"देना हो तो दीजिए जन्म जन्म का साथ" एक अत्यंत भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी भजन है, जो भक्त और भगवान के बीच के अटूट संबंध को समर्पित है। यह भजन विशेष रूप से बांके बिहारी और श्याम प्रभु के भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। इस भजन का मुख्य भाव 'अनन्य शरणागति' है, जहाँ भक्त सांसारिक सुख-सुविधाओं या धन-दौलत की कामना न करके केवल प्रभु का सानिध्य और उनकी कृपा की निरंतरता मांगता है। यह भजन भक्ति के उस उच्च स्तर को दर्शाता है जहाँ भक्त को संसार के किसी भी आकर्षण से अधिक अपने आराध्य का साथ प्रिय लगता है। चाहे वह सुख का समय हो या दुख की घड़ियाँ, भक्त केवल प्रभु के चरणों में अपना स्थान सुरक्षित रखना चाहता है। यह भजन सत्संग, एकादशी जागरण, और श्री कृष्ण जन्माष्टमी जैसे पावन अवसरों पर अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया जाता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
देना हो तो दीजिए जन्म जन्म का साथ ।
अब तो कृपा कर दीजिए जन्म जन्म का साथ ।
मेरे सर पर रख बनवारी अपने दोनों यह हाथ ॥
देने वाले श्याम प्रभु से धन और दौलत क्या मांगे ।
श्याम प्रभु से मांगे तो फिर नाम और इज्ज़त क्या मांगे ।
मेरे जीवन में अब कर दे तू कृपा की बरसात ॥
श्याम तेरे चरणों की धूलि धन दौलत से महंगी है ।
एक नज़र कृपा की बाबा नाम इज्ज़त से महंगी है ।
मेरे दिल की तम्मना यही है करूँ सेवा तेरी दिन रात ॥
झुलस रहें है गम की धुप में प्यार की छईया कर दे तू ।
बिन माझी के नाव चले ना अब पतवार पकड़ ले तू ।
मेरा रास्ता रौशन कर दे छायी अन्धिआरी रात ॥
सुना है हमने शरणागत को अपने गले लगाते हो ।
ऐसा हमने क्या माँगा जो देने से घबराते हो ।
चाहे जैसे रख बनवारी बस होती रहे मुलाक़ात ॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा है। भक्त यहाँ भगवान से प्रार्थना करता है कि यदि उन्हें कुछ देना ही है, तो वे केवल अपना साथ दें। भक्त कहता है कि संसार की धन-दौलत, मान-सम्मान और पद-प्रतिष्ठा क्षणभंगुर है। असली संपत्ति तो प्रभु का सानिध्य है। भक्त स्वीकार करता है कि वह जीवन की कठिनाइयों (गम की धूप) में झुलस रहा है और उसे प्रभु के प्रेम रूपी छाया की आवश्यकता है। वह स्वयं को एक ऐसी नाव के समान मानता है जिसका कोई माझी नहीं है, और प्रभु से प्रार्थना करता है कि वे उसके जीवन की पतवार थाम लें। यह भजन पूर्ण समर्पण का प्रतीक है, जहाँ भक्त अपनी सारी चिंताएं प्रभु पर छोड़ देता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- अनन्य भक्ति: यह भजन 'अनन्य भक्ति' का उत्कृष्ट उदाहरण है।
- सांसारिक मोह का त्याग: इसमें धन-दौलत से ऊपर प्रभु के नाम को रखा गया है।
- शरणागति का भाव: भक्त स्वयं को प्रभु के चरणों में पूरी तरह समर्पित कर देता है।
- सांत्वना का स्रोत: कठिन समय में यह भजन भक्तों को मानसिक शांति और संबल प्रदान करता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को किसी भी समय गाया जा सकता है, परंतु एकांत में बैठकर या सामूहिक सत्संग में इसका गायन विशेष फलदायी होता है। इसे गाते समय मन में प्रभु की छवि का ध्यान करना चाहिए। सुबह की पूजा के समय या रात को सोने से पहले इसे सुनने से मन को असीम शांति मिलती है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द | सरल अर्थ | संदर्भ |
|---|---|---|
| बनवारी | श्री कृष्ण | वन की माला धारण करने वाले |
| शरणागत | शरण में आया हुआ | जो प्रभु की शरण ले चुका हो |
| माझी | नाविक | जीवन रूपी नाव को चलाने वाला |
| तम्मना | इच्छा | हृदय की गहरी अभिलाषा |
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | देना हो तो दीजिए जन्म जन्म का साथ |
|---|---|
| आराध्य देव | श्री कृष्ण (श्याम प्रभु) |
| भाव | शरणागति एवं समर्पण |
| भाषा | हिंदी |
| उपयुक्त अवसर | सत्संग, एकादशी, जन्माष्टमी |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. यह भजन किस देवता को समर्पित है?
यह भजन मुख्य रूप से श्री कृष्ण (श्याम प्रभु) को समर्पित है।
2. क्या इस भजन को घर पर गाया जा सकता है?
हाँ, इसे घर पर पूजा या ध्यान के समय श्रद्धापूर्वक गाया जा सकता है।
3. इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?
इस भजन का मुख्य संदेश प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण और सांसारिक मोह का त्याग है।
4. क्या यह भजन किसी विशेष त्यौहार पर गाया जाता है?
इसे किसी भी समय गाया जा सकता है, लेकिन जन्माष्टमी और एकादशी पर इसका विशेष महत्व है।
5. क्या इस भजन को सुनने से मानसिक शांति मिलती है?
हाँ, भक्तिपूर्ण भजनों का श्रवण मन को शांत और सकारात्मक बनाता है।
6. 'बनवारी' शब्द का क्या अर्थ है?
बनवारी श्री कृष्ण का एक नाम है, जिसका अर्थ है 'वन की माला धारण करने वाले'।
7. शरणागत का अर्थ क्या है?
जो व्यक्ति पूरी तरह से भगवान की शरण में आ गया हो, उसे शरणागत कहते हैं।
8. क्या इस भजन को गाते समय किसी विशेष विधि की आवश्यकता है?
नहीं, केवल शुद्ध मन और भक्ति भाव ही पर्याप्त है।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह सामग्री भक्ति साहित्य और पारंपरिक भजनों के अध्ययन पर आधारित है। इसे भक्तों की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है जो पाठकों को भक्ति मार्ग पर प्रेरित करने के लिए है।
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