Krishna Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

हरी सूंदर नन्द मुकुन्दा भजन लिरिक्स (Hari Sunder Nand Mukunda Lyrics in Hindi) - Radha Krishna Bhajan Krishna Bhajan

श्री राधा-कृष्ण के मधुर भजन 'हरी सुंदर नन्द मुकुन्दा' के संपूर्ण लिरिक्स हिंदी में पढ़ें। भक्ति और प्रेम से ओत-प्रोत इस सुंदर संकीर्तन का आनंद लें।

हरी सुंदर नन्द मुकुन्दा भजन परिचय एवं भक्ति भाव

श्री राधा-कृष्ण के चरणों में समर्पित 'हरी सुंदर नन्द मुकुन्दा भजन लिरिक्स (Hari Sunder Nand Mukunda Lyrics in Hindi)' वैष्णव भक्ति परंपरा का एक अत्यंत पावन, मधुर और हृदयस्पर्शी संकीर्तन पद है। यह भजन ब्रजमंडल के प्रांगण में गूंजने वाले उन दिव्य भावों की अभिव्यक्ति है, जहाँ भक्त अपने आराध्य भगवान श्री कृष्ण को उनके नंदबाबा के दुलारे रूप और परम सुंदर स्वरूप के माध्यम से पुकारता है। सनातन धर्म और विशेषकर गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय में राधा और कृष्ण का प्रेम कोई साधारण लौकिक आकर्षण नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा (राधा रूपी भक्त) और परमात्मा (कृष्ण रूपी अनंत ब्रह्म) के मिलन का शाश्वत प्रतीक है। इस भजन का मुख्य भाव (Mood/Bhava) माधुर्य भक्ति, अनन्य समर्पण, और विरह-मिलन की सुमधुर अनुभूति से ओत-प्रोत है। जब साधक या भक्त इस भजन का गायन या श्रवण करता है, तो उसका मन वृंदावन की कुंज गलियों, यमुना के तट और कदंब की छांव में पहुँच जाता है। प्रातःकालीन बेला में, संध्या वंदन के समय, अथवा किसी भी विशेष सत्संग और संकीर्तन उत्सव (जैसे जन्माष्टमी, राधाष्टमी या छप्पन भोग) के अवसर पर इस भजन को गाने से मन को असीम शांति और अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है। यह भजन न केवल वाणी को पवित्र करता है, बल्कि साधक के हृदय में भगवान के प्रति गाढ़ प्रेम और अटूट विश्वास का संचार करता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

स्थायी (मखड़ा):

हरी सुंदर नन्द मुकुन्दा, हरि सुंदर नन्द मुकुन्दा,
राधे री राधे, राधे राधे राधे...
हरी सुंदर नन्द मुकुन्दा, हरि सुंदर नन्द मुकुन्दा।

पहला अंतरा:

वृंदावन की कुंज गलिन में, बाजे मुरुरिया सुहानी,
सुनके तान सुधि-बुधि खोई, राधा रानी की बानी।
श्याम बिहारी बंसी बजावें, संग में राधिका झूमे,
चरण कमल पर भ्रमर बने हम, चरणों को हम चूमें।
हरी सुंदर नन्द मुकुन्दा, हरि सुंदर नन्द मुकुन्दा।

दूसरा अंतरा:

नंद बाबा के आंगन डोले, यशोदा के दुलारे,
गोप-गोपिका सब मिल गावें, भाग्य हमारे-तुम्हारे।
दर्शन दे दो हे दुख भंजन, पीतंबर धारी,
तुम्हरे बिना एक पल लागे, युग जैसी भारी।
हरी सुंदर नन्द मुकुन्दा, हरि सुंदर नन्द मुकुन्दा।

तीसरा अंतरा:

