Krishna Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो भजन लिरिक्स (Are Dwarpalo Kanhaiya Se Keh Do Lyrics in Hindi) - Krishna Bhajan

अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो भजन के लिरिक्स और भावार्थ हिंदी में पढ़ें। श्रीकृष्ण और सुदामा की अटूट मित्रता का यह पावन प्रसंग हृदय को छू लेने वाला है।

"अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो" भारत के सबसे लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी भक्ति गीतों में से एक है। यह भजन भगवान श्रीकृष्ण और उनके परम सखा सुदामा के निश्छल प्रेम, अटूट मित्रता और अनन्य भक्ति की अमर गाथा को जीवंत करता है। श्रीमद्भागवत महापुराण के सुदामा चरित्र प्रसंग पर आधारित यह भजन करुणा रस, वात्सल्य और समर्पण भाव से ओतप्रोत है। जब सुदामा अत्यंत दरिद्रता की स्थिति में अपनी पत्नी सुशीला के आग्रह पर द्वारकाधीश श्रीकृष्ण से मिलने पहुंचते हैं, तब द्वारपालों और सुदामा के बीच का यह संवाद और उसके बाद श्रीकृष्ण का व्याकुल होकर दौड़ना, हर भक्त की आंखों को नम कर देता है। इस लेख में हम इस पावन भजन के संपूर्ण लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक संदेश, और इसके पीछे की पौराणिक कथा का गहन विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो ॥

देखो देखो यह गरीबी यह गरीबी का हाल,
कृष्ण के दर पे यह विश्वास ले के आया हूँ।
मेरे बचपन का दोस्त हैं मेरा श्याम,
यही सोच कर मैं आस ले कर के आया हूँ ॥

अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो,
दर पे सुदामा गरीब आ गया है।
भटकते भटकते ना जाने कहाँ से,
तुम्हारे महल के करीब आ गया है॥

ना सर पे हैं पगड़ी ना तन पे हैं जामा,
बतादो कन्हिया को नाम है सुदामा।
इक बार मोहन से जाकर के कहदो,
मिलने सखा बदनसीब आ गया है॥

सुनते ही दौड़े चले आये मोहन,
लगाया गले से सुदामा को मोहन।
हुआ रुकमनी को बहुत ही अचम्भा,
यह मेहमान कैसा अजीब आ गया है॥

और बराबर पे अपने सुदामा बिठाये,
चरण आंसुओं से श्याम ने धुलाये।
न घबराओ प्यारे जरा तुम सुदामा,
ख़ुशी का समा तेरे करीब आ गया है॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह भक्त और भगवान के बीच के उस अलौकिक संबंध की अभिव्यक्ति है जहां सामाजिक प्रतिष्ठा, धन-दौलत और जाति-पाति का कोई स्थान नहीं होता। भजन की शुरुआत सुदामा जी की आंतरिक मनोदशा से होती है। सुदामा जी अपनी अत्यंत दयनीय स्थिति में भी भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अटूट विश्वास लेकर द्वारका आए हैं। वे द्वारपालों से विनती करते हैं कि वे जाकर उनके सखा कन्हैया को सूचित करें कि उनका बचपन का मित्र सुदामा द्वार पर खड़ा है।

जब श्रीकृष्ण को अपने परम मित्र सुदामा के आगमन की सूचना मिलती है, तो वे मर्यादा, राजसी वैभव और अपनी स्थिति को भूलकर नंगे पैर ही दौड़ पड़ते हैं। यह दृश्य दर्शाता है कि भगवान अपने भक्त के प्रेम के अधीन हैं। वे सुदामा को गले लगाते हैं और उनके फटे-हाल शरीर को देखकर अश्रुधारा बहाने लगते हैं। श्रीकृष्ण सुदामा को अपने सिंहासन पर बैठाते हैं और उनके पैरों को धोने के लिए जल की आवश्यकता ही नहीं पड़ती, क्योंकि उनके आंसुओं से ही सुदामा के पैर धुल जाते हैं। यह अलौकिक प्रेम और करुणा की पराकाष्ठा है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

"अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो" भजन भारतीय जनमानस में एक विशेष स्थान रखता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • सच्ची मित्रता का संदेश: यह भजन संसार को सिखाता है कि सच्ची मित्रता में अमीरी-गरीबी की कोई खाई नहीं होती। श्रीकृष्ण राजा होकर भी अपने दरिद्र मित्र सुदामा को वही सम्मान देते हैं जो किसी सम्राट को दिया जाता है।
  • अनन्य विश्वास: सुदामा का विश्वास अडिग है। वे किसी भौतिक वस्तु की लालसा में नहीं, बल्कि केवल अपने सखा के दर्शन की आस में द्वारका आते हैं।
  • करुणा रस की प्रधानता: इस भजन को गाते या सुनते समय श्रोताओं के मन में करुणा और भक्ति का संचार होता है। श्रीकृष्ण का अश्रु बहाना ईश्वर की मानवीय संवेदना को दर्शाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान के भजन के लिए कोई भी समय वर्जित नहीं है, परंतु इस भजन को विशेष रूप से निम्नलिखित अवसरों पर गाया जाता है:

  • सत्संग और संकीर्तन: किसी भी धार्मिक सत्संग या कृष्ण भजन संध्या में इस भजन का गायन अत्यंत भावपूर्ण माहौल तैयार करता है।
  • जन्माष्टमी उत्सव: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर सुदामा चरित्र के प्रसंग के दौरान इस भजन को सुनना और गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • दैनिक संध्या आरती: संध्या काल में जब परिवार के सदस्य एकत्रित होते हैं, तब इस भजन का श्रवण मन को शांति और समर्पण की भावना प्रदान करता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान विष्णु के पूर्णावतार भगवान श्रीकृष्ण और उनके परम भक्त सुदामा जी को समर्पित है। सुदामा जी सांदीपनि मुनि के आश्रम में श्रीकृष्ण के सहपाठी थे। वे एक परम ज्ञानी, संतोषी और विरक्त ब्राह्मण थे। उन्होंने कभी भी अपनी दरिद्रता की शिकायत भगवान से नहीं की। यह भजन उनकी इसी निस्पृह भक्ति और श्रीकृष्ण की भक्तवत्सलता को उजागर करता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के 80वें और 81वें अध्याय से प्रेरित है। सुदामा जी की पत्नी सुशीला के बार-बार आग्रह करने पर कि "आपके मित्र तो साक्षात लक्ष्मीपति हैं, आप उनसे मिलने क्यों नहीं जाते", सुदामा जी द्वारका की यात्रा पर निकलते हैं। वे अपने साथ भेंट स्वरूप केवल चार मुट्ठी चिवड़ा (पोहा) लेकर जाते हैं। जब वे द्वारका के भव्य महलों को देखते हैं, तो संकोचवश आगे नहीं बढ़ पाते। द्वारपाल उन्हें एक याचक समझकर रोक देते हैं, जिसके बाद यह अमर संवाद घटित होता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और लोक-प्रचलित हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा और खड़ी बोली का सुंदर समन्वय देखने को

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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