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किरण सिंह का देवीगीत पचरा ( Kiran Singh Ka Devi Pachara Geet) - Devigeet Bhakti Song Mata Ka Bhajan

पढ़ें किरण सिंह का देवीगीत पचरा ( Kiran Singh Ka Devi Pachara Geet) - Devigeet Bhakti Song Mata Ka Bhajan - BhaktiLok का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भ

भोजपुरी लोक संस्कृति और लोक संगीत में 'पचरा' (Pachara) केवल एक गीत नहीं, बल्कि आदिशक्ति मां दुर्गा, शीतला माता और विंध्यवासिनी देवी के प्रति अगाध श्रद्धा, समर्पण और ग्रामीण जीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। सुप्रसिद्ध लोक गायिका किरण सिंह द्वारा गाया गया देवीगीत पचरा (Kiran Singh Ka Devi Pachara Geet) इसी पावन परंपरा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह भजन श्रोताओं को सीधे उस दिव्य और शांत वातावरण में ले जाता है जहाँ नीम की ठंडी छाँव में मैया का झूला झूलता है। इस विस्तृत लेख में हम इस पारंपरिक देवीगीत के गहरे आध्यात्मिक अर्थ, इसकी काव्य शैली, भोजपुरी लोक परंपरा में पचरा का महत्व और इसके गायन-श्रवण से मिलने वाले मानसिक व आध्यात्मिक लाभों पर एक विद्वतापूर्ण चर्चा करेंगे।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

मंगलाचरण व मुखड़ा:
निमिया के डाढ़ मैया लावेली झुलनवा की झूलेली ना।
झूलेली मोरी मैया मोरी दुलरी की झूलेली ना॥
निमिया के डाढ़ मैया लावेली झुलनवा की झूलेली ना...

अंतरा १:
कवन फूल फूले आधी रात, कवन फूल भिनसारे हो?
कवन फूल फूले मैया के दरबार, जे चढ़े भिनसारे हो?
अड़हुल फूल फूले आधी रात, चमेली फूल भिनसारे हो।
मलिया के फूल फूले मैया के दरबार, जे चढ़े भिनसारे हो॥
निमिया के डाढ़ मैया लावेली झुलनवा की झूलेली ना...

अंतरा २:
काहे के तोरी बनल बा खड़ौआ, काहे के तोरी डोरी हो?
काहे के तोरी बनल बा झुलनवा, जे झूले मोरी माई हो?
चंदन के तोरी बनल बा खड़ौआ, रेशम के तोरी डोरी हो।
निमिया के बनल बा झुलनवा, जे झूले मोरी माई हो॥
निमिया के डाढ़ मैया लावेली झुलनवा की झूलेली ना...

अंतरा ३:
कवन भक्त मैया के कलसा धरेला, कवन करेला आरती हो?
कवन भक्त मैया के चँवर डोलावे, जे सेवा करेला हो?
सकल जगत मैया के कलसा धरेला, पंडित करेला आरती हो।
सेवक जन मैया के चँवर डोलावे, जे सेवा करेला हो॥
निमिया के डाढ़ मैया लावेली झुलनवा की झूलेली ना...

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

किरण सिंह द्वारा प्रस्तुत इस देवीगीत पचरा में प्रकृति और परमात्मा के सुंदर समन्वय को दर्शाया गया है। यहाँ प्रत्येक अंतरे का विस्तृत भावार्थ प्रस्तुत है:

मुखड़े का भावार्थ

गीत की शुरुआत नीम के पेड़ की डाल पर लगे झूले से होती है। भोजपुरी लोक आस्था में नीम के पेड़ को शीतला माता का साक्षात निवास स्थान माना जाता है। भक्त गाता है कि हे मैया! आपने नीम की डाल पर अपना झूला लगाया है और आप उस पर आनंदपूर्वक झूल रही हैं। हमारी अत्यंत दुलारी और करुणामयी माता नीम की शीतल छाँव में झूला झूलकर अपने भक्तों को आशीर्वाद दे रही हैं।

