं।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity

इस भजन के केंद्र में देवादिदेव भगवान शिव (शंकर) और जगत जननी माता पार्वती (गौरा जी) हैं। सनातन धर्म में शिव को आदि गुरु और वैराग्य का प्रतीक माना गया है, जबकि माता पार्वती प्रकृति, शक्ति और गृहस्थ जीवन की अधिष्ठात्री देवी हैं। इन दोनों का मिलन और कैलाश गमन ब्रह्मांड में संतुलन और प्रेम का संदेश देता है। इस परंपरा को आगे बढ़ाने में हरियाणवी लोक कलाकारों और लोक गायिकाओं का अभूतपूर्व योगदान रहा है जिन्होंने मौखिक परंपराओं को सहेज कर रखा है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह रचना हरियाणवी लोक साहित्य की मौखिक और पारंपरिक शैली पर आधारित है जिसे लोकप्रिय गायिका रेखा गर्ग ने अपनी सुमधुर आवाज और ठेठ हरियाणवी लहजे से अमर कर दिया है। लोक गीतों की यह विशेषता होती है कि वे किसी एक विशेष रचनाकार की सीमा में न बंधकर पूरे समाज की धरोहर बन जाते हैं। रेखा गर्ग ने अपनी गायकी से इसे घर-घर तक पहुँचाया है, जिससे आज यह हर सावन और शिव उत्सव की अनिवार्य पहचान बन चुका है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

भजन की भाषा ठेठ हरियाणवी लोक भाषा (बोलचाल की भाषा) है, जिसमें ग्रामीण परिवेश के शब्दों जैसे 'गोदई', 'जाम आई', 'पक गयी', 'पीसन लागी', 'जोड़ने लागी' और 'रावर भंगिया' का अत्यंत स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। काव्य शैली में 'प्रश्नोत्तर' और 'समानता' (Comparison) का सुंदर प्रयोग किया गया है—जहाँ एक तरफ गौरा जी मेहंदी से जुड़े कार्य कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ भोले बाबा भांग से जुड़े कार्यों में मग्न हैं। यह शैली श्रोताओं के मन में तुरंत एक सुंदर दृश्य उत्पन्न कर देती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  • सहजता और सरलता: ईश्वर को पाने के लिए किसी कृत्रिम दिखावे की नहीं, बल्कि मन की सच्ची सरलता और सहज भाव की आवश्यकता होती है।
  • दांपत्य जीवन में सामंजस्य: शिव और गौरा के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि विपरीत स्वभाव (वैरागी शिव और गृहस्थ माता पार्वती) होने पर भी प्रेम और आपसी समझ से जीवन को आनंदमय बनाया जा सकता है।
  • प्रकृति से जुड़ाव: वर्षा, हरियाली, मेहंदी और भांग जैसे तत्व हमें अपनी संस्कृति और प्रकृति के करीब रहने की प्रेरणा देते हैं।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पदावली सरल अर्थ संदर्भ / प्रसंग
बुंदिया पड़ने लगी वर्षा की फुहारें गिरना कैलाश प्रस्थान के समय आनंदित प्रकृति का वर्णन
गोदई / जाम आई बुआई होना / उगना मेहंदी और भांग के पौधों का उगना
पीसन लागी / घोटाई पीसना / रगड़ना हाथों के लिए मेहंदी पीसना और भोले के लिए भांग घोटना
रमी भंगिया भांग के नशे में मग्न होना भोलेनाथ का मस्त और अलौकिक स्वरूप

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"शिव शंकर चले कैलाश बुंदिया पड़ने लगी..."
जब देवादिदेव महादेव अपनी प्रिय पत्नी माता पार्वती के साथ अपने धाम कैलाश पर्वत की ओर बढ़ते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि आकाश से अमृत रूपी वर्षा की बूंदें गिरने लगी हों। यह प्रकृति के हर्षोल्लास का प्रतीक है।