राधे-कृष्ण की जोड़ी पावन, जग का दुःख हरती,
जो भी इनका नाम पुकारे, उसकी नाव तरती।
दीन-दुखी पर दया करो प्रभु, अपनी शरण लगाओ,
'भक्तलोक' की विनती सुन लो, दर्शन हमें कराओ।
हरी सुंदर नन्द मुकुन्दा, हरि सुंदर नन्द मुकुन्दा,
राधे री राधे, राधे राधे राधे...
हरी सुंदर नन्द मुकुन्दा, हरि सुंदर नन्द मुकुन्दा।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

प्रस्तुत भजन 'हरी सुंदर नन्द मुकुन्दा' का भावार्थ अत्यंत गंभीर और आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध है। भजन के स्थायी भाग में भगवान श्री कृष्ण को 'नंद मुकुन्दा' कहकर संबोधित किया गया है। 'नंद' का अर्थ है आनंदित करने वाले तथा बाबा नंद के पुत्र, और 'मुकुन्दा' का अर्थ है मुक्ति या मोक्ष प्रदान करने वाले। इसके तुरंत बाद 'राधे री राधे' का उच्चारण इस सत्य को स्थापित करता है कि भगवान कृष्ण और श्री राधा रानी एक ही तत्व के दो रूप हैं। बिना राधा के कृष्ण की आराधना अधूरी मानी जाती है।

पहले अंतरे में वृंदावन की कुंज गलियों और वहाँ बजने वाली मुरली का वर्णन है। मुरली की वह मादक तान सुनकर राधा रानी और समस्त गोपियाँ मंत्रमुग्ध हो जाती हैं। भक्त यह प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! हम आपके उन चरण कमलों के भ्रमर बन जाएं और निरंतर आपके चरणों का स्मरण करते रहें।

दूसरे अंतरे में नंद बाबा के आंगन और माता यशोदा के लाल का बालरूप झलकता है। भक्त अपनी व्याकुलता प्रकट करते हुए कहता है कि हे पीतांबर धारी! आपके दर्शन के बिना जीवन का एक-एक पल एक युग के समान भारी प्रतीत होता है। अंत में, राधा-कृष्ण की महिमा का गुणगान करते हुए साधक अपनी दीनता स्वीकार करता है और शरणागत होकर भवसागर से पार लगाने की विनती करता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस दिव्य भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे वैष्णव समाज और संकीर्तन प्रेमियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय बनाती हैं:

  • युगल उपासना का केंद्र: यह भजन केवल श्री कृष्ण तक सीमित न रहकर श्री राधा और कृष्ण की संयुक्त युगल उपासना (Yugal Upasana) पर बल देता है।
  • माधुर्य भाव की प्रधानता: इसमें दास्य और सख्य भाव के साथ-साथ माधुर्य भाव की पराकाष्ठा देखने को मिलती है, जहाँ भक्त स्वयं को पूर्ण रूप से आराध्य के प्रति समर्पित कर देता है।
  • संगीत और लेयबद्धता: इसकी शब्दावली इतनी सरल और लयबद्ध है कि नौसिखिया गायक और संगीतकार भी इसे आसानी से ढोलक, मंजीरे और हारमोनियम के साथ गा सकते हैं।
  • मानसिक शांति और सकारात्मकता: इसके नियमित गायन से मन का संताप दूर होता है और हृदय में भक्ति रस का प्रवाह होता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भक्ति ग्रंथों और परंपरा के अनुसार किसी भी संकीर्तन को करने के लिए विशेष नियमों और पवित्रता का ध्यान रखा जाता है:

  • उत्तम समय: ब्रह्म बेला (प्रातःकाल 4 से 6 बजे) या संध्या काल (गोधूलि बेला) में इस भजन का गायन अत्यंत फलदायी होता है।
  • विशेष अवसर: जन्माष्टमी, राधाष्टमी, एकादशी, पूर्णिमा, या किसी भी सत्संग और धार्मिक अनुष्ठान के दौरान इसका सामूहिक गान वातावरण को पवित्र कर देता है।
  • गायने की विधि: स्नान आदि से निवृत्त होकर, भगवान श्री राधा-कृष्ण के विग्रह या चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर, तुलसी माला या कर-कमलों से ताल देते हुए प्रेमपूर्वक इस भजन का स्मरण करना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र में ब्रज के प्राणधन, अखिल ब्रह्मांड नायक भगवान श्री कृष्ण और उनकी आह्लादिनी शक्ति स्वरूपा जगतजननी श्री राधा रानी हैं। गौड़ीय वैष्णव परंपरा के आचार्यों जैसे श्री चैतन्य महाप्रभु, रूप गोस्वामी और वृंदावन के अष्टछाप के संतों ने इसी मधुर भाव से भगवान की उपासना की है। यह भजन उसी प्राचीन संत परंपरा की एक सुंदर और जीवंत कड़ी है जो आज भी घर-घर में गूंजती है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

लोक-कल्याण और भक्ति के प्रसार के लिए संतों और पद-रचैयाओं ने समय-समय पर ऐसे पदों की रचना की है। 'हरी सुंदर नन्द मुकुन्दा' भजन ब्रजभाषा और सरल हिंदी के संमिश्रण से तैयार किया गया है। इसकी पृष्ठभूमि ब्रज की लोक संस्कृति, रासलीला और संकीर्तन परंपरा से जुड़ी है, जहाँ भक्त भगवान को अपने सखा, पुत्र या प्रियतम के रूप में निहारता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल हिंदी, ब्रजभाषा के शब्दों से सुसज्जित है। इसमें अनुप्रास और यमक अलंकारों की सहज छटा देखने को मिलती है। 'कुंज गलिन', 'मुरुरिया', 'सुहानी' जैसे तद्भव और ब्रजभाषी शब्द इसकी मिठास को और अधिक बढ़ा देते हैं। काव्य शैली गेय (Singable) है, जिसे बच्चों से लेकर वृद्ध तक आसानी से गुनगुना सकते हैं।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल शब्दों का संकलन नहीं है, बल्कि जीवन के गहरे आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करता है:

  • अहंकार का त्याग: जैसे गोपियाँ और राधा रानी अपनी सुधि-बुधि खोकर कृष्णमय हो जाती हैं, वैसे ही साधक को भी अपने अहंकार का त्याग कर प्रभुमय होना चाहिए।
  • नाम स्मरण की शक्ति: 'राधे-कृष्ण' का नाम संसार के सभी दुखों और विकारों को नष्ट करने वाला महामंत्र है।
  • अटूट विश्वास: कठिन समय में भी ईश्वर पर भरोसा बनाए रखना और निरंतर उनका स्मरण करना ही सच्ची भक्ति है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पदावली सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
नंद मुकुन्दा नंद बाबा के पुत्र और मुक्तिदाता भगवान श्री कृष्ण का परम रूप
कुंज गलिन वृंदावन की लता-पताओं से घटी संकरी गलियां दिव्य लीलाओं का पवित्र स्थल
मुरुरिया मुरली / बंसी परमात्मा की वह पुकार जो जीवात्मा को आकर्षित करती है
सुधि-बुधि बाह्य ज्ञान और होश लौकिक संसार के बंधनों से मुक्ति
पीतांबर धारी पीले वस्त्र धारण करने वाले श्री कृष्ण का स्वरूप

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"हरी सुंदर नन्द मुकुन्दा..." - इस पंक्ति में भगवान के सौंदर्य और उनके परम उदार स्वभाव का स्मरण किया गया है।

"राधे री राधे, राधे राधे राधे..." - यहाँ राधा नाम की महिमा गाई गई है, क्योंकि वैष्णव मत में राधा के बिना कृष्ण की प्राप्ति असंभव है।

"वृंदावन की कुंज गलिन में, बाजे मुरुरिया सुहानी..." - वृंदावन के कुंजों में बजने वाली बांसुरी की तान पूरे ब्रह्मांड को मोह लेती है।

"तुमहरे बिना एक पल लागे, युग जैसी भारी..." - भगवान के विरह में एक पल भी युग के समान प्रतीत होता है, जो अनन्य प्रेम का प्रतीक है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