प्रथम अंतरे का भावार्थ

इस अंतरे में एक सुंदर काव्यात्मक प्रश्नोत्तर शैली का प्रयोग किया गया है। भक्त पूछता है कि वह कौन सा फूल है जो आधी रात को खिलता है, वह कौन सा है जो सुबह (भिनसारे) खिलता है, और वह कौन सा दिव्य पुष्प है जो माता के दरबार में खिलता है और सुबह-सुबह उनके चरणों में अर्पित किया जाता है? इसका उत्तर देते हुए कहा गया है कि अड़हुल (गुड़हल) का लाल फूल आधी रात को खिलता है, चमेली का सुगंधित फूल सुबह खिलता है, और माली द्वारा लाया गया श्रद्धा का पुष्प माता के दरबार में खिलता है, जिसे भक्त सुबह-सुबह देवी के चरणों में अर्पित करते हैं।

द्वितीय अंतरे का भावार्थ

यहाँ माता के दिव्य स्वरूप और उनके आभूषणों व झूले की पवित्रता का वर्णन है। भक्त पूछता है कि हे माता! आपकी खड़ाऊँ (पादुका) किस धातु या लकड़ी की बनी है, और आपके झूले की डोरी किस धागे से बनी है? माता का झूला किस वृक्ष की डाल पर लगा है? उत्तर में कहा गया है कि माता की खड़ाऊँ पवित्र चंदन की लकड़ी से बनी है, उनके झूले की डोरी अत्यंत कोमल और मूल्यवान रेशम से बनी है, और उनका झूला औषधीय गुणों से भरपूर नीम के पेड़ पर लगा है। यह दर्शाता है कि देवी की पूजा में केवल सबसे शुद्ध और प्राकृतिक वस्तुओं का ही उपयोग किया जाता है।

तृतीय अंतरे का भावार्थ

अंतिम अंतरे में सामूहिक भक्ति और सेवा भाव को दर्शाया गया है। भक्त पूछता है कि माता के कलश की स्थापना कौन करता है, उनकी आरती कौन उतारता है, और उन पर चँवर कौन डुलाता है? उत्तर अत्यंत सुंदर है—संपूर्ण संसार (सकल जगत) माता के कलश की स्थापना करता है, ज्ञानी पंडित उनकी शास्त्रीय विधि से आरती करते हैं, और उनके अनन्य सेवक उन पर श्रद्धा का चँवर डुलाते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि माता की भक्ति में अमीर-गरीब, ज्ञानी-अज्ञानी सभी एक समान हैं।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस देवीगीत पचरा की मुख्य भावना 'वात्सल्य' और 'पूर्ण शरणागति' है। भोजपुरी लोकगीतों में देवी को एक अत्यंत शक्तिशाली शासक के रूप में नहीं, बल्कि घर की एक ममतामयी माता या कुलदेवी के रूप में देखा जाता है जो अपने बच्चों के दुखों को दूर करने के लिए नीम की छाँव में आती हैं।

  • प्रकृति से जुड़ाव: यह गीत हमें सिखाता है कि ईश्वर का वास भव्य मंदिरों के साथ-साथ प्रकृति के कण-कण में, विशेषकर नीम जैसे जीवनदायी वृक्षों में है।
  • सरलता और पवित्रता: चंदन, रेशम, अड़हुल का फूल और नीम की डाल—ये सभी वस्तुएं सादगी और प्राकृतिक शुद्धता का संदेश देती हैं।
  • सामूहिकता: 'सकल जगत' द्वारा कलश स्थापना की बात कहकर यह गीत सामाजिक समरसता और एकता का संदेश देता है।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण बिंदु (Parameter) जानकारी (Details)
गीत का नाम (Song Name) किरण सिंह का देवीगीत पचरा (Kiran Singh Ka Devi Pachara Geet)
गायिका (Singer) किरण सिंह (Kiran Singh)
गीत की शैली (Genre) भोजपुरी देवी पचरा (Bhojpuri Devi Pachara)
मुख्य भाषा (Language) भोजपुरी (Bhojpuri)
मुख्य विषय (Theme) माता रानी की आराधना, प्रकृति पूजा और समर्पण
उपयुक्त अवसर (Occasion) नवरात्रि, चैत्र नवरात्रि, शीतला पूजा, पारिवारिक मांगलिक कार्य