"गौरा जी गोदई हरी हरी मेहंदी, भोले बाबा ने बोदई भांग के..."
लोक शैली में वर्णन है कि एक तरफ जहाँ माता गौरा अपने सुहाग और श्रृंगार के लिए हरी-हरी मेहंदी की बुआई कर रही हैं, वहीं भोलेनाथ अपनी प्रिय भांग की फसल उगाने और तैयार करने में तल्लीन हैं। यह दोनों के परस्पर पूरक स्वरूप को दर्शाता है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस पावन भजन के श्रवण के साथ भगवान शिव के मूल पंचाक्षर मंत्र का स्मरण करना अत्यंत फलदायी होता है:

ॐ नमः शिवाय ॥

इसके साथ ही महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी शिव कृपा प्राप्ति के लिए सर्वोत्तम माना गया है। आप संपूर्ण अनुष्ठान के लिए श्री हनुमान चालीसा का भी पाठ कर सकते हैं।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम शिव शंकर चले कैलाश बुंदिया पड़ने लगी
ार्य / आराध्य भगवान शिव एवं माता पार्वती (गौरा जी)
गायक / कलाकार रेखा गर्ग (Rekha Garg)
भाषा / शैली हरियाणवी लोक भाषा (Haryanvi Folk Song)
मुख्य विषय शिव-गौरा दांपत्य प्रेम और कैलाश गमन
भक्ति भाव लोक आनंद, उल्लास और समर्पण
उपयुक्त अवसर सावन मास, हरियाली तीज, शिवरात्रि एवं सत्संग

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह प्रसिद्ध हरियाणवी लोक भजन लोकप्रिय लोक गायिका रेखा गर्ग (Rekha Garg) द्वारा अपनी मधुर आवाज में गाया गया है।

इस भजन का मुख्य विषय भगवान शिव और माता पार्वती (गौरा जी) के घरेलू जीवन, हरी मेहंदी, भांग और उनके कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान के सुंदर दृश्यों का चित्रण करना है।

सावन के पवित्र महीने, हरियाली तीज, महाशिवरात्रि और महिला संगीत या सत्संग के अवसरों पर इस भजन को बहुत चाव से गाया जाता है।

इसका अर्थ वर्षा की फुहारें या अमृत रूपी बूंदें गिरने से है, जो शिव-गौरा के मिलन और कैलाश गमन पर प्रकृति के आनंद को दर्शाती हैं।

हाँ, यह हरियाणवी लोक संस्कृति और परंपराओं पर आधारित एक पारंपरिक शैली का भजन है जिसे आधुनिक समय में मंचों और ऑडियो एलबम के माध्यम से लोकप्रिय बनाया गया है।

मेहंदी माता गौरा के सुहाग और हरियाली का प्रतीक है, जबकि भांग भगवान शिव के वैरागी और मस्त स्वभाव का प्रतीक है।

इसे सुनने से मन शांत होता है, सांस्कृतिक जड़ें मजबूत होती हैं और भगवान शिव व माता पार्वती की कृपा से दांपत्य जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।

निश्चित रूप से! यह ढोलक और मंजीरे की थाप के साथ महिलाओं द्वारा समूह में गाए जाने वाला एक श्रेष्ठ हरियाणवी सोहर या लोक भजन है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तिलोक (Bhaktilok) पर प्रकाशित यह सामग्री पारंपरिक लोक साहित्य, श्रुति परंपरा और प्रामाणिक सांस्कृतिक संदर्भों पर आधारित है। इस आलेख को हमारे विद्वान संपादकों द्वारा शिव भक्ति और हरियाणवी लोक संस्कृति के प्रेमियों के लिए तैयार किया गया है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • हरियाणवी लोक साहित्य और पारंपरिक लोक गीत संग्रह
  • शिव पुराण एवं पौराणिक दांपत्य प्रसंग
  • क्षेत्रीय लोक गायिका रेखा गर्ग के लोकप्रिय भजन एलबम
  • सनातन धर्म की लोक संस्कृति और व्रत परंपराएं
श्रेणियां: Latest Bhakti Song

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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