श्री राधाकृष्ण श्लोक:

"वृन्दावनाद्भुते च एव राधिका रमतां सदा。
कृष्णस्य प्रीयते यस्तु तस्मै नमो नमः।।"

अर्थ: जो वृंदावन में अद्भुत रूप से रमण करती हैं और जो श्री कृष्ण को अत्यंत प्रिय हैं, उन श्री राधा रानी को बारंबार नमस्कार है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम हरी सुंदर नन्द मुकुन्दा भजन लिरिक्स (Hari Sunder Nand Mukunda Lyrics)
आराध्य देवी-देवता श्री राधा और भगवान श्री कृष्ण
संगीत परंपरा वैष्णव संकीर्तन एवं ब्रज संगीत
भाषा हिंदी एवं ब्रजभाषा
मुख्य भाव माधुर्य भक्ति, प्रेम एवं समर्पण
उचित अवसर जन्माष्टमी, राधाष्टमी, दैनिक पूजा एवं सत्संग
संबंधित पावन लेख श्री राधा कृष्ण भजन संग्रह

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

'हरी सुंदर नन्द मुकुन्दा' भजन किस देवता को समर्पित है?

यह भजन भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा रानी की युगल जोड़ी को समर्पित है।

इस भजन को गाने का सबसे उत्तम समय कौन सा है?

प्रातःकाल ब्रह्म बेला में या संध्या के समय पूजा के दौरान इस भजन को गाना अत्यंत फलदायी होता है।

क्या इस भजन को घर पर संकीर्तन के समय गाया जा सकता है?

हाँ, यह भजन किसी भी पारिवारिक सत्संग, भजन संध्या, एकादशी या जन्माष्टमी उत्सव पर आसानी से गाया जा सकता है।

इस भजन में 'मुकुन्दा' शब्द का क्या अर्थ है?

'मुकुन्दा' का अर्थ है जो मुक्ति या मोक्ष प्रदान करते हैं, जो भगवान श्री कृष्ण का एक प्रमुख नाम है।

राधा-कृष्ण के प्रेम को वैष्णव परंपरा में क्या माना गया है?

वैष्णव परंपरा में इसे साधारण प्रेम न मानकर जीवात्मा और परमात्मा के शाश्वत मिलन का प्रतीक माना गया है।

क्या इस भजन के गायन के लिए किसी विशेष वाद्य यंत्र की आवश्यकता होती है?

नहीं, इसे केवल ताली बजाकर या हारमोनियम, ढोलक और मंजीरे की सहायता से प्रेमभाव के साथ गाया जा सकता है।

भगवान कृष्ण को पीतांबर धारी क्यों कहा जाता है?

भगवान श्री कृष्ण हमेशा पीले रंग के वस्त्र (पीतांबर) धारण करते हैं, इसलिए उन्हें पीतांबर धारी कहा जाता है।

इस भजन का मुख्य आध्यात्मिक संदेश क्या है?

इसका मुख्य संदेश भगवान के प्रति अनन्य प्रेम, नाम स्मरण और अहंकार का त्याग कर शरणागत होना है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तलोक (Bhaktilok.in) पर प्रकाशित यह भजन सामग्री वेदों, पुराणों, और पारंपरिक वैष्णव संकीर्तन ग्रंथों के अध्ययन के पश्चात संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य पाठकों को शुद्धतम लिरिक्स और आध्यात्मिक गहराई प्रदान करना है। यदि आपको इसमें कोई सुधार या सुझाव देना हो, तो आप संपर्क कर सकते हैं।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत पुराण (गोपियों और उद्धव संवाद प्रसंग)
  • गौड़ीय वैष्णव पद साहित्य संग्रह
  • ब्रज की लोक संस्कृति और संकीर्तन परंपरा
  • पारंपरिक संत वाणी एवं भजन ग्रंथ

संबंधित भजन एवं लेख

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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