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

भोजपुरी लोक संगीत के क्षेत्र में किरण सिंह एक अत्यंत प्रतिष्ठित नाम हैं। उन्होंने पारंपरिक लोक धुनों को बिना उनकी मौलिकता खोए आधुनिक श्रोताओं तक पहुँचाने का सराहनीय कार्य किया है। इस पचरा गीत में उनकी सुरीली और गंभीर आवाज ने भक्ति रस को दोगुना कर दिया है। उनके गायन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे शब्दों के उच्चारण में भोजपुरी माटी की सोंधी महक को बनाए रखती हैं, जिससे सुनने वाले के मन में सीधे श्रद्धा का भाव जाग्रत हो जाता है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

कठिन शब्द (Word) सरल हिंदी अर्थ (Meaning) सांस्कृतिक संदर्भ (Context)
निमिया (Nimiya) नीम का पेड़ शीतला माता का निवास स्थान माना जाने वाला पवित्र वृक्ष।
डाढ़ (Daadh) पेड़ की डाल या शाखा प्रकृति और देवी के जुड़ाव का प्रतीक।
भिनसारे (Bhinsare) भोर का समय / ब्रह्ममुहूर्त पूजा-अर्चना के लिए सबसे पवित्र समय।
अड़हुल (Adahul) गुड़हल का फूल देवी दुर्गा का अत्यंत प्रिय लाल पुष्प।
खड़ौआ (Khadoua) लकड़ी की पादुका (खड़ाऊँ) प्राचीन काल में संतों और देवताओं द्वारा धारण की जाने वाली चरण पादुका।
चँवर (Chanwar) चँवर गाय के बालों या रेशम से बना पंखा राजसी और दैवीय सेवा का प्रतीक।

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

भोजपुरी भाषी क्षेत्रों (बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड) में 'पचरा' का अत्यधिक सांस्कृतिक महत्व है। यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह एक अनुष्ठानिक लोकगीत है।

१. शीतला माता और आयुर्वेद का संबंध: नीम के पेड़ को आयुर्वेद में 'सर्वरोग निवारिणी' कहा गया है। लोक परंपरा में नीम को शीतला माता का रूप मानकर पूजना वास्तव में पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का एक सुंदर धार्मिक तरीका है।

२. लोक चेतना में देवी का स्वरूप: इस गीत में देवी को किसी दूरस्थ लोक की सत्ता न मानकर अपने ही घर-आँगन में झूला झूलती ममतामयी माँ के रूप में स्वीकारा गया है। यह 'अद्वैत' भाव को दर्शाता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई दूरी नहीं होती।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

यह पारंपरिक देवीगीत हमें कई महत्वपूर्ण व्यावहारिक और आध्यात्मिक सीख देता है:

  1. प्रकृति का सम्मान करें: नीम, फूल और चंदन के माध्यम से यह गीत हमें पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होने और प्रकृति को पूजनीय मानने की प्रेरणा देता है।
  2. अहंकार का त्याग: जब 'सकल जगत' माता की सेवा में हाथ बंटाता है, तो व्यक्ति को अपने सामाजिक स्तर का अहंकार भूलकर सामूहिक प्रार्थना में शामिल होना चाहिए।
  3. सरल जीवन, उच्च विचार: माता का झूला नीम की डाल पर है, जो यह दर्शाता है कि सादगी में ही वास्तविक दिव्यता और शांति वास करती है।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यद्यपि इस गीत को कभी भी सुना जा सकता है, लेकिन पारंपरिक रूप से इसे निम्नलिखित अवसरों पर गाना और सुनना अत्यंत शुभ माना जाता है:

  • शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि: इन नौ दिनों में सुबह और शाम के समय घरों और पंडालों में यह गीत गूंजता है।
  • शीतला अष्टमी (बसौड़ा): इस दिन शीतला माता की विशेष पूजा होती है और नीम के पेड़ के पास बैठकर पचरा गाया जाता है।
  • पारिवारिक अनुष्ठान: मुंडन, जनेऊ या विवाह जैसे शुभ अवसरों पर कुलदेवी की पूजा के समय महिलाएँ पारंपरिक रूप से इस पचरा गीत को गाती हैं।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

मुख्य बिंदु संक्षिप्त विवरण
प्राथमिक देवी (Deity) माँ दुर्गा / शीतला माता
गीत का प्रकार (Type) पारंपरिक भोजपुरी पचरा (Folk Devotional)
मुख्य वाद्य यंत्र (Instruments) ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम
काव्य रस (Rasa) भक्ति रस और शांत रस
मुख्य प्रतीक (Symbolism) नीम का पेड़ (शीतलता और स्वास्थ्य का प्रतीक)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

'पचरा' भोजपुरी लोक संगीत की एक विशेष विधा है जो पूरी तरह से देवी दुर्गा, शीतला माता और अन्य लोक देवियों की आराधना के लिए समर्पित होती है। इसमें देवी के आगमन, उनके झूले और उनकी महिमा का वर्णन होता है।

सनातन और लोक परंपरा में नीम के पेड़ को औषधीय गुणों के कारण अत्यंत पवित्र माना गया है। इसे शीतला माता (जो चेचक और अन्य बीमारियों से रक्षा करती हैं) का साक्षात स्वरूप माना जाता है, इसलिए पचरा में नीम का विशेष महत्व है।

इस मधुर भजन को सुनने से मन को असीम शांति मिलती है, तनाव दूर होता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह हमें अपनी लोक संस्कृति और जड़ों से जोड़े रखता है।

लाल रंग शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक है। अड़हुल का लाल फूल माँ दुर्गा को अत्यंत प्रिय है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, इसे चढ़ाने से देवी शीघ्र प्रसन्न होती हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं।

नहीं, यद्यपि नवरात्रि में इसका महत्व बहुत बढ़ जाता है, लेकिन इसे किसी भी मंगलवार, शुक्रवार, शीतला पूजा या घर के किसी भी मांगलिक कार्य के अवसर पर गाया और सुना जा सकता है।

'भिनसारे' का अर्थ है ब्रह्ममुहूर्त (सुबह ४ से ६ बजे का समय)। इस समय प्रकृति शांत होती है और आध्यात्मिक साधना या भजन गायन के लिए इसे सर्वोत्तम माना जाता है।

किरण सिंह ने कई पारंपरिक पूर्वी देवीगीत, छठ गीत और सोहर गाए हैं, जो ग्रामीण अंचलों में अत्यंत लोकप्रिय हैं। उनका यह पचरा गीत उनके सबसे पसंदीदा भजनों में से एक है।

हाँ, पारंपरिक मान्यता है कि जिस घर में नियमित रूप से देवी के पचरा गीत और मंत्र गूंजते हैं, वहाँ से रोग, शोक और नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं और सुख-समृद्धि का वास होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख लोक संगीत के विशेषज्ञों और वैदिक विद्वानों द्वारा समीक्षित किया गया है। इसमें प्रयुक्त भोजपुरी शब्दों के अर्थ और उनके आध्यात्मिक संदर्भों को पूरी तरह से प्रामाणिक लोक परंपराओं के अनुसार प्रस्तुत किया गया है। यह सामग्री पूरी तरह से मौलिक और ज्ञानवर्धक है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • भोजपुरी लोक साहित्य और लोकगीत परंपरा - डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय
  • शीतला माता पौराणिक कथा एवं लोक मान्यताएं - कल्याण (गीताप्रेस गोरखपुर)
  • पारंपरिक भोजपुरी देवीगीत एवं पचरा संग्रह

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

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