मोहे होरी में कर गयो तंग लिरिक्स (Mohe Hori Me Kar Giyo Tang Lyrics in Hindi) - चित्र विचित्र जी महाराज
प्रस्तुत पावन भजन "मोहे होरी में कर गयो तंग ये रसिया माने ना मेरी" ब्रजमंडल के रसिया और होली के सांस्कृतिक उत्सव का अति सुंदर, मनमोहक और जीवंत चित्रण प्रस्तुत करता है। सुप्रसिद्ध संत एवं भजन सम्राट चित्र विचित्र जी महाराज (Chitra Vichitra Ji Maharaj) की मधुर वाणी में गाया यह राधा-कृष्ण भजन सम्पूर्ण भारत और विश्वभर के वैष्णव भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। फाल्गुन मास के पावन अवसर पर जब बरसाना और नंदगांव की गलियों में प्रेम, भक्ति और आनंद की फुहारें उड़ती हैं, तब ब्रज की गोपियों और सांवरे बांके बिहारी के बीच होने वाली छेड़छाड़ इस भजन का मुख्य भाव बनता है। वैष्णव संप्रदाय, विशेषकर गौड़ीय वैष्णव परंपरा में राधारानी और कृष्ण के इस बाल-किशोर स्वरूप के मधुर रस (Madhuurya Rasa) को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। इस भजन का श्रवण करने मात्र से श्रोता मानसिक रूप से ब्रज की कुंज गलियों और रंगभरी होली के दिव्य वातावरण में पहुंच जाता है। इस व्यापक लेख में हम इस भजन के संपूर्ण बोल (Lyrics), सरल हिंदी अर्थ, भावार्थ, गायन शैली, ब्रज संस्कृति में होली का महत्व और इससे जुड़े विभिन्न आध्यात्मिक पक्षों का गहन अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
मुखड़ा (Refrain):
मोहे होरी में कर गयो तंग ये रसिया,
माने ना मेरी, माने ना मेरी, माने ना मेरी!
मोहे होली में कर गयो तंग...
प्रथम अंतरा:
ग्वाल बालन संग घेर लई मोहे इकली जान के,
भर भर मारे रंग पिचकारी मेरे सन्मुख तान के!
या ने ऐसो, या ने ऐसो, या ने ऐसो मचायो हुरदंग,
ये रसिया माने ना मेरी...
द्वितीय अंतरा:
जित जाऊँ मेरे पीछे डोले जान जान के अटके,
ना माने होरी में कहूं की ये तो गलिन गलिन में मटके!
ना ऐ होरी, ना ऐ होरी, ना ऐ होरी खेलन को ढंग,
ये रसिया माने ना मेरी...
तृतीय अंतरा:
रंग बिरंगे चित्र विचित्र बनाए दिए होरी में,
पिचकारी में रंग रीत गयो भर ले कमोरी ते!
पागल ने, पागल ने, पागल ने छनाए दई भंग,
ये रसिया माने ना मेरी...
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस अद्भुत भजन में ब्रज की गोपी (संभवतः राधारानी या उनकी सखियां) के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण की नटखट लीलाओं का वर्णन किया गया है। गोपी कहती है कि यह सांवरा रसिया (कृष्ण) मुझे होली के अवसर पर अत्यंत परेशान कर रहा है। वह किसी भी प्रकार से मेरी बात सुनने को तैयार नहीं है। ब्रज की इन लीलाओं में कोई लौकिक अहंकार या द्वेष नहीं होता, अपितु यह भक्त और भगवान के बीच का वह निश्चल प्रेम है जिसमें नोकझोंक ही परम आनंद का आधार बन जाती है।
आगे गोपी अपनी व्यथा सुनाते हुए कहती है कि जब वह अकेली थी, तब कृष्ण ने अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ मिलकर उसे घेर लिया। कान्हा ने अपनी पिचकारी भरकर सीधे उसके मुख की ओर निशाना साधा और रंगों की बौछार कर दी। ब्रज की इस पारंपरिक होली में नंदकिशोर ने ऐसा हुरदंग मचाया कि गोपी के लिए वहां से निकलना कठिन हो गया। गोपी जहाँ भी जाती है, कृष्ण उसके पीछे-पीछे जानबूझकर घूमते हैं और गलियों में मटक-मटककर उसे चिढ़ाते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि भक्त चाहे भगवान से कितना भी रूठने का प्रयास करे, अंततः भगवान अपने भक्तों को अपनी लीलाओं में बांध ही लेते हैं। भजन के अंत में गोपी हास्य विनोद में कहती है कि इस पागल कन्हैया ने होली में भांग छानकर और भी अधिक हुड़दंग मचा रखा है, जिससे पूरा ब्रजमंडल रंग और आनंद में सराबोर हो गया है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन केवल एक लोकगीत नहीं है, बल्कि यह वेदांत और भक्ति मार्ग के उस परम रहस्य को उजागर करता है जहाँ ईश्वर और जीव का भेद प्रेम के रंगों में विलीन हो जाता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- माधुर्य भक्ति का सुंदर प्रदर्शन: इसमें भगवान के साथ सखा, प्रेमी और प्रियतम के रूप में संबंध स्थापित किया गया है।
- ब्रज संस्कृति की सजीव झलक: बरसाना, नंदगांव और वृंदावन की होली, पिचकारी, हुरदंग और रंगों के पर्व की संस्कृति का जीवंत चित्रण।
- लोकप्रिय गायन शैली: चित्र विचित्र जी महाराज की अनूठी गायकी और रसिया शैली इसे हर वर्ग के भक्तों के बीच लोकप्रिय बनाती है।
- मानसिक आनंद और तनावमुक्ति: इस भजन को सुनने मात्र से हृदय में आनंद का संचार होता है और सांसारिक चिंताएं दूर हो जाती हैं।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को विशेष रूप से फाल्गुन मास, होली के त्योहार, बरसाना की लठमार होली, और लड्डू मार होली के दिनों में अत्यधिक चाव के साथ गाया और सुना जाता है। इसके अतिरिक्त:
- सांध्यकालीन सत्संग: संध्या के समय मंदिर या घर में होने वाले संकीर्तन में इसे झूमकर गाया जा सकता है।
- श्री राधा-कृष्ण श्रृंगार और उत्सव: किसी भी धार्मिक अनुष्ठान, झांकी दर्शन या भागवत कथा के विश्राम के दौरान इस प्रकार के रसीले भजनों का विशेष स्थान है।
- मानसिक शांति: जब भी मन उदास हो या जीवन में अत्यधिक तनाव हो, इस पावन भजन का श्रवण करने से चित्त प्रसन्न हो जाता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
इस भजन के आराध्य युगल सरकार श्री राधा और कृष्ण हैं, जो प्रेम और आनंद के अधिष्ठाता हैं। इस भजन को अमर बनाने वाले चित्र विचित्र जी महाराज उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध संत और संकीर्तनकार हैं, जिन्होंने अपनी अनूठी शैली से देश-विदेश में ब्रज रस का प्रचार-प्रसार किया है। उनके द्वारा गाए गए ऐसे भजनों से आज की युवा पीढ़ी भी सनातन संस्कृति और ब्रज की धरोहर से जुड़ रही है। आप ब्रज के अन्य पदों के लिए श्री राधेश्याम संकीर्तन भजन और बांके बिहारी जी के पावन दर्शन के लेख भी पढ़ सकते हैं।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
ब्रज की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह उस दिव्य प्रेम की अभिव्यक्ति है जो द्वापर युग से चला आ रहा है। चित्र विचित्र जी महाराज ने पारंपरिक ब्रज भाषा की शब्दावली को आधुनिक संगीत के साथ इस प्रकार पिरोया है कि यह हर आयु वर्ग के श्रोता की जुबान पर चढ़ जाता है। 'मोहे होरी में कर गयो तंग' पंक्ति ब्रज के लोक-साहित्य का एक अभिन्न अंग है, जिसे संतों ने अपने पदों के माध्यम से अमर कर दिया है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा ठेठ ब्रजभाषा और सरल हिंदी का सहज मिश्रण है। इसमें प्रयुक्त शब्द जैसे - 'रसिया', 'हुरदंग', 'कमोरी', 'छनाए दई भंग' ब्रज की संस्कृति की मिट्टी की खुशबू को दर्शाते हैं। काव्य शैली की दृष्टि से इसमें अनुप्रास और पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है जैसे "माने ना मेरी माने ना मेरी" और "पागल ने पागल ने पागल ने"। यह पुनरुक्ति श्रोता के मन में प्रेम के वेग और जिद को प्रभावशाली ढंग से स्थापित करती है.
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
भले ही यह एक नटखट और हास्यरस से परिपूर्ण भजन है, किंतु इसमें एक गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है:
- भगवान के साथ अंतरंग संबंध: ईश्वर से केवल डरने के बजाय उनसे आत्मीय, सखा या प्रियतम का संबंध स्थापित करना ही सच्ची भक्ति है।
- माया और रंग का आवरण: संसार रूपी होली में भ्रम और मोह (रंग) के बीच रहते हुए भी अपने मूल स्वरूप को न भूलना ही साधक का लक्ष्य होना चाहिए।
- आनंद और उत्सव का जीवन: सनातन धर्म में जीवन को एक उत्सव के रूप में जीने की प्रेरणा दी गई है, जिसे यह भजन चरितार्थ करता है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| रसिया | प्रेमी, कान्हा, रंगरसिया | भगवान श्रीकृष्ण के लिए ब्रज में प्रयुक्त प्रेमपूर्ण संबोधन। |
| हुरदंग | शैतानी, हुड़दंग, उपद्रव | होली के दिनों में युवाओं द्वारा किया जाने वाला आनंदमय उपद्रव। |
| कमोरी | मिट्टी का छोटा बर्तन या कटोरा | होली में रंग घोलने या रखने के लिए प्रयुक्त पारंपरिक पात्र। |
| छनाए दई भंग | भांग घोटकर पीना | ब्रज की पारंपरिक होली के संदर्भ में मस्ती और उमंग का प्रतीक। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"मोहे होरी में कर गयो तंग ये रसिया..." - गोपी अपनी सखियों से शिकायत करती है कि यह सांवरा कन्हैया होली के इस पावन पर्व पर मुझे बहुत परेशान कर रहा है और मेरी बिल्कुल नहीं सुन रहा है।
"ग्वाल बालन संग घेर लई मोहे इकली जान के..." - जब मैं अकेली थी, तब उसने अपने सखाओं के साथ मुझे घेर लिया और मुझ पर पिचकारी भरकर रंगों की बौछार कर दी।
"जित जाऊँ मेरे पीछे डोले जान जान के अटके..." - मैं जिस भी गली या मार्ग से निकलती हूँ, वह जानबूझकर मेरे पीछे-पीछे आता है और मुझे छेड़ता है।
"रंग बिरंगे चित्र विचित्र बनाए दिए होरी में..." - चित्र विचित्र जी कहते हैं कि होली के इस हुड़दंग में कान्हा ने सबके चेहरे रंग-बिरंगे कर दिए हैं और अपनी पिचकारी का सारा रंग मुझ पर उड़ेल दिया है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
श्री राधा-कृष्ण की आराधना और ब्रज रस के स्मरण हेतु निम्नलिखित महामंत्र का स्मरण करना अत्यंत फलदायी माना जाता है:
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे॥"
"राधे राधे गोबिन्द राधे, गोबिन्द राधे राधे राधे।"
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | मोहे होरी में कर गयो तंग (Mohe Hori Me Kar Giyo Tang) |
| आराध्य देव | श्री राधा-कृष्ण (युगल सरकार) |
| गायक / कलाकार | चित्र विचित्र जी महाराज (Chitra Vichitra Ji) |
| भाषा | ब्रजभाषा एवं हिंदी |
| संगीत शैली | ब्रज रसिया, संकीर्तन एवं लोक भजन |
| मुख्य भाव | माधुर्य भक्ति, हास्य-विनोद एवं प्रेम |
| उपयुक्त अवसर | होली का त्योहार, फाल्गुन मास, रासलीला एवं सत्संग |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
प्रस्तुत लेख में दिए गए भजन के बोल, अर्थ और व्याख्या को पारंपरिक ब्रज साहित्य और वैष्णव संप्रदाय के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। पाठकों की प्रामाणिकता और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा गया है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- ब्रज के लोकगीत एवं रसिया परंपरा - पारंपरिक साहित्य
- गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के संकीर्तन ग्रंथ
- चित्र विचित्र महाराज संकीर्तन एल्बम एवं लाइव प्रस्तुतियां